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इंटरनेट पर अश्लीलता से बच्चों को बचाने की पहल PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 July 2013 17:27

प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता। इंटरनेट और खुले बाजार में आसानी से उपलब्ध अश्लील सामग्री की वजह से बच्चों का तेजी से नैतिक पतन हो रहा है। पढ़ने की उम्र में वह इन पर चर्चा कर रहे हैं। उनमें अश्लील सामग्री के प्रति कई तरह की भ्रांतियां भी हैं। बच्चों को इसके कुप्रभाव से बचाने के लिए कोलकाता में गैर सरकारी संगठन उम्मीद ने कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें इंटरनेट पर अश्लील सामग्री पर अंकुश लगाने के प्रभावी उपायों पर भी चर्चा की गई। इसमें यह तथ्य भी सामने आया कि बच्चों के यौन शोषण की शुरुआत उनके करीबी ही करते हैं।
कार्यशाला में महानगर के कई स्कूलों के शिक्षकों ने हिस्सा लिया और अपने विचार रखे। इन शिक्षकों को यह भी बताया गया कि यौन संबंधी बच्चों की जिज्ञासा को कैसे शांत किया जाए। कार्यशाला में जुटे शिक्षकों ने इसे एक खतरनाक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि ज्यादातर शिक्षकों या अभिभावकों को यह पता नहीं है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए।
एक शिक्षक ने इसकी मिसाल देते हुए बताया कि कोलकाता के एक बेहद प्रतिष्ठित स्कूल के नौ साल के एक छात्र को उसके सहपाठी ने जन्मदिन पर एक सीडी भेंट की। इसमें कार-रेंसिग का खेल था। लेकिन उस बच्चे ने जब उस सीडी को अपने लैपटाप में चलाया, तो अश्लील वीडियो चलने लगा। संयोग से उसके पिता ने वह देख लिया और वह सीडी उससे ले ली।
कार्यशाला में शामिल शिक्षकों ने कहा कि ऐसे मामलों पर अंकुश लगाना बेहद मुश्किल है। सीडी और वेबसाइटों के जरिए बच्चों को आसानी से अश्लील सामग्री हासिल हो रही है। उम्मीद की ओर से आयोजित इस दो दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य शिक्षकों को छात्रों में यौन विषय के प्रति पनपने वाली भ्रांतियों से निपटने के सही तरीके बताना था। 
एक शिक्षक ने कहा कि मौजूदा दौर में नौ से 12 साल के छात्र सोशल नेटवर्किंग साइटों पर वर्चुअल डेटिंग का शिकार हो रहे हैं। इस खेल में हाथ पकड़ने से लेकर कमरे में साथ जाने तक के वीडियो मौजूद हैं। उसका कहना था कि यह वीडियो खेल के तौर पर है। लेकिन इससे छोटी उम्र के छात्र अश्लील सामग्री की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। उम्मीद की प्रमुख सलोनी प्रिया कहती हैं कि यह जान कर आश्चर्य होगा कि ज्यादातर बच्चों का यौन शोषण घर पर उनके करीबी लोग ही करते हैं। यही वजह है कि


वह दूसरों को इस बारे में नहीं बता पाते।
सलोनी बताती हैं कि छोटी उम्र के बच्चों की यौन उत्सुकता बढ़ रही है। पहले हम जिन चीजों को मजाक में उड़ा देते थे, उसे अब बच्चे अपना रहे हैं। उनका कहना था कि टीवी पर आने वाले तमाम विज्ञापनों में महिलाओं को जिस तरह दिखाया जाता है, उससे कम उम्र के बच्चों पर प्रभाव पड़ता है। यही वह समय है जब शिक्षकों व अभिभावकों को शालीनता से उनकी जिज्ञासाओं को शांत करना चाहिए। वे कहती हैं कि हम छात्रों को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि कम उम्र में यौन शोषण के नतीजे खतरनाक हो सकते हैं। स्कूलों में बुलिंग यानी धमकाने से बच्चों को बचाने के लिए आक्रामक छात्रों के अलावा दूसरों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
सलोनी के मुताबिक, छात्रों में यह भावना भरनी चाहिए कि लड़कों और लड़कियों में कोई अंतर नहीं है। इससे समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी। एक शिक्षक का कहना था कि छात्रों को तीसरी कक्षा से ही लिंग भेद के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। इसके लिए अभिभावकों को भी पहल करना जरूरी है।
कार्यशला में शामिल शिक्षकों का कहना था कि अब ज्यादातर भारतीय घरों में इंटरनेट की सुविधा है, लेकिन माता-पिता इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उनका बच्चा इसका कैसा इस्तेमाल कर रहा है। बच्चे इंटरनेट से कुछ सिखने के बजाय उसका दुरूपयोग कर रहे हैं। जब तक माता पिता को इस बात का अहसास होता है, उनका बच्चा अपनी उम्र से पहले बड़ा हो जाता है। लोगों का कहना था कि आजकल बच्चे अपनी बोलचाल में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते है जो कल तक कोई सोच भी नहीं सकता था। एक शिक्षिका ने कहा कि अब यह बहुत जरूरी हो गया है कि अभिभावक बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें और उन्हें बिगड़ने और उम्र से पहले बड़ा होने से रोकें। 
यह तथ्य भी उभर कर आया कि मौजूदा दौर में अक्सर माता-पिता के कामकाजी होने की वजह से वे बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते और इसकी भरपाई वे उनको ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं देकर करना चाहते हैं। ऐसे में बच्चे घर में अकेले रह कर टीवी और इंटरनेट का गलत इस्तेमाल करने लगते है।

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