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निजता का हनन PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 July 2013 10:13

अनूप कुमार मिश्रा
जनसत्ता 16 जुलाई, 2013: अमेरिका के इलेक्ट्रॉनिक खु़फिया कार्यक्रम ‘प्रिज्म’ का भंडाफोड़ करके उसके अपने ही नागरिक एडवर्ड स्नोडेन ने जहां एक ओर वैश्विक बिरादारी को सचेत कर दिया, वहीं निजता के अधिकार संबंधी बहस को एक नया आयाम दिया है।

‘गार्डियन’ और ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ अखबारों में हुए इस खुलासे से यूरोप समेत विभिन्न महाद्वीपों के देश अमेरिका के इस संदेहास्पद कृत्य से आशंकित हैं। अमेरिका की यूरोपीय देशों के साथ होने वाली अब तक की सबसे बड़ी मुक्त व्यापार संधि अधर में लटकती दिख रही है। कई देश अमेरिका से इस बाबत स्पष्टीकरण और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न होने का आश्वासन चाह रहे हैं। हालांकि आंकड़े चुराने का काम केवल अमेरिका नहीं कर रहा है, बल्कि फ्ऱांस और इग्लैंड समेत विभिन्न देश भी इस गतिविधि में लिप्त हैं। हाल ही में फ्ऱांस के अखबार ‘ली मोंडे’ ने खुलासा किया कि वहां की खु़फिया मशीनरी भी चोरी-छिपे इस काम में मसरूफ है। उदारवादी लोकतंत्र इंग्लैंड की खु़फिया एजेंसी जीसीएचक्यू हालांकि प्रत्यक्ष रूप से अपने नागरिकों के संप्रेषण और टिप्पणियों की निगरानी नहीं कर रही, लेकिन अमेरिका के समपार्श्व कार्यक्रम से आंकड़ों का आदान-प्रदान कर रही है। ‘प्राइवेसी इंटरनेशनल’ ने इसके खिलाफ वहां के अधिकरण में एक याचिका भी दाखिल की है।
यह दुखद है कि भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद अमेरिकी सर्विलांस प्रोग्राम को जासूसी नहीं, सुरक्षा के लिए सूचनाएं हासिल करना मानते हैं। उनके अमेरिका के सुर में सुर मिलाने के सिवा कोई चारा भी नहीं है, क्योंकि भारत ने 2011 में केंद्रीय निगरानी प्रणाली की घोषणा की थी जो नब्बे करोड़ फोन ग्राहकों और करोड़ों इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं की जांच-पड़ताल कर सकती है। यानी हमारी किसी से फोन पर निजी बातचीत, इ-मेल से भेजे गए संदेश, सोशल नेटवर्किंग, वीडियो साझा करना, वेबलॉग, माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट आदि पर डाली गई अंतर्वस्तु, इंटरनेट सर्च आदि का विवरण हमारे ‘बिग बॉस’ रख सकते हैं। निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में आम जनता की भागीदारी की दुहाई देने वाली सरकार ने निजता से ताल्लुकात रखने वाले इस कार्यक्रम के संबंध में कोई सार्वजनिक चर्चा तक नहीं की।
सवाल है कि सरकारें सामाजिक सुरक्षा के मद में खर्च की कटौती करके बड़े पैमाने


पर ‘डाटा विलांस’ के भारी-भरकम बजट का बोझ खुशी से क्यों उठाती हैं! दरअसल, मोबाइल फोन और न्यू मीडिया की अंतर्वैयक्तिक और जन संप्रेषणीयता लोगों को लामबंद करने और इस प्रकार सामाजिक गत्यात्मकता लाने में महती भूमिका निभा रही है। उदारवादी निरंकुश सरकारों को यह गवारा नहीं कि यह मोर्चेबंदी उनके लिए परेशानी का सबब बने।
जर्मन मीडियाविद जुर्गेन हैबरमास ने अपने ‘पब्लिक स्फीयर’ के सिद्धांत में असली लोकवृत्त कॉफी हाउस को बताया था। मतलब वह अंतर्वैयक्तिक संवाद को लेकर ज्यादा आशान्वित थे। मास मीडिया के आगमन पर उन्हें निराशा हुई, क्योंकि फिल्में, बड़े अखबार समूह, टेलीविजन आदि के मानवीय रुचि के निचले स्तर को तुष्ट करने की दौड़ में शामिल होने की प्रवृत्ति से वे वाकिफ थे। न्यू मीडिया के प्रादुर्भाव से उन्हें फिर उम्मीद बंधती है। न्यू मीडिया पारस्परिक और बहुपक्षीय संवाद, सूचनाओं को साझा करने, टिप्पणी-प्रतिटिप्पणी करने, नेटवर्क स्थापित करने, समर्थन जुटाने आदि गुणों से संपन्न है। लेकिन इस आभासी दुनिया के संचालन के लिए वास्तविक संसार की सरकारों को सहिष्णु होना होगा। दुर्भाग्यवश आज वह सहिष्णुता नहीं रह गई है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के निधन पर बंद को पसंद न करने पर दो लड़कियों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 अ के तहत पुलिस प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। जनता की बेबाक टिप्पणियों से डरी-सहमी सरकार ने मुंबई पुलिस की देखरेख में एक विशेष प्रकोष्ठ का गठन किया, जिसे न्यू मीडिया पर गिद्धदृष्टि रखने का जिम्मा सौंपा गया।
यों मीडियाविद जैनसेन ने बहुत पहले ही आगाह कर दिया था कि न्यू मीडिया में निगरानी करना बहुत आसान होता है। उन्होंने ‘ई-पैनोप्टिकन’ की अवधारणा दी। बकौल जैनसेन, नया मीडिया उस कारागार के समान है जिसमें सभी इमारतें एक केंद्रीय कक्ष के चारों ओर बनाई जाती हैं। इससे सभी इमारतों और सभी मंजिलों पर निगहबानी करना आसान होता है। प्रिज्म और सीएमएस के रूप में यह अवधारणा हकीकत में तब्दील हो रही है।

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