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परिवर्तन की पोल PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 July 2013 10:15

जनसत्ता 17 जुलाई, 2013: पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों के पहले चरण में भी छिटपुट हिंसा हुई थी, मगर दूसरे दौर का मतदान कहीं ज्यादा हिंसक रहा। माकपा की एक उम्मीदवार के पति समेत तीन लोगों की हत्या हो गई। इसके अलावा बम फेंकने, बूथ कब्जा करने और विभिन्न समूहों के बीच झड़प की भी खबरें आई हैं। जबकि मतदान के अभी कई चरण बाकी हैं। इन घटनाओं को देखते हुए स्वाभाविक ही यह सवाल उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल में शांतिपूर्ण चुनाव करा पाना वाकई बहुत कठिन है? प्रगतिशील समझे जाने वाले इस राज्य में चुनावी हिंसा की इतनी ज्यादा घटनाएं क्यों होती हैं? माकपा ने इस हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी सरकार को जिम्मेवार ठहराया है। विपक्षी दलों का यह भी आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस ने जम कर धांधली की है। इन आरोपों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। पिछले महीने माकपा के पूर्व विधायक दिलीप सरकार की हत्या हुई थी। तब भी तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों पर ही इस कांड को अंजाम देने के आरोप लगे थे।
पंचायत चुनावों के लिए नामांकन पांच जून को शुरू हुआ। तब से पिछले महीने ही ग्यारह लोग मारे जा चुके थे। इनमें ज्यादातर विपक्षी दलों के कार्यकर्ता और समर्थक थे। तृणमूल के भी दो कार्यकर्ता चुनावी हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। इसका जिक्र कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यह जताने की कोशिश करती रही हैं कि केवल तृणमूल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; हिंसा दोनों तरफ से हुई है। पर यहां सवाल राज्य सरकार की जवाबदेही का है। अपनी पार्टी के   एक-दो लोगों के मारे जाने का हवाला देकर मुख्यमंत्री इससे पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। पंचायत चुनावों में हिंसा होने का अंदेशा पहले से था। यही नहीं, कोलकाता उच्च न्यायालय ने इसके मद््देनजर


राज्य सरकार से हर हाल में सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा था। विपक्षी दलों ने केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात करने की मांग की थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने न विपक्षी दलों की मांग को तवज्जो दी न उच्च न्यायालय के निर्देश को गंभीरता से लिया। ऐसे में मतदान के अगले चरणों में भी हिंसा होने की आशंका बढ़ गई है।
अगर राज्य सरकार पंचायत चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न नहीं करा सकती तो इससे उसकी नाकामी जाहिर होती है। पर यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रतिद्वंद्विता को खूनी मोड़ लेते देर नहीं लगती। न सिर्फ विभिन्न दलों के बीच बल्कि एक दल के अलग-अलग गुटों के बीच भी वर्चस्व की होड़ हिंसक शक्ल अख्तियार कर लेती है। पिछले यानी 2008 के पंचायत चुनावों में भी कम हिंसा नहीं हुई थी। तब सत्ता पर माकपा काबिज थी और उसके लोग हथियार लहराते और विपक्षी कार्यकर्ताओं को डराते-धमकाते घूम रहे थे। अब सत्ता तृणमूल के हाथ में है तो चुनावी हिंसा का गणित बदल गया है; बहुत-से निहित स्वार्थ वाले और उपद्रवी तत्त्व पाला बदल कर उसकी तरफ आ गए हैं। लेकिन माकपा को भी अपने गिरेबान में झांकना होगा क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का क्रम दो साल पहले, तृणमूल के सत्ता में आने के साथ नहीं शुरू हुआ। इसका सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है। ममता बनर्जी परिवर्तन के नारे पर सत्ता में आई थीं। पर उनके अब तक के कार्यकाल में राज्य के लोगों को निराशा ही हाथ लगी है।

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