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हजामत की कुर्सी PDF Print E-mail
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Thursday, 18 July 2013 10:26

सुनील मिश्र
जनसत्ता 18 जुलाई, 2013: रविवार का दिन जिन कुछ खास कामों के लिए नियत होता है, उनमें एक बाल कटवाना भी है। यह अपनी तरह के सुकून का काम है। इसके लिए कई बार जितनी बेचैनी होती है, उतना ही इसे विभिन्न कारणों से टाला भी जाता है। बहरहाल, जब भी हम हजामत बनवाने के लिए नियत कुर्सी पर बैठते हैं, वे पल बड़े सुकून और आनंद के साथ चिंतन के भी होते हैं। खुद मेरी स्थितियां भी ऐसी अनुभूतियों के आसपास हैं। मैं जिस दुकान में बाल कटवाता हूं, वह मेरे घर के पास है। वहां पप्पू के काटे बाल ही मुझे सुहाते हैं। उसे मैं बरसों से जानता हूं। दरअसल, वह मेरा हमउम्र है और बचपन में हम एक ही स्कूल में पढ़े हैं। जब मैं पांचवीं में था, तब पप्पू तीसरी में था। वह मुझे भैया कहता है।
पप्पू पहले अलग-अलग सैलून में नौकरी करता रहा है। उसी से बाल कटवाने के लिए उसके साथ-साथ मैंने भी दुकानें बदलीं। जब-जब वह दुकान बदलता, मैं पहले वाली दुकान पर जाता और वह न मिलता तो दुकान मालिक से उसका पता पूछता। वह जानते हुए भी कह देता कि मालूम नहीं। फिर पप्पू के घर जाकर उसकी नई जगह पता करनी होती। मैं कई बार उससे झुंझला भी जाता। एक बार उसने अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर दिया, जिसमें उसका मोबाइल नंबर था। फिर एक दुकान से हटने पर उसे ढूंढ़ने में दिक्कत नहीं हुई। हालांकि पिछले तीन साल से पप्पू खुद अपनी दुकान चला रहा है और अब चार आदमी उसकी दुकान में काम करते हैं।
मुझे वह जमाना भी याद है, जब मैं पापा की अंगुली पकड़ कर बाजार जाता था। वे अक्सर समय पर बाल कटवाने के पाबंद थे। बचपन में मैं बाल कटवाने को अपने प्रति ‘हिंसा’ समझता था! इसलिए न्यू मार्केट की उस लेन में घुसते ही पापा के हाथ से अपना हाथ छुड़ाने लगता और कहता था कि दूसरे रास्ते से चलते हैं। लेकिन वे फुसला कर मुझे ले ही जाते थे। उस समय माथुर साहब का सैलून वहां खूब चलता था। वे बाहर खड़े रह कर सबको निमंत्रित करते रहते थे। खैर, जब बच्चे बाल कटवाने आते थे तो कुर्सी के दोनों हत्थों पर सीधा फट्टा रख दिया जाता था। उस पर बैठ कर शीशे के सामने होना मुस्कराहट का


सबब बनता था। जो हमारे बाल काटते थे, वे कैंची चलाने के दौरान हमारी ठोड़ी पकड़ लिया करते थे, जिससे बड़ी उलझन होती थी। लेकिन सिर स्थिर रखने के लिए ये उनके हथकंडे होते थे। छोटी उम्र में खूब रो-धोकर, उपद्रव करके मैं बाल कटवाता था।
अब लगता है कि समय बाल कटवाते-कटवाते ही बदलता गया। धीरे-धीरे वह दौर आया जब फट्टा हटा कर गद्दी पर बैठ कर हजामत बनवाई। जवानी में अमिताभ बच्चन का ‘हेयर स्टाइल’ बनवाना चाहता था, लेकिन उतने बड़े बाल पिताजी ने कभी होने नहीं दिए। वे जुल्फों में तब्दील होते बालों का आकार पहचान जाते थे और तत्काल उनकी ‘बलि चढ़ाने’ का इंतजाम हो जाता था। धीरे-धीरे वह समय भी आया जब सामने से सिर के एक-दो बाल सफेद होने शुरू हुए। उन्हें बाल काटने वाले बड़े हुनर के साथ जड़ से काट दिया करते थे। बाद में सफेद बाल इतने हो गए कि हर बार पप्पू ने मशविरा देना शुरू किया कि डाई करवा लो, यानी रंगवा लो। जवाब में मैं अक्सर उसे कह देता था कि व्यर्थ उम्र भर बछड़ा बने रहने का क्या शौक है यार! सफेद बालों को लेकर कभी वैसी चिंता नहीं रही कि उन्हें रंग लूं, हालांकि पप्पू ने सुझाव देना नहीं छोड़ा है। उसे तो भौहों के भी सफेद बाल नागवार गुजरते हैं।
हाल ही एक रविवार जब मैं बाल कटवा रहा था, तब एक पिता अपने किशोर बेटे को लेकर आया। बेटे के सिर पर झउआ भर बाल थे। पिता पप्पू को निर्देश देने लगा कि एकदम छोटे कर दो; जुल्फें लिए फिरता है; एक इंच से ज्यादा बड़े बाल नहीं होने चाहिए। बेटा मुंह बना कर कुर्सी पर बैठ गया। पप्पू का दूसरा कारीगर उसे कपड़ा ओढ़ा कर कैंची चख-चख करने लगा। जुल्फें ‘शहीद’ होने को तैयार थीं! मैं सोच रहा था कि क्या वह बच्चा भी बड़े जतन से बढ़ाए गए अपने बालों को कटते देख उतना ही दुखी होगा, जितना अपने बचपन में मैं होता था! अपने सिर पर अमिताभ बच्चन की तरह ‘हेयर स्टाइल’ देखना सपना ही रह गया!

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