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सरलीकरण के नाम पर भाषा में नए-नए प्रयोग उचित नहीं: शास्त्री PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 July 2013 09:56

जनसत्ता ब्यूरो, नई दिल्ली। प्रसिद्ध संस्कृत कवि और समालोचक प्रो. सत्यव्रत शास्त्री ने मंगलवार को यहां कहा कि हर भाषा की अपनी पहचान होती है और उसका एक स्वरूप होता है, जिसे धूमिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उसे इतना अधिक तोड़ना-मरोड़ना नहीं चाहिए कि वह किसी और भाषा की छायामात्र लगने लगे। प्रो. शास्त्री ने कहा कि भाषा में विकृति, उसके स्वरूप के साथ छेड़छाड़ और सरलीकरण के नाम पर उसमें नए-नए प्रयोग उन्हें कभी रास नहीं आए।
सत्यव्रत शास्त्री यहां साहित्य अकादेमी सभागार में आयोजित महत्तर सदस्यता अर्पण समारोह में अपना स्वीकृति भाषण दे रहे थे। अकादेमी ने मंगलवार को उन्हें महत्तर सदस्यता के रूप में अपना सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया। अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने सम्मान स्वरूप प्रो. शास्त्री को शॉल और स्मृति चिन्ह भेंट किया।
इस मौके पर प्रो. शास्त्री ने संस्कृत में समीक्षक के लिए प्रयोग होने वाले ‘सहृदय’ शब्द की चर्चा करते हुए कहा कि बिना सहृदय हुए समीक्षा नहीं की जा सकती। सहृदय वह है जिसका हृदय मूल लेखक जैसा होता है। मूल लेखक के हृदय की थाह लिए बिना उसके साथ न्याय नहीं हो सकता। वह क्या सोचता है, किन परिस्थितियों में, किस मनोभाव में उसने रचना की यह जानना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कवि मनोभावों के उद्वेग में लिखता है। किस शब्द का कहां और कैसे प्रयोग किया जाए, यह उसकी रचना करते समय की प्रक्रिया नहीं होती। शब्द उस प्रक्रिया के सहचर बन स्वत: आते-जाते हैं। उनका औचित्य-अनौचित्य उसका (कवि का) विषय नहीं है। यह विषय सहृदय यानी समीक्षक का है। उन्होंने कहा कि जहां रचनाकार की भूमिका समाप्त होती है, वहीं से सहृदय की प्रारंभ होती है।
अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में कहा कि दुनिया की अत्यंत


प्राचीन भाषा संस्कृत के विद्वान को सम्मानित करना अकादेमी के लिए प्रसन्नता की बात है। उन्होंने कहा कि संस्कृत अत्यंत संगीतात्मक और लयात्मक भाषा है। मैक्स म्यूलर ने ठीक ही कहा था कि भारत को जानने के लिए इसके संस्कृत-पाठ को जानना जरूरी है। उन्होंने मिथकीय चरित्रों के आदर्शों के प्रभाव का उल्लेख करते हुए पूछा कि अगर रामायण और महाभारत नहीं होते तो हम लोग जो आज हैं और जैसा हमारा मन है, क्या हमारा मन वही होता। उन्होंने कहा कि संस्कृत की महान कृतियों ने भारतीय मन का निर्माण किया। उन्होंने कहा कि इतनी प्राचीन भाषा संस्कृत आज हमारे व्यवहार से लुप्त हो गई है। अगर इस समृद्ध भाषा के प्रति हमारा प्रेम और  लगाव फिर से उसी तरह हो सके तो यह भारत के लिए गौरव की बात होगी।
तिवारी ने शास्त्री जी की विनम्रता को उनकी विद्वता से जोड़ते हुए कहा- यह सही है कि विद्या विनय देती है। उन्होंने कहा कि हमारे देश में बहुत सारे विद्वान हैं, लेकिन अकादेमी के नियम की सीमा के कारण हम महत्तर सदस्यों की संख्या नहीं बढ़ा पा रहे हैं। अकादेमी की इच्छा है कि अन्य भाषाओं के विद्वानों को भी यह सम्मान दिया जाए।
इससे पहले अकादेमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने अतिथियों का स्वागत और प्रशस्ति-वाचन किया। धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के उपाध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने किया। बाद में अकादेमी के संस्कृत परामर्श मंडल के संयोजक राधावल्लभ त्रिपाठी की अध्यक्षता में संवाद कार्यक्रम हुआ जिसमें सत्यव्रत वर्मा, हरेकृष्ण सतपथी, कमल आनंद और एस रंगनाथ ने अपने विचार रखे। इस सत्र में धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने किया।

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