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मोदी का मिथक और यथार्थ PDF Print E-mail
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Monday, 22 July 2013 13:55

सुभाष गाताडे 
जनसत्ता 20 जुलाई, 2013: संघ के पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन, जो अपने अनर्गल बयानों के लिए अधिक सुर्खियां बटोरते रहे, अगर जिंदा होते तो अपने ‘उत्तराधिकारी’ की एक अहम उपलब्धि को लेकर उनकी पीठ जरूर थपथपाते। याद रहे कि 2005 में दिए अपने एक साक्षात्कार में सुदर्शन ने ‘वृद्ध हो चले’ अटल और आडवाणी से मुक्त भाजपा की बात की थी, जिसके लिए उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। अपने स्वास्थ्य के चलते सार्वजनिक जीवन से अलिप्त अटल और अब जनाब भागवत की शतरंजी चालों से वानप्रस्थ की राह पर निकले आडवाणी को देख कर वे निश्चित ही गदगद होते।
एक अदद मुलाकात दूरगामी संदेशों की वाहक बन जाती है। पिछले दिनों झंडेवालान, दिल्ली स्थित संघ कार्यालय में हुई आडवाणी और मोहन भागवत की मुलाकात पर भी यही बात लागू होती है। कहां तो भाजपा के मामलों में संघ के बढ़ते हस्तक्षेप का प्रतिवाद करने वाले पहले के आडवाणी और कहां अपनी चंद शिकायतें लेकर संघ कार्यालय में नालिश करने पहुंचे अब के आडवाणी। जैसा कि अखबारों की रिपोर्टें बताती हैं कि इस मुलाकात ने आडवाणी की रही-सही उम्मीद पर भी पानी फेर दिया। भाजपा में संघ के आशीर्वाद से हुई मोदी की ‘ताजपोशी’ के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर न उन्हें कोई आश्वासन मिला, न संघ की तरफ से भाजपा के मामलों को देख रहे प्रचारकों को बदलने की उनकी बात मानी गई। इस बैठक का नतीजा यही होगा, यह बात पहले से ही तय थी, क्योंकि भागवत ने अपनी तरफ से इस मुलाकात को कोई अहमियत नहीं दी थी। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘तमाम लोग मुझसे मिलने आते रहते हैं। सुना है, आडवाणी भी आएंगे।’
साफ है कि भारतीय जनता पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की सियासत पर कई दशकों से हावी रही वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी अब अतीत के विवरण तक सिमट जाएगी। स्वास्थ्य के चलते वाजपेयी तो पहले से ही रिटायर्ड हैं, अब आडवाणी भी उसी गति को प्राप्त हो जाएंगे, भले वह पूरी तरह स्वस्थ हों।
इस पूरी आपाधापी में इस खेल के असली विजेता की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया है, वही जिसने न केवल कोपभवन में पहुंचे आडवाणी को ‘सलाह’ दी कि, वे अपना इस्तीफा वापस लें, वही जिसने पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं की असहमति, विरोध, नाराजगी को किनारे लगाते हुए मुख्यमंत्री मोदी को अहम जिम्मेदारी सौंपने में अहम भूमिका निभाई, वही जो कई सालों से इस कोशिश में मुब्तिला था कि पार्टी का नियंत्रण उसके विश्वासपात्रों के हाथ में रहे। जिस तरह आडवाणी खेमे के कहे जाने वाले तमाम लोगों ने संघ के सुर में सुर मिलाते हुए नमो वंदना शुरू की, उससे स्पष्ट था कि अपने इस आनुषंगिक संगठन के ‘माइक्रोमैनेजमेंट’ के काम में प्रचारक जन जब जुट जाएंगे, तो कोई चूं-चपड़ नहीं करेगा।
इसमें दो राय नहीं कि मोदी को ‘आधिकारिक चेहरा’ बनाते वक्त संघ के शीर्षस्थ नेतृत्व ने किसी भी किस्म की असहमति न झेलने की उनकी प्रवृत्ति- जिसके चलते गुजरात में संघ-भाजपा के तमाम वरिष्ठ लोग हाशिये पर चले गए- जैसे तमाम पहलुओं पर सोचा होगा। उन्हें इस बात का भी गुुमान रहा होगा कि मोदी के चलते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पुराने साथी छिटक सकते हैं और नए साथियों के जुड़ने में दिक्कत आ सकती है।
आक्रामक हिंदुत्व के प्रतीक समझे जा रहे मोदी के पीछे फिलवक्त संघ खड़ा है। संघ परिवार के हिसाब से देखें तो 2001 में केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटा कर मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उनकी उपलब्धियां बहुत हैं। कहां तो 2001 के उस उत्तरार्द्ध में भाजपा की सत्ता पर पकड़ ढीली पड़ रही थी, वह कई नगरपालिकाओं के चुनाव हार रही थी और फिर गोधरा कांड के नाम पर प्रायोजित किए गए दंगों ने भाजपा की किस्मत इस कदर चमकाई कि बाकी सभी पार्टियों को लगातार हाशिये पर डाल कर वह जीत की हैट्रिक वहां कायम कर सकी है।
यह अलग बात है कि आजाद भारत में मुसलमानों के सबसे बड़े जनसंहार में राज्य सरकार की संलिप्तता या उस वक्त की उसकी सोची-समझी अकर्मण्यता के चलते देश-विदेश में उसने इतनी बदनामी झेली है कि आज भी पश्चिम के कई अहम मुल्कों में संघ के इस लाड़ले मुख्यमंत्री का प्रवेश वर्जित है।
भाजपा में अटल-आडवाणी दौर की समाप्ति के बाद मोदी युग की शुरुआत की अहमियत महज उसके अल्पसंख्यक-विरोध तक सीमित नहीं है; मोदी का शासन बड़े पूंजीपतियों और कारोबारियों को उपलब्ध कराई जा रही तमाम सेवाओं के लिए भी चर्चित है। तमाम बड़े घरानों को गुजरात में अतिरिक्त फायदा पहुंचाया गया है, जमीन और अन्य संसाधन उनकी सेवा में समर्पित किए गए हैं।
चंद माह पहले आई कैग की रिपोर्ट ने कॉरपोरेट समूहों पर की गई इसी ‘गैर-वाजिब’ मेहरबानी के लिए उसकी तीखी आलोचना की थ। अपनी रिपोर्ट में कैग ने बताया था कि किस तरह राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों को कॉरपोरेट क्षेत्र के प्रति मोदी सरकार की दरियादिली के चलते पांच सौ अस्सी करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। फिर चाहे जमीन देने के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए फोर्ड इंडिया और लार्सन ऐंड टूब्रो को दी गई जमीन हो या दोनों अंबानी बंधुओं, एस्सार स्टील और अडानी पॉवर लिमिटेड जैसी कंपनियों को पहुंचाया गया फायदा हो। कुल मिला कर, मोदी कट््टर हिंदुत्व और बड़ी पूंजी के इस खतरनाक संयोग


की नुमाइंदगी करते हैं। और आए दिन ‘स्वदेशी’ का राग अलापने वाले संघ को निश्चित ही उससे गुरेज नहीं है। दरअसल, विश्लेषकों के मुताबिक मोदी को नंबर वन घोषित करने में कॉरपोरेट घरानों का वरदहस्त होने पर भी नागपुर के ‘परिवारजनों’ ने गौर किया है।
लेकिन लगता है एक पहलू पर संघ के अग्रणीजनों ने बिल्कुल विचार नहीं किया है, वह है गुजरात के बाहर मोदी के कथित करिश्मे की वास्तविकता। उन्होंने इस बात पर तो गौर ही नहीं किया है कि कॉरपोरेट मीडिया द्वारा पीटे जा रहे तमाम ढोल के बावजूद शेष भारत में संपन्न चुनावों में मोदी का अंतत: एक क्षेत्रीय नेता के तौर पर सामने आना। हाल में हुए कर्नाटक चुनावों को ही देखें। वैसे मोदी को जबसे कॉरपोरेट सम्राटों और गेरुआधारी स्वामियों के एक हिस्से ने- जिनमें शामिल सभी किसी न किसी विवादों में लिप्त बताए जाते हैं-  प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे लायक व्यक्ति घोषित किया है, उसके बाद यह पहला मौका था कि उनकी इस कथित लियाकत का इम्तिहान होता। नतीजे स्पष्ट हैं कि वे इस इम्ताहन में बुरी तरह फेल हो गए।
कर्नाटक चुनाव में मोदी की तीन रैली उन इलाकों में रखी गई थी, जो भाजपा के गढ़ माने जाते थे। पहली रैली बंगलुरु में थी, जहां कुल अट््ठाईस सीटें हैं, जिनमें से सत्रह भाजपा ने पिछले चुनाव में जीती थी। वहां वह इस बार दहाई भी पार नहीं हो सकी। दो अन्य सभाएं तटीय कर्नाटक में हुर्इं, जिनमें से एक उड़ुपी और दूसरी बेलगाम में हुई। दक्षिण कन्नड जिले की कुल आठ में से एक भी सीट भाजपा के खाते में नहीं आई और उडुपी की पांच में से भाजपा को महज एक पर कामयाबी मिली यानी तेरह सीटों में से महज एक सीट भाजपा के खाते में। यह थी ‘स्टार प्रचारक’ की उपलब्धि। दूसरी तरफ, कॉरपोरेट जगत के एक हिस्से या मीडिया का उनके प्रति सम्मोहन देखिए कि कर्नाटक की शिकस्त को किसी ने मोदी की शिकस्त नहीं कहा। कल्पना करें कि अगर उलटा हुआ होता यानी किसी करिश्मे से भाजपा जीत जाती तो वही मीडिया मोदी की ताजपोशी करा देता। यों यह पहली दफा नहीं हुआ कि अपने राज्य के बाहर मोदी चुके हुए कारतूस की तरह नजर आए थे।
जब-जब मोदी गुजरात के बाहर गए या पार्टी ने उन्हें इसका जिम्मा सौंपा, वे प्रभावहीन साबित हुए। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें महाराष्ट्र, गोवा, दमन-दीव की जिम्मेदारी दी गई थी; भाजपा को यहां उम्मीद के हिसाब से सफलता नहीं मिली। खुद गुजरात के अंदर 2009 के चुनाव में कांग्रेस की तुलना में भाजपा महज दो सीटों पर आगे थी। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में- जहां मोदी नहीं गए- गुजरात की तुलना में पार्टी को बेहतर सफलता मिली थी।
पिछले साल हुए उत्तराखंड के चुनाव को भी देखें, जब मोदी ने केंद्रीय नेतृत्व के प्रति अपनी असहमति प्रगट करने के लिए, कोई बहाना बना कर चुनाव में न जाने का निर्णय किया था। मोदी की अनुपस्थिति के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस को कांटे की टक्कर दी और वह महज दो सीट से कांग्रेस से पिछड़ गई। ऐसा नहीं कि पांच साल पार्टी की हालत वहां बहुत बेहतर थी। इस अंतराल में उसे तीन बार मुख्यमंत्री बदलने पड़े थे।
जानकार बता सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में बिहार ने भाजपा को काफी सीटें दिलाई हैं। यहां मोदी चुनाव प्रचार में नहीं गए थे, दरअसल उन्हें बुलाया नहीं गया था। एक तो नीतीश कुमार के मोदी-विरोध को लेकर भाजपा सचेत थी। दूसरे, इन्हीं चुनावों की तैयारी के दौरान खुद सुषमा स्वराज ने यह कह कर सभी को चौंका दिया था कि ‘मोदी का मैजिक हर जगह नहीं चलता है।’
इसके बरक्स 2011 में हुए असम चुनावों में मोदी की मौजूदगी ने पार्टी को नाकामी के नए मुकाम पर पहुंचा दिया था। कहां भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष ने असम में अपने बलबूते सरकार बनाने का सपना देखा था और कहां आलम था कि उसकी सीटें पहले से आधी हो चुकी थीं। यह शायद संघ के एजेंडे का ही प्रभाव था कि असम में ऐसे ही लोगों को चुनाव प्रभारी या स्टार प्रचारक के तौर पर भेजा गया जिनकी छवि उग्र हिंदुत्व की रही है। संघ-भाजपा की पूरी कोशिश थी कि असम में सांप्रदायिक सद्भाव की राजनीति को पलीता लगा दिया जाए ताकि होने वाला ध्रुवीकरण उसके फायदे में रहे। चुनाव में स्टार प्रचारक के तौर पर हिंदुत्व के ‘पोस्टर बॉय’ नरेंद्र मोदी की ड्यूटी लगाई गई थी, जिन्होंने कई स्थानों पर सभाओं को संबोधित किया था। मोदी की इस विफलता ने 2007 के उत्तर प्रदेश चुनावों की याद ताजा कर दी थी, जिसमें उन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर उतारा गया था। याद रहे कि यह वही चुनाव था, जब भाजपा चौथे नंबर पर पहुंच गई थी। जहां मोदी की सभाएं हुई थीं, ऐसे अधिकतर स्थानों पर भाजपा को शिकस्त मिली थी।
गुजरात के बाहर बार-बार चुका हुआ कारतूस साबित हुए मोदी को 2014 के लिए अपना चुनावी चेहरा बनासंघ-भाजपा परिवार ने एक बड़ा जुआ खेला है, जिसमें फिर एक बार इस स्वघोषित ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का औंधे मुंह गिरना तय है। भाजपा पर संघ का नियंत्रण मजबूत करके फिलवक्त मुस्करा रहे मोहन भागवत को तब शायद आडवाणी की नालिश याद आएगी।

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