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पश्चिमी उप्र की मुसलिम बहुल सीटों पर सहज नहीं है सपा नेतृत्व PDF Print E-mail
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Thursday, 18 July 2013 10:04

सुरेंद्र सिंघल, देवबंद (सहारनपुर)। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ व मुरादाबाद मंडल की 14 लोकसभा सीटों में से नौ सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा व संभल मुसलिम बहुल हैं। इन सीटों पर मुसलिम मतदाताओं की तादाद 30 से 45 फीसद तक है। इन सभी सीटों पर समाजवादी पार्टी अपने उम्मीदवारों के चयन को लेकर अभी तक ऊहापोह की स्थिति मेंं दिख रही है। कैबिनेट मंत्री आजम खां के पार्टी में बढ़े वर्चस्व और दखल के चलते मुलायम सिंह यादव इन सीटों पर अपने पूर्व में घोषित उम्मीदवारों को बदलने पर मजबूर हो रहे हैं।
मुलायम उप्र में अंदरूनी दबावों और गुटीय चालों के सामने लाचार और बेबस बने हैं। मुसलिम बहुल इन सीटों के पिछले चुनाव नतीजों को देखा जाए तो वे सपा के लिए बेहद निराशाजनक रहे हैं। वैसे तो उन चुनावों में पूरे सूबे में ही सपा का एक भी मुसलिम उम्मीदवार नहीं जीत पाया था। यूपी की सबसे ज्यादा मुसलिम आबादी वाली रामपुर सीट से सपा ने जरूर जीत दर्ज की थी। यहां से जयप्रदा जीती थीं।
38 फीसद मुसलिम मतदाताओं वाले सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र से सपा ने गाडा बिरादरी के फिरोज आफताब को उम्मीदवार बनाया है। यहां से पूर्व सांसद नवाब मंसूर अली खां और पूर्व विधायक इमरान मसूद भी दावेदार थे। फिरोज आफताब की उम्मीदवारी का कई गुट जमकर विरोध कर रहे हैं। देखना है कि नामांकन होने तक फिरोज आफताब उम्मीदवार बने रहते हैं या बदले जा सकते हैं।
कैराना दिवंगत चौ मुनव्वर हसन का मजबूत गढ़ रहा है। उन्होेंने लंबे समय तक मुलायम सिंह के सहारे सफलताएं हासिल कीं। लेकिन लोकसभा चुनाव 2009 से पहले वे बसपा में चले गए थे और उसके उम्मीदवार भी घोषित हो गई थी। उनकी दुघर्टना में मौत के बाद मायावती ने मुनव्वर की पत्नी तबस्सुम को उम्मीदवार बनाया था। जिन्होंने भाजपा के हुकम सिंह और सपा के शादान मसूद को पराजित किया था। सपा ने कैराना में उपयुक्त उम्मीदवार के अभाव में बसपा सांसद तब्बसुम बेगम के बेटे नाहिद हसन को उम्मीदवार घोषित किया है।
मुजफ्फरनगर सीट पर


मुलायम सिंह यादव की पसंद राज्यमंत्री और वैश्य बिरादरी के सम्मानित नेता चितरंजन स्वरूप के बेटे गौरव स्वरूप पर टिकी। पिछले चुनाव में बसपा के कादिर राणा ने रालोद-भाजपा उम्मीदवार अनुराधा चौधरी को हराया था। सपा ने संगीत सोम को उतारा था। कादिर राणा को तगड़ी चुनौती भाजपा से मिल सकती है। जो मजबूत उम्मीदवार की तलाश में लगी है। समीक्षकों का मानना है कि सपा यहां की उम्मीदवारी पर पुनर्विचार कर सकती है।
बिजनौर में मुलायम सिंह यादव ने अजित सिंह की करीबी रही अनुराधा चौधरी की उम्मीदवारी बदलकर आजम खां के विश्वसनीय अमीर आलम पर भरोसा दिखाया है। अभी तक की जानकारियों के मुताबिक अमीर आलम वहां प्रभावी नहीं दिख रहे हैं। लेकिन आजम खां फैक्टर की वजह से मुलायम सिंह अब शायद ही अमीर आलम पर  विचार करें। पिछले लोकसभा चुनाव में भी बिजनौर सीट पर मुलायम सिंह यादव दुविधाग्रस्त रहे थे। पहले उन्होंने हरियाणा के आयातित उम्मीदवार करतार सिंह भड़ाना को टिकट दिया था। लेकिन बाद में उनका टिकट काटकर अजित सिंह के करीबी रहे यशवीर सिंह को उम्मीदवार बनाया था। करतार सिंह भड़ाना एनसीपी के टिकट पर मैदान में डटे रहे थे। रालोद-भाजपा के संजय चौहान बसपा के शाहिद सिद्दीकी को हराकर विजयी हुए थे। 
मुसलिम वोट बैंक में कांग्रेस भी सेंध लगाती है। पिछले लोकसभा चुनावों में मुसलमानों का मुलायम सिंह यादव से पूरी तरह से मोहभंग हो गया था। जिसका लाभ  कांग्रेस और बसपा ने जमकर उठाया। 2012 विधान सभा चुनावों में सपा को सर्वसमाज का वोट मिला। जिस कारण सूबे में उसकी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी। लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का नेतृत्व उस भावना को कायम रखने में नाकाम साबित हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषक नीरज गुप्ता के मुताबिक यदि राज्य सरकार जातीय और मजहबी संतुलन बनाने और उनके बीच समन्वय स्थापित नहींं कर पाती है तो मुलायम सिंह के लिए पिछले लोकसभा चुनाव की तरह मुश्किल भरी साबित हो सकती है।

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