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नाम में क्या रखा है PDF Print E-mail
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Tuesday, 16 July 2013 10:09

मुरारीलाल थानवी
जनसत्ता 16 जुलाई, 2013: इकबाल साथी है। हमारे साथ अनौपचारिक शिक्षा की ‘दूसरा दशक’ मुहिम में काम करता है। हम सब उसे इकबाल नाम से बुलाते हैं। उसके सभी कागज-पत्रों में भी इकबाल ही लिखा होता है। इकबाल खान या इकबाल मोहम्मद या इकबाल मेहर नहीं। लेकिन फलोदी के आइसीआइसीआइ बैंक ने अपने सामने इकबाल के लिए इस अकेले नाम से संकट अनुभव किया है। वहां के बैंक अधिकारी कहते हैं, यह क्या नाम हुआ भला? आगे-पीछे भी तो कुछ हो! हमने उनसे सवाल किया है कि क्यों हो?
‘दूसरा दशक’ के तीन कार्यकर्ता इकबाल के साथ खाता खुलवाने बैंक गए। इकबाल के साथ गए रेवंत राम, अनिल कंवर और हरीश कुमार के खाते तो बैंक वालों ने खोल दिए, लेकिन इकबाल का खाता खोलने से इनकार कर दिया। इकबाल ने जब कारण पूछा तो जवाब मिला- अकेले इकबाल नाम से खाता नहीं खुलता। इसके बाद उन्होंने इकबाल से पूछा- आप नाम के पीछे खान या मोहम्मद कुछ तो लगाते होंगे, जैसे आपके साथियों ने राम, कंवर और कुमार लगा रखा है! इकबाल ने कहा- नहीं, मेरा नाम इतना ही है। पहली कक्षा से लेकर बीए की पढ़ाई तक ऐसा ही रहता आया है।
इकबाल ने बैंक प्रबंधक को दसवीं की अंक तालिका, मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड, मूल-निवासी प्रमाण-पत्र आदि दिखा कर कहा कि सभी दस्तावेजों में मेरा नाम इकबाल है। मगर बैंक वालों पर इन दस्तावेजों का कोई असर नहीं हुआ। वे बोले कि दो शब्दों के नाम के बगैर खाता नहीं खुल सकता। खाता खुलवाना है तो इकबाल के पीछे अब कुछ लगा लो। इकबाल को परेशान देख बैंक अधिकारी ने ही रास्ता सुझाया- तुम अपने नाम के पीछे खान या मोहम्मद या कुछ भी जोड़ कर अपने सरपंच से प्रमाणित करा कर ले आओ, हम खाता खोल देंगे।
इतना सब कुछ झेलने के बाद इकबाल को लगा, बैंक में खाता खोलने के लिए नाम बदलने के सिवा उसके सामने कोई चारा नहीं है।
मैंने सुनी कहानी आपको बताई है। मेरे मन में शंका खड़ी हुई थी कि कहीं यह नाहक परेशान करने का मामला तो नहीं है! सो, अगले दिन मैं बैंक मैनेजर


से मिला। मैंने सवाल किया- इकबाल को खान क्यों बनाते हैं?
उन्होंने वही बातें दुहरा दीं जो कल इकबाल को कही थीं। उनमें एक बात जोड़ी- महज इकबाल लिखने से कोई उनके खाते से फर्जी लेन-देन कर सकता है। उन्होंने रिजर्व बैंक की गाइड लाइन का उल्लेख किया, ‘अपने ग्राहक को जानिए’ (केवाईसी) के नियम भी बताए। मैंने कुछ तर्क करने की कोशिश की, पर विफल रहा। वे यह भी बोले कि खाता खोलने के लिए हमें मंजूरी लेनी पड़ती है। अगर हम इन दस्तावेजों के साथ फॉर्म ऊपर भेज भी देते हैं तो वहां से नामंजूर होकर लौट आएगा।
जाहिर है, नाम बदलने के सिवा इकबाल के सामने अब कोई रास्ता नहीं बचा था। अब तो सरपंच ने भी इकबाल को इकबाल खान नाम से प्रमाणित कर दिया है। बैंक ने खाता खोलने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उम्मीद है अब खाता खुल जाएगा और इकबाल को (पासबुक आदि में) नया नाम भी मिल जाएगा!  सवाल है कि बैंककर्मियों के तर्क और नियम-कायदे क्या हमें ठीक से समझा सकते हैं कि देश के निवासी को अपनी पहचान साबित करने के लिए दो शब्दों की जरूरत क्यों है? धर्म-पंथ निरपेक्ष राज्य में जाति या सरनेम लगाना क्यों अनिवार्य है?
क्या नाम के पीछे खान, कुमार, कुमारी, लाल, चंद, हुसैन, कंवर, मोहम्मद या राम को बिठाना जरूरी है, खास कर बैंक वालों के लिए? खुद को अच्छा लगे तो अपने नाम के पीछे कोई जितना चाहे लिखे- एक, दो, तीन या चार शब्द! पर पहचान करने को व्यक्ति के तमाम दस्तावेजों के साथ फोटो भी तो होता है! दस्तखत और अंगूठा भी ले लो। फिर नाम छोटा हो या बड़ा, क्या फर्क पड़ता है? आइसीआइसीआई बैंक वालो, पहचान करनी है तो फोटो देख लीजिए न!
सोचता हूं वरिष्ठ लेखक-पत्रकार बनवारी या टीवी चैनल आईबीएन-7 वाले आशुतोष क्या करते होंगे? या समरथ को नहीं दोष गुसांई?

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