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पाकिस्तान में मजहबी हिंसा में 717 लोगों की मौत : यूएससीआईआरएफ PDF Print E-mail
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Thursday, 18 July 2013 12:50

वॉशिंगटन। पाकिस्तान में पिछले साल जनवरी से मजहबी समुदायों को लक्ष्य बना कर की गई हिंसा के 203 मामलों में कम से कम 717 लोगों की मौत हो गई और 1108 लोग घायल हो गए।
यह बात कांग्रेस द्वारा गठित एक स्वतंत्र आयोग की रिपोर्ट ‘पाकिस्तान मजहबी हिंसा परियोजना’ :पाकिस्तान रिलीजियस वायोलेन्स प्रोजेक्ट: में कही गई है। अंतरराष्ट्रीय मजहबी स्वतंत्रता के लिए अमेरिकी आयोग :यूएस कमीशन फॉर इंटरनेश्नल रिलीजियस फ्रीडम :यूएससीआईआरएफ: द्वारा कल जारी की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मरने वालों में दो हिंदू और एक सिख शामिल हैं।
आयोग पिछले 18 माह से पाकिस्तान में मजहबी समुदायों के खिलाफ हो रहे कथित हमलों पर नजर रखे हुए था। रिपोर्ट में कहा गया है कि मरने वालों में बड़ी संख्या शिया समुदाय के लोगों की है।
रिपोर्ट में कहा गया है ‘गुटीय हिंसा के 203 मामलों में 1,800 से अधिक लोग हताहत हुए जिनमें से 700 से अधिक लोगों की मौत हो गई।’
यूएससीआईआरएफ की इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है ‘उग्रवादियों और आतंकवादी संगठनों की हिंसा से शिया समुदाय सर्वाधिक प्रभावित हुआ। कुछ जानलेवा हमले तो पवित्र महीनों में और तीर्थयात्राओं के दौरान हुए हैं।’
रिपोर्ट के अनुसार, ‘आत्मघाती हमलों और लक्ष्य कर की जाने वाली गोलीबारी का सर्वाधिक खतरा शियाओं पर है। ईसाइयों, अहमदी और हिंदुओं के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का माहौल बेहतर नहीं है। इन समुदायों के लोगों के खिलाफ हिंसा की कई घटनाएं हुई हैं।’
यूएससीआईआरएफ ने कहा है कि यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार के लिए चिंताजनक और


चुनौतीपूर्ण तस्वीर पेश करती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नेशनल असेंबली में अपने पहले भाषण के दौरान मजहबी अल्पसंख्यकों को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं और शियाओं को लक्ष्य कर हाल ही में हुए बम हमलों के बाद वह क्वेटा गए तथा वहां की सरकार से कड़ी कदम उठाने को कहा था। ‘यह एक सकारात्मक पहल थी।’
इसमें कहा गया है ‘बहरहाल, यह सुनिश्चित करने के लिए मजबूत इरादों और दृढ़ संकल्प के साथ कार्रवाई करने की जरूरत है कि हिंसा के दोषियों को गिरफ्तार किया जाए, उन पर मुकदमा चलाया जाए और उन्हें जेल भेजा जाए।’
यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट में कहा गया है कि मजहबी चरमपंथी हिंसा तथा मजहबी समुदायों पर हमले के लिए जिम्मेदार समूहों और लोगों को सजा दी जानी चाहिए।    
इसमें कहा गया है कि पुलिस अधिकारियों की भी जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए जो हमले के दौरान आंख बंद कर लेते हैं या पीड़ित के मजहबी अल्पसंख्यक होने पर प्राथमिकी दर्ज करने से मना कर देते हैं।
रिपोर्ट में ईशनिंदा कानून और अहमदी विरोधी कानूनों के दुरूपयोग का जिक्र भी किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि बलात्कार के ज्यादातर मामले हिंदुओं के साथ हुए हैं। पिछले 18 माह में बलात्कार के 12 मामलों की खबर मिली जिनमें से 7 मामले हिंदुओं के खिलाफ और 5 मामले ईसाइयों के खिलाफ हुए हैं।
(भाषा)

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