मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
भोजन के भरोसे PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Tuesday, 16 July 2013 10:01

जनसत्ता 16 जुलाई, 2013: प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून को लेकर जारी अध्यादेश के विरोध की परवाह किए बगैर केंद्र ने इस पर अमल सुनिश्चित कराने की तैयारियां शुरू कर दी हैं।

इसके लिए कांग्रेस के कुछ पार्टी प्रवक्ताओं को अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। वे उन राज्यों में जाकर सरकारों और आम लोगों को इसके अहम पहलुओं के बारे में जानकारी देंगे। इसके अलावा कई वरिष्ठ मंत्री भी इस पर विभिन्न राज्य सरकारों से तालमेल बनाने की कोशिश करेंगे। दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, केरल और कर्नाटक की कांग्रेस शासित सरकारों ने इसे अगले महीने से लागू करने की घोषणा भी कर दी है। इस हड़बड़ी की वजहें साफ हैं। अगले साल आम चुनाव और इस साल के अंत तक पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। इन राज्यों में नवंबर तक आचार संहिता लागू हो जाएगी। इसलिए सरकार चाहती है कि इसके पहले ही इस योजना पर काम शुरू हो जाए, ताकि उसका लाभ कांग्रेस को मिल सके। प्रचार किया जा रहा है कि खाद्य सुरक्षा कानून यूपीए की अब तक की सबसे महत्त्वाकांक्षी योजना है, जिसकी रूपरेखा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रयास से तैयार की गई है। इससे देश की करीब दो तिहाई आबादी को बेहद कम कीमत पर अनाज उपलब्ध हो सकेगा। निस्संदेह इससे बहुत सारे गरीब परिवारों के लाभान्वित होने की उम्मीद बनी है, मगर जिस तरह इस योजना से जुड़े अनेक सवालों को नजरअंदाज कर सरकार जल्दबाजी में इसे लागू करना चाहती है, उससे इसका अपने लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल बना रहेगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों को दूर करने की दिशा में अब तक कोई व्यावहारिक उपाय नहीं अपनाया जा सका है। इस व्यवस्था के तहत वितरित किए जाने वाले खाद्यान्न का काफी बड़ा हिस्सा खुले बाजार में पहुंच जाता है, मगर अब तक सरकार इसे रोकने में कामयाब नहीं हो पाई है। फिर गरीबी रेखा


से नीचे बसर करने वाले परिवारों की पहचान का पैमाना भी विवाद से परे नहीं है। सरकार मानती है कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भरपूर अनाज है और खाद्य सुरक्षा के रास्ते में कोई अड़चन नहीं पैदा हो सकती। मगर ऐसे वक्त में जब मौसम खराब रहने की वजह से कृषि उत्पादन अपने लक्ष्य से काफी कम हो पाता है, तो सरकार कहां से अनाज उपलब्ध करा सकेगी। भंडारण के मामले में सरकार की कमजोरियां भी किसी से छिपी नहीं हैं। किस तरह हर साल हजारों टन अनाज बर्बाद हो जाता है, सब जानते हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत दिए जाने वाले अनाज की ढुलाई आदि की व्यवस्था भी बेहद लचर है। फिर यह सवाल भी अनुत्तरित है कि इस योजना को लागू करने में सरकार को करीब दो लाख करोड़ रुपए का बोझ उठाना पड़ेगा, क्या सचमुच वह इसके लिए तैयार है। एक तरफ महंगाई लगातार सिर उठा रही है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपए की कीमत नीचे का रुख किए हुए है, खाद्य सुरक्षा के लिए उसकी तैयारियां कितनी पुख्ता साबित होंगी, दावा नहीं किया जा सकता। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या इस तरह देश की गरीबी दूर करने में मदद मिल सकेगी। इन तमाम पहलुओं पर उन मंत्रियों और प्रवक्ताओं को जवाब देने पड़ेंगे, जिन्हें खाद्य सुरक्षा अध्यादेश के पक्ष में सकारात्मक माहौल बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। गरीबों को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध कराने की योजना कई राज्य सरकारों ने पहले से लागू की हुई है। बल्कि कई राज्यों में इसका दायरा केंद्र से अधिक व्यापक है। ऐसे में कांग्रेस को इसका कितना श्रेय मिल पाएगा, यह वक्त बताएगा।


फेसबुक पेज को लाइक करने के क्लिक करें-          https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें-      https://twitter.com/Jansatta

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?