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सेहत की सुध PDF Print E-mail
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Wednesday, 24 July 2013 10:38

जनसत्ता 24 जुलाई, 2013: सामाजिक संगठनों की लंबे समय से चली आ रही मांग और सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद कुछ राज्य सरकारों ने सिगरेट, बीड़ी, गुटखा, पान मसाला जैसे तंबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया। इन्हें बनाने वाली कंपनियां पैकेटों पर मोटे अक्षरों में वैधानिक चेतावनी छापने को बाध्य हुर्इं। टीवी और सिनेमा के परदे पर भी यह चेतावनी दिखाई जाने लगी। मगर इससे तंबाकू उत्पाद की बिक्री और उनके उपभोग को हतोत्साहित करने में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई। कंपनियां अपने उत्पाद का प्रचार-प्रसार पहले की तरह ही करती रहीं। उन्नीस साल पहले सरकार ने सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद (उत्पादन, व्यापार, विपणन, विज्ञापन और वितरण नियमन) कानून में संशोधन किया तो तंबाकू उत्पादों का कारोबार करने वाली कंपनियों ने मुंबई उच्च न्यायालय में इसके खिलाफ याचिका दायर कर दी। विचित्र है कि उस पर सरकार की तरफ से कोई वकील पेश नहीं हुआ, जिसके चलते अदालत ने उस कानून के अनुपालन पर रोक लगा दी। अब उस फैसले को रद््द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दुकानों पर टांगे जाने वाले तंबाकू उत्पाद के बड़े विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जाहिर की है कि इतने साल तक सरकार ने उस आदेश को निरस्त कराने की कोई कोशिश क्यों नहीं की।
यह छिपी बात नहीं है कि तंबाकू उत्पाद का कारोबार करने वाली कंपनियां काफी ताकतवर हो चुकी हैं और वे अपने कारोबारी हित साधने के नए रास्ते निकाल लेती हैं। सरकारें उनके खिलाफ कोई सख्त कदम उठाने से प्राय: बचती रही हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब गुटखे की बिक्री पर प्रतिबंध लगा तो इन्हें बनाने वाली कंपनियों ने रातोंरात तंबाकू और पान मसाला अलग-अलग पैकेटों में बेचना शुरू कर दिया। यह कानून की


नजर में धूल झोंकने का ही प्रयास है। मगर सरकारें इस तरफ से अपनी आंखें मूंदे हैं। अंतरराष्ट्रीय करार के मुताबिक भारत सभी तरह के तंबाकू उत्पादों के प्रचार-प्रसार पर रोक लगाने को वचनबद्ध है। मगर हकीकत यह है कि राज्य सरकारें तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध का प्रचार तो करती हैं, पर उनकी नाक के नीचे ही इनका कारोबार चलता रहता है। उसे रोकने के लिए कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाता। पान-सिगरेट की दुकानों पर बड़े-बड़े विज्ञापन एक तरह से लोगों को तंबाकू सेवन को प्रोत्साहित करते दिखाई देते हैं।
सरकारें इस बात से अनजान नहीं हैं कि हर साल लाखों लोग तंबाकू की लत की वजह से कैंसर के शिकार होकर अपनी जान गंवा बैठते हैं। फिर भी इसके उत्पादन और बिक्री को पूरी तरह रोकने का कोई व्यावहारिक कदम नहीं उठाया जाता। इसी का फायदा तंबाकू उत्पाद तैयार करने वाली कंपनियां उठाती हैं। राजस्व के लिए लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालने वाले पदार्थों को बढ़ावा क्यों दिया जाना चाहिए? संभव है जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बाद सिगरेट, बीड़ी, पान मसाला आदि बनाने वाली कंपनियों ने पैकेटों पर चित्र के साथ चेतावनी छापनी शुरू कर दी कि तंबाकू से कैंसर होता है, वैसा ताजा आदेश के बाद भी करने को तैयार हो जाएं। मगर इससे ऐसे पदार्थों के उत्पादन और बिक्री के तंत्र पर कितना असर पड़ेगा, कहना मुश्किल है। जब तक ये पदार्थ सहजता से उपलब्ध होते रहेंगे, इनके इस्तेमाल की लत पर लगाम लगाना कठिन बना रहेगा। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को सोचने की जरूरत है कि लोगों की सेहत की कीमत पर मुनाफा बटोरने वाले इस कारोबार पर अंकुश कैसे लगे।

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