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राष्ट्रप्रेम का परदा PDF Print E-mail
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Thursday, 18 July 2013 10:27

अभिषेक श्रीवास्तव 
जनसत्ता 18 जुलाई, 2013: जिस तरह एक कवि का आत्मकथ्य उसकी कविता होती है, उसी तरह एक खिलाड़ी का आत्मकथ्य उसका खेल होना चाहिए। एक खिलाड़ी के आत्मकथ्य की कामयाबी उसके खेल की सबसे बड़ी उपलब्धि होनी चाहिए। यही बात ‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म से नदारद है। मिल्खा जब एक कागज पर लिखे विश्व रिकॉर्ड के समय को आग में झोंक देते हैं, तब जाकर समझ में आता है कि उन्होंने यह रिकॉर्ड तोड़ दिया है। परदे पर आठ ‘विंडो’ बना कर इस मामले को जल्दी में निपटा देने और इसके बरक्स पाकिस्तान के साथ ‘मैत्री दौड़’ के बहाने फिल्म में लोकप्रिय अंधराष्ट्रवाद की छौंक लगाने को कैसे देखा जाना चाहिए? अगर मिल्खा सिंह खुद इस फिल्म के साथ लगातार जुड़े रहे, तो उन्हें आखिर इस पर आपत्ति क्यों नहीं हुई? इसके ठीक उलट शिमित अमीन निर्देशित ‘चक दे इंडिया’ में भी राष्ट्रप्रेम था। लेकिन वह मैत्री के नाम पर किसी से विद्वेष की कीमत पर नहीं आता है। अगर वहां राष्ट्रवाद और विभाजन के बाद पैदा सांप्रदायिकता का एक ‘विक्टिमाइज्ड’ कबीर खान है तो यहां भी विभाजन के पीड़ित मिल्खा हैं। कबीर खान की उपलब्धि से मिल्खा की कामयाबी को मिला कर देखें, निर्देशक की बेईमानी साफ दिख जाएगी। मिल्खा सिंह इस ‘पिक एंड चूज’ के आख्यान से पूरी तरह गायब हैं। अगर तथ्यों के उलटफेर में उनकी मौन सहमति है, तो इसे हम क्या समझें!
बहरहाल, जिस प्रेम को याद करके मिल्खा चुन्नी उड़ाते शाहदरा के पुल पर दिखते हैं, उसे अचानक भूल कर बियर पीते हुए आॅस्ट्रेलियाई लड़की के साथ भी पाए जाते हैं। पता नहीं, 1960 में ऐसा होता था या नहीं! हालांकि उन्होंने खुद लोकप्रियता के नाम पर इसे एक साक्षात्कार में निर्देशक का दबाव बताया है। फिर अचानक उन्हें ज्ञान होता है कि आॅस्ट्रेलियाई लड़की के कारण ही उनका प्रदर्शन खराब रहा है तो वह ‘जलपरी’ के प्रस्ताव पर उससे माफी मांगते दिखते हैं। क्या राकेश ओमप्रकाश मेहरा इन महिला पात्रों को सनातन भारतीय आख्यानों के हिसाब से ‘नरक का द्वार’ मानते हैं जो विश्वामित्र की तपस्या भंग करने


वाली अप्सरा से ज्यादा महत्त्व नहीं रखती हैं? जिस लड़की से मिल्खा ने प्रेम किया था, उसकी जीवन स्थितियों को तीन घंटे में एक बार भी दिखाना वे जरूरी क्यों नहीं समझते?
मिल्खा सिंह को पालने वाली उनकी एक बड़ी बहन के रूप में दिव्या दत्ता अगर इस फिल्म में नहीं होतीं तो शायद भावबोध की जो न्यूनतम संभावना भी फिल्म में बची है, वह खत्म हो जाती। लेकिन एक ओर ऐसी महिलाएं जो पुरुष को फर्श पर गिरा रही हैं (एक साक्षात्कार में मिल्खा सिंह के बयान का आशय) और दूसरी ओर अपनी ‘पराधीनता’ को पूरी तरह स्वीकार करके खुश महिला पुरुष को झाड़ पर चढ़ाने का काम कर रही है! आखिर क्या जरूरत थी कि शरणार्थी शिविर के भीतर मिल्खा की बहन और उसके पति के बीच अंतरंग कर्म को ध्वनि के जरिए ही सही, दिखाया गया? क्या इसका उद्देश्य मिल्खा के भीतर गुस्सा पैदा करना था? मैं जिस हॉल में यह फिल्म देख रहा था, वहां मेरे बगल में बैठे एक बच्चे ने इस दृश्य पर अपने पिता से पूछा कि पापा, यह आवाज कैसी है! पिता के मुंह से जवाब में कोई आवाज नहीं निकली।
वह प्रश्नाकुल बच्चा, पाकिस्तान विरोधी भावनाओं पर हुलसित सिनेमा हॉल की जनता, ‘आस्ट्रेलियाई चुंबन’ पर हॉल में गूंजती सीटियां, उपलब्धि के पौरुष की छाया में चार ‘पराधीन’ महिला पात्रों का बिला जाना, भारत-पाकिस्तान ‘मैत्री खेल’ के परदे पर प्रस्तुति से निकलती अंधराष्ट्रवाद और विद्वेष की छाया- अगर किसी व्यक्ति की जिंदगी की वास्तविक घटनाओं की ये सार्वजनिक प्रतिक्रियाएं और प्रतिच्छायाएं हैं, तो बुनियादी सवाल उस व्यक्ति पर नहीं, बल्कि निर्देशक पर खड़ा होता है। फिल्म तो मारियो पुजो के ‘गॉडफादर’ पर भी बनती है! बस चुनना निर्देशक को होता है कि उसे जख्मों से रिसता ताजा लाल खून दिखाना है या सड़ा हुआ मवाद!

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