मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
राहत के रास्ते PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Wednesday, 17 July 2013 10:19

रोहित जोशी
जनसत्ता 17 जुलाई, 2013: संदर्भ अगर बदले हों तो दृश्यों और बिंबों के अर्थ बदल जाते हैं। जून की मैदानी गरमी झेलने के बाद घने हरे पहाड़ों में घिरे सफेद बादलों और हल्की रिमझिम बरसात में सफर कितना मनोरम होता! लेकिन हम यह सफर तबाही के बाद कर रहे थे। बादल आशंका पैदा कर रहे थे और बरसात खौफ। लुढ़कते-खिसकते पहाड़ों में जगह-जगह टूटी सड़क से हम राहत का कुछ सामान लेकर मंदाकिनी घाटी की तरफ बढ़ रहे थे। हमारी गढ़वाल की पांच नदियों से मुलाकात हुई- टिहरी में भागीरथी, भिलंगना, रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी, अलकनंदा और फिर कर्ण प्रयाग में अलकनंदा में मिलती पिंडर। अबकी बरसात की शुरुआत में ही इन नदियों में जैसे तबाही फैलाने की कोई होड़ लगी थी। इन पहाड़ी नदियों ने अपने रास्ते में हुए अतिक्रमण को हटा डाला और कुछ जगह अपनी सीमाएं लांघ मानव बस्तियों, खेतों, सड़कों आदि में घुस कर खुद भी अतिक्रमण किया।
ऋषिकेश से ऊपर रास्ते में सड़कों के किनारे ढेर सारे राहत शिविर थे। हमारी गाड़ी को भी बार-बार रोका जा रहा था कि राहत-भोज करते हुए आगे बढ़ें। हालांकि हम आपदा पीड़ित नहीं थे। गुत्थी बाद में खुली। टीवी के परदों और अखबार के पन्नों से उभरी भयानक तस्वीर को देख देश भर से लोगों ने राहत सामग्री से लदी गाड़ियां केदारघाटी की तरफ दौड़ाई थीं। सामग्री लेकर आए उनके प्रतिनिधियों की राहत की समझदारी कुछ यों थी कि वहां जाकर वे बाढ़ में डूब रहे लोगों को एक बिस्कुट का पैकेट थमा कर राहत देना चाह रहे थे। वे ऐसा नहीं कर सके। आपदा की चौतरफा मार से अनभिज्ञ ये भद्रजन प्रभावित इलाकों में गलत हाथों में राहत सामग्री चले जाने के भय से ऋषिकेश लौट गए थे और यहां राहगीरों को भोज करा कर पुण्य कमाने की फिराक में थे!
अगस्त्यमुनि में एक मित्र के घर पर समाचार चैनलों पर खबरें चल रही थीं कि महज दो-तीन हजार फंसे पर्यटकों को ही निकालना शेष है। मानो ये लोग निकल जाएं तो यह बहुआयामी आपदा यहीं खत्म हो जाए। पहले से ही आपदा की भयंकर मार झेल रहे स्थानीय लोगों को इस दरिद्र समझदारी की दूसरी मार भी झेलनी पड़ी है।
मंदाकिनी में समा गए विजयनगर, चंद्रपुरी, अगस्त्यमुनि आदि की तीन से चार सौ इमारतों के परिवारों के पास अब कुछ नहीं बचा। वे राहत शिविरों में हैं। पुराना देवल की सविता देवी के चौबीस कमरों का भवन मंदाकिनी में समा गया। उनके सेवानिवृत्त फौजी पति की सारी जमा पूंजी इसमें लगी थी। किराए पर लगे इन कमरों से ही घर का खर्च चलता था। अगस्त्यमुनि के गजेंद्र रौतेला के चिर-परिचित रेस्तरां ‘सलौण’ में अनाज और सब्जियां खत्म हो चुकी थीं।


गढ़वाली शब्द ‘सलौण’ का मतलब है ‘सौगात’। मगर इन दिनों गजेंद्र के पास अपने मेहमानों के लिए कुछ नहीं है। सड़क किनारे बहती मंदाकिनी के दूसरी ओर पहाड़ में नदी की जद से कुछ ऊपर बसे दलित गांव फलाटी का कोई मकान नहीं बहा। मगर इसके पैदल पुल को मंदाकिनी बहा ले गई। अब उफनती नदी पार करना इस गांव के लोगों के लिए दु:साध्य हो गया है। दस किलोमीटर नीचे दूसरा पुल पार कर तकरीबन बीस किलोमीटर पैदल चल कर वे लोग राहत सामग्री के लिए पहुंचे थे। लेकिन निजी राहत दलों के आपदा प्रभावितों के सर्वेक्षण में सिर्फ वे लोग सूचीबद्ध हैं, जिनके मकान बह गए। यानी इस सूची में फलाटी गांव के लोग आपदा प्रभावित नहीं थे। वे लोग भी आपदा प्रभावित नहीं हैं जो बार-बार टूटी सड़कों या टूटे रास्तों में भीतर कहीं सुदूर गांव में बसे हैं, भले उनके पास खाने को भी कुछ नहीं बचा था। चूंकि उनके मकान नहीं बहे या टूटे, इसलिए वे आपदा पीड़ित नहीं हैं!
सड़क जहां तक ठीक है, वहां तक तो ढेर सारी राहत सामग्री पहुंची, लेकिन उससे आगे यह सामग्री कैसे पहुंचे! पर्वतारोहण के अनुभवी कुछ समूह अपने थैलों में राहत सामग्री और दवा वगैरह भर कर आगे के गांवों की तरफ बढ़ तो रहे थे, लेकिन वह नाकाफी था, फिर भी सार्थक था। हमने भी यही किया। दो दिन के बाद हमारे पास राहत का सामान खत्म हो चला था।
अकेले लौटते हुए सड़क के बार-बार टूटे होने से तकरीबन बारह जगह गाड़ी बदलनी पड़ी। ग्वालदम में एक तहसीलदार और उनके दल से मुलाकात हुई। इस पूरे इलाके में यह पहला सरकारी दल था, जिससे मेरी भेंट हुई। इससे पहले सरकारी अमले के नाम पर सड़क साफ करते कर्मी ही दिखाई दिए थे। पिंडरघाटी के दूरदराज के इलाके का जायजा लेकर लौट रहे इस दल से मैंने बागेश्वर तक की लिफ्ट ली। रास्ते में मैंने प्रभावितों को दी जाने वाली मुआवजे की राशि जाननी चाही तो यह चौंकाने वाली थी। सबसे ज्यादा मुआवजा एक व्यक्ति को तेईस सौ रुपए का मिला था।
उत्तराखंड की नदियों के जलागम में बसे स्थानीय लोग, जिनकी सारी संपत्ति इस आपदा में लुट गई, उनके साथ मुआवजे के नाम पर यही भद््दा मजाक होना है। राहत बजट के बंदरबांट में आपदा की भीषण मार झेल रहे लोगों के हाथ मायूसी के सिवा कुछ नहीं आना है! पुरानी आपदाओं के यही अनुभव हैं।

फेसबुक पेज को लाइक करने के क्लिक करें-          https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें-      https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?