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न्यायाधिकरणों की दयनीय हालत पर कोर्ट नाखुश PDF Print E-mail
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Wednesday, 17 July 2013 09:40

जनसत्ता ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नौकरशाही के रवैए पर नाराजगी जताते हुए मंगलवार को कहा कि अपर्याप्त बुनियादी सुविधाओं के अभाव में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण सहित तमाम न्यायाधिकरणों का कामकाज दयनीय हालत में है।

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने न्यायाधिकरणों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा-यह दयनीय है। समझ में नहीं आता कि जज ऐसे काम स्वीकार करने के लिए कैसे तैयार हो जाते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि बुनियादी सुविधाओं और कर्मचारी मुहैया कराने के लिए इस अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।
नाराज न्यायाधीशों ने कहा-नौकरशाही का यह कैसा रवैया है। हम आहत हैं कि भारतीय प्रेस परिषद तक के पास अपना कार्यालय नहीं है। हम विस्मित हैं कि विधि आयोग कनाट प्लेस में कहीं पर है। कितना किराया है? एक करोड़ रुपए। विधि आयोग का पुस्तकालय सुप्रीम कोर्ट के सामने स्थित भारतीय विधि संस्था की इमारत में है। न्यायाधीशों ने कोलकाता में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के लिए अपर्याप्त बुनियादी सुविधाओं और इसके सदस्यों के आवास की स्थिति से संबंधित मसले पर विचार के दौरान तीखी टिप्पणियां कीं।
अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (पर्यावरण) त्रिलोचन सिंह को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार अच्छी बुनियादी सुविधाएं और सदस्यों को उचित आवास मुहैया कराने में असफल रही तो फिर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को रांची या गुवाहाटी स्थानांतरित करने का आदेश देने के लिए उसे बाध्य होना पड़ेगा।
अदालत ने त्रिलोचन सिंह से कहा कि वे राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी


के साथ विचार विमर्श कर न्यायाधिकरण की पीठ को क्रियाशील बनाने के प्रयास करें। इसके बाद अदालत ने इस मामले की सुनवाई दो अगस्त के लिए स्थगित कर दी। उस दिन पश्चिम बंगाल सरकार कोलकाता के न्यू टाउन इलाके में न्यायाधिकरण के सदस्यों के लिए आवासीय सुविधा मुहैया कराने के सुझाव पर गौर करेगी।
अदालत ने पुणे स्थित हरित न्यायाधिकरण की पीठ में भी एक अगस्त से काम शुरू  करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए उपलब्ध आवासीय सुविधा और उनके लिए कामकाज के माहौल पर भी अप्रसन्नता जाहिर की। न्यायाधीशों ने कहा कि स्टेनोग्राफर जज के घर नहीं आते हैं। वे दो टूक शब्दों में कहते हैं कि जजों के घर आना उनका काम नहीं है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण से संबंधित तमाम मुद्दों पर विचार के दौरान अदालत ने मेघालय में पर्यावरण के क्षरण का भी जिक्र किया और कहा कि वहां बड़े पैमाने पर पहाड़ियों को नुकसान पहुंचा है।
इस बीच केंद्र ने अदालत को सूचित किया कि पूर्वी भारत में हरित न्यायाधिकरण की पीठ स्थापित करने में आठ से 12 महीने का और विलंब होगा। शीर्ष अदालत ने 15 मार्च के आदेश में भोपाल, पुणे और कोलकाता में हरित न्यायाधिकरणों में 30 अप्रैल से काम शुरू  करने का निर्देश दिया था। साथ ही अदालत ने कहा था कि ऐसा नहीं होने पर संबंधित राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर जवाब देना होगा।

 

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