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8 साल बाद अब मुंबई में फिर गुलजार होंगे डांस बार PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 July 2013 12:14

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने डांस बार पर प्रतिबंध लगाने संबंधी महाराष्ट्र सरकार के निर्णय को रद्द करने के बंबई उच्च न्यायालय के फैसले को आज बरकरार रखा। न्यायालय ने फैसला दिया कि राज्य सरकार द्वारा डांस बार को बंद करना गलत था। इसके साथ ही सात साल तक बंद रहने के बाद राज्य में अब डांस बार फिर से संचालित करने का रास्ता साफ हो गया है। मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर और न्यायमूर्ति एस एस निज्जर की एक खंडपीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को लागू करने पर लगे स्थगनादेश को भी रद्द कर दिया।
महाराष्ट्र सरकार ने 2005 में बंबई पुलिस अधिनियम में संशोधन किया था जिसे रेस्तरां और बारों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक संघ ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने 2006 में सरकार का आदेश रद्द कर दिया था। इसके बाद इसी वर्ष राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी।
उच्चतम न्यायालय ने सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी।

 

 

राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कहा था कि बीयर बार की आड़ में वैश्यावृत्ति का धंधा किया जा रहा हैै और इन बारों में अभद्र एवं अश्लील नृत्य पेश किए जाते हैं जो कि समाज की प्रतिष्ठा के खिलाफ हैं।
सरकार ने यह भी कहा था कि राज्य में केवल 345 डांस बार ऐसे हैं जिनके पास लाइसेंस है जबकि 2500 बार ऐसे हैं जिनके पास


लाइसेंस भी नहीं है।
इस बीच डांस बार, रेस्तरां और बार बालाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न संगठनों ने दलील दी कि बंबई पुलिस :संशोधन: अधिनियम, 2005 की प्रस्तावना में कहा गया है कि लोगों के आनंद के लिए नृत्य प्रस्तुतियां देना स्वीकार्य है। उच्च न्यायालय ने इस संशोधन को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।
इन संगठनों ने यह भी कहा था कि डांस बार में 70,000 से अधिक महिलाएं काम करती हैं। इनमें से कई महिलाएं बेरोजÞगारी और आर्थिक तंगी के कारण पहले ही आत्महत्या कर चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि 72 प्रतिशत बार बालाएं विवाहित हैं और 68 प्रतिशत बार बालाएं परिवार की एकमात्र कमाई करने वाली सदस्य हैं। ऐसे में राज्य सरकार के निर्णय ने उन्हें बेरोजÞगार बना दिया है। उच्च न्यायालय ने सरकार के इस आदेश को मनमाना और असंवैधानिक करार देते हुए रद्द करके सही किया है।
संगठनों ने यह भी कहा कि अधिनियम का विवादित भाग मनमाना और भेदभावपूर्ण है क्योंकि इसमें उन स्थानों पर नृत्य प्रस्तुतियों को स्वीकृति दी गई है जहां समाज के अमीर वर्ग के लोग आते है लेकिन छोटे डांस बारों में प्रस्तुतियों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। (भाषा)

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