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खौफ का कानून PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 July 2013 10:16

जनसत्ता 17 जुलाई, 2013: यह बेहद अफसोस की बात है कि मानवाधिकारों की कसौटी पर हमारे जनतंत्र की कोई खुशनुमा तस्वीर नहीं उभरती। मानवाधिकार हनन की घटनाएं होती रहती हैं। यही नहीं, कई कानून भी इसमें सहायक हैं। इनमें सबसे खास है अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून, जो कश्मीर के अलावा पूर्वोत्तर में भी कई जगह लागू है। कभी उग्रवाद से निपटने के नाम पर लाया गया यह कानून लंबे समय से देश के इन हिस्सों में खौफ का पर्याय बना हुआ है। इसे खत्म करने की मांग इन राज्यों के लोगों और मानवाधिकार संगठनों की ओर से बराबर उठती रही है। लेकिन केंद्र ने इसे हमेशा अनसुना किया है। अब सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से गठित समिति ने भी इस कानून के औचित्य पर सवालिया निशान लगाया है। पूर्व जज न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े की अध्यक्षता में इस साल जनवरी में गठित हुई समिति को मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ के कुछ मामलों की जांच का जिम्मा सर्वोच्च अदालत ने सौंपा था। समिति में पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त जेएम लिंग्दोह और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रह चुके अजय कुमार सिंह भी शामिल थे। अदालत को समिति के गठन की जरूरत एक याचिका पर सुनवाई के दौरान महसूस हुई।
मणिपुर में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए लोगों के परिजनों की ओर से दायर की गई इस याचिका में डेढ़ हजार से ज्यादा लोगों के फर्जी मुठभेड़ों में जान गंवाने की बात कही गई थी। अलबत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने समिति को ऐसी सिर्फ छह शिकायतों की जांच करने को कहा। हेगड़े समिति जांच के बाद इस नतीजे पर पहुंची है कि सभी छह मामलों में मुठभेड़ को विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। ये अफस्पा के चरम दुरुपयोग के उदाहरण हैं। समिति ने अफस्पा को कानून का मखौल करार दिया है। इसलिए कि एक ओर यह कानून बड़े पैमाने पर निर्दोष लोगों के सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने का सबब बना है और दूसरी ओर, उग्रवाद पर काबू पाने के जिस मकसद से यह लागू


हुआ था उसमें नाकाम साबित हुआ है। ध्यान रहे, समिति की ओर से की गई जांच का निष्कर्ष पूरी हकीकत का छोटा-सा अंश भर है। जब भी इस कानून को वापस लेने की मांग उठी, केंद्र की ओर से यह दावा किया गया कि अफस्पा का बेजा इस्तेमाल न हो सके इसके लिए उसने निगरानी की व्यवस्था कर रखी है। सर्वोच्च न्यायालय में दिए अपने हलफनामे में भी उसने यही दोहराया। मगर हेगड़े समिति का कहना है कि उसे कोई निगरानी व्यवस्था होने का तथ्य अभी तक नहीं मिला है।
बहरहाल, केंद्र को गलत दावे करने के बजाय अफस्पा को वापस लेने के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन चाहे कश्मीर से अफस्पा को हटाने की बात हो या मणिपुर से, केंद्र सरकार ने एक दलील गढ़ ली है, यह कि सेना इसके लिए राजी नहीं है। मगर एक लोकतांत्रिक देश में नीतिगत निर्णय सेना करती है या सरकार? सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून सुरक्षा बलों को किसी भी वक्त छापा डालने, तलाशी लेने, गिरफ्तार करने से लेकर मार डालने तक असीमित अधिकार देता है। जबकि इस कानून के दुरुपयोग से अपना बचाव करने का कोई हक नागरिकों को नहीं है। सैन्य अधिकारी यह कहते रहे हैं कि मानवाधिकार हनन के मामलों को तूल नहीं देना चाहिए, क्योंकि आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के दौरान अनजाने में किसी निर्दोष की भी जान जा सकती है। क्या बेगुनाहों के मारे जाने की सभी घटनाएं किसी वांछित अभियान के दौरान ही हुई हैं? अगर ऐसा है, तो फिर बलात्कार के उन मामलों के बारे में क्या कहेंगे जिनमेंआरोप सुरक्षा बलों पर हैं? फर्जी मुठभेड़ों को लेकर सर्वोच्च अदालत ने कई बार चिंता जताई है और ऐसी घटनाओं को वर्दी में की गई हत्या करार दिया है। ऐसी संवेदनशीलता हमारे शासनतंत्र में क्यों नहीं दिखती?

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