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अंदेशों के बीज PDF Print E-mail
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Wednesday, 24 July 2013 10:39

जनसत्ता 24 जुलाई, 2013: जीएम यानी जीन-संशोधित फसलों को मंजूरी देने के सरकार के इरादे का विरोध शुरू से होता आ रहा है। विरोध करने वालों में पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों से सरोकार रखने वाले समूहों और किसान संगठनों से लेकर अनेक कृषि वैज्ञानिक तक शामिल हैं। कृषि मंत्रालय से संबद्ध संसदीय स्थायी समिति पहले ही कह चुकी है कि हमारे देश में जीएम फसलों की कोई जरूरत नहीं है। यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय भी पहुंचा और उसने छह तकनीकी विशेषज्ञों की एक समिति गठित की। समिति के अध्ययन से भी उन अंदेशों की पुष्टि हुई है जो जीएम फसलों को लेकर जताए जाते रहे हैं। अपनी अतंरिम रिपोर्ट में समिति ने जेनेटिक इंजीनियरिंग से तैयार बीजों के जमीनी परीक्षण पर दस साल तक रोक लगाने की सिफारिश की थी। अब अंतिम रिपोर्ट में उसने दस साल का कोई जिक्र न कर, कहा है कि रोक अनिश्चित काल के लिए होनी चाहिए। क्या यह गुंजाइश निकालने की कोशिश है, या अपनी पहले की सिफारिश को उसने और दृढ़ता से रखा है? जो हो, अंतिम रिपोर्ट में भी समिति ने जीएम फसलों से जुड़े खतरों से इनकार नहीं किया है। उसे ऐसा कोई ठोस कारण नहीं दिखा कि बीटी बैंगन या बीटी चावल जैसी कोई फसल व्यावसायिक रूप से उगाने की इजाजत दी जाए।
दुनिया भर में हुए कई अनुसंधान पहले ही ऐसी फसलों से पर्यावरण, स्वास्थ्य और जैव विविधता को गंभीर नुकसान होने की चेतावनी दे चुके हैं। पर यूपीए सरकार के लिए वे कोई मायने नहीं रखते। उसने जीएम बीजों का रास्ता साफ करने के लिए जैव तकनीक नियामक प्राधिकरण विधेयक भी तैयार कर रखा है। ऐसे दूरगामी असर वाले मसले पर व्यापक और खुले विचार-विमर्श से भी सरकार कतराती रही है। विडंबना यह है कि इस मामले में खुद सरकार के भीतर एक राय नहीं है। पर्यावरण मंत्री रहते हुए जयराम रमेश ने बीटी


बैंगन को मंजूरी देने से मना कर दिया था। पचीस दिन पहले उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि नई हरित क्रांति के नाम पर जीएम बीजों से स्वास्थ्य को होने वाले खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मगर इससे सरकार की मंशा पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। वह मानती है कि जीएम बीजों से पैदावार बढ़ेगी, इसलिए भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इनकी उपयोगिता जाहिर है। यह सही है कि जीन-संशोधित बीज उपज बढ़ाने में मददगार होंगे, पर केवल इसी तर्क पर उन्हें सही नहीं ठहराया जा सकता। खाद्य का मतलब बस किसी तरह पेट भरना नहीं होता, यह भी जरूरी है कि वह पोषक या सेहत के लिए निरापद हो। फिर, जीएम बीज पर्यावरण और जैव विविधता के लिए भी खतरनाक हैं। किसानों के लिए वे मजबूरी का फंदा साबित होंगे, क्योंकि उनका इस्तेमाल सिर्फ एक बार किया जा सकता है। हर बार नए बीज खरीदने होंगे और यह स्थिति जीएम बीजों के कारोबार से जुड़ी मोनसेंटो जैसी कंपनियों के लिए ही फायदे की होगी, जो सिर्फ अपने मुनाफे की सोचती हैं।
जीएम फसलों के लिए अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। पहले ही देश में भूजल का दोहन एक व्यापक संकट का रूप ले चुका है। ऐसे में ज्यादा सिंचाई वाली नहीं बल्कि ऐसी कृषि प्रणाली की आवश्यकता है जिसमें पानी की कम खपत हो। तकनीकी विशेषज्ञ समिति ने जीएम बीजों के जमीनी परीक्षण पर अनिश्चित काल तक रोक लगाने की सिफारिश करते हुए कुछ शर्तें भी सुझाई हैं, यानी किन परिस्थितियों में सीमित प्रयोग की इजाजत दी जा सकती है। मसलन, जैव विविधता पर पड़ने वाले असर को जांचने के लिए विशेषज्ञों की समिति बने, स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभाव पर निगरानी के लिए एक नियामक तंत्र गठित हो। मगर जहां इतने अंदेशे हों वहां जीएम का मोह पालने की जरूरत क्या है!

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