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तस्वीरों में: इतिहास के पन्नों में समाया तार.., PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 10:40

नयी दिल्ली। देश में कई पीढियों तक दूरदराज से अच्छे बुरे संदेश को शीघ्रातिशीघ्र भेजने का मुख्य माध्यम रही 163 साल पुरानी तार सेवा ने आज इतिहास के पन्नों में सिमट गयी।

फोटो गैलरी- अंतिम दिन यादगार लम्हे के रूप में भेजे तार

राजधानी में ‘तार सेवा’ आखिरी क्षणों को यादगार बनाने के लिए बड़ी संख्या में लोगों ने आज कतारों में खड़े होकर अपने प्रियजनों को तार भेजे।
एक समय लाखों लोगों के लिये संदेश पहुंचाने का सबसे तीव्र जरिया तार को आज अंतिम विदाई देने के साथ अंतिम टेलीग्राम को संग्राहल में रखे जाने का भी वादा किया गया।
हाल के वर्षों में इस सेवा को लगभग भुला दिया गया था पर इसके आखिरी दिन राजधानी में टेलीग्राफ सेंटर पर बड़ी संख्या में लोग अपने प्रियजनों को तार के जरिये संदेश देने के इरादे से एकत्रित हुए। इनमें खासकर एंड्राइड फोन पर मल्टी मीडिया संदेश भेजन की शौकीन युवा पीढी के प्रतिनिधि भी थे।
पेशे से वकील आनंद साथियासीलन ने कहा, ‘‘यह पहला मौका है जब मैं टेलीग्राम भेज रहा हूं यह संदेश मैंने अपने 96 साल के दादा जी को भेजा है जो त्रिची के समीप एक गांव में रहते हैं।’’
रीयल एस्टेट कंपनी में प्रबंधक विकास अरविंद ने कहा कि वह बेरली में रह रहे अपने माता-पिता को बाधाई संदेश भेज रहे हैं।
अरविंद ने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद है कि वे इसे एक खूबसूरत याद के रूप में संजो कर रखेंगे।’’
भारत में तार सेवा सबसे पहले प्रायोगिक तौर पर 1850 में कोलकाता तथा डायमंड हार्बर के बीच शुरू की गयी थी। शुरू में इसका उपयोग ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया। 1854 में सेवा लोगों के लिये उपलब्ध हुई।
उन दिनों यह सूचनाएं भेजने का सबसे अहम जरिया था। देश की आजादी के लिये संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत की संचार सेवा को बाधित करने के लिए तार लाइन को काटने का तरीका अपना था।
फोन, मोबाइल, एसएमएस और इंटरनेट क्रांति के साथ्ज्ञ इस तार सेवा का महत्व खत्म हो गया।
सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल ने आय में भारी गिरावट और नुकसान के कारण तार सेवा को बंद करने का निर्णय किया है।
बीएसएनएल के चेयरमैन और प्रबंद निदेशक आर के उपाध्याय ने कहा, ‘‘तार सेवा के लिये रविवार अंतिम दिन है। सेवा सुबह 8 बजे शुरू होगी और रात 9 बजे बंद


होगी।’’
‘तार सेवा’ के आपरेटरों के लिए आज का दिन पुरानी यादों के अचनक हरा होने का दिन था। चार दशकों तक सरकारी सेवा में रहने वाले वरिष्ठ तार परिचालक और 1997 में सेवानिवृत्त हो चुके गुलशन राय विज तार के सुनहरे युग के दौरान अपने अनुभव को याद करते हैं। 
विज ने प्रेट्र से कहा, ‘‘ तार लड़ाई और दुर्घटना में मौतों की बुरी खबर लाने के लिए कुख्यात था। आज इस खुद इस सेवा की समाप्ति खबर बन रही है। हमने उस दौरान काम किया जब इसकी काफी मांग थी। नई प्रौद्योगिकी ने पुरानी प्रौद्योगिकी का स्थान लिया लेकिन तार ने हमें दो वक्त की रोटी दी, हमें पहचान दी। इसीलिए अब इस सेवा के खत्म होने की खबर से हम उदास हैं।’’
वर्ष 1959 में सरकारी सेवा में आये 73 वर्षीय विज कहते हैं, ‘‘1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध तथा 1975-77 में आपातकाल के दौरान संदेश भेजने के लिये उनका काम हमेशा जारी रहता था। वह अपने काम में कभी भी भावनाओं को हावी नहीं होने दिया।
विज ने कहा, ‘‘1971 में जब भारत-पाकिस्तान का युद्ध शुरू हुआ, वह रोहतक में तैनात थे। बिना खाना-पानी के चिंता के वह 24 घंटे काम करते रहे। रक्षा मुख्यालय से युद्ध में मरने वालों के बारे में संदेश आते थे और हम जितनी जल्दी हो सके उस खबर को गंतव्य तक भेजने में लगे रहते थे।’’
गुलशन राय विज ने कहा, ‘‘तार परिचालक के रूप में कोई भी बुरी खबर सुनकर भावना में बह नहीं सकता था क्योकि हमारे पास हजारों संदेश होते थे जिन्हें हमें समय पर देना होता था। हम जितनी अपनी क्षमता से काम कर सकते थे, हमने किया। हम उस वक्त राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत होकर काम करते थे और इसी से हमें कठिन समय में काम करने की शक्ति मिली।’’
केंद्रीय टेलीग्राफ कार्यालय के एक कर्मचारी गजेन्द्र नेगी ने कहा, ‘‘पद के लिये योग्यता केवल प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा पास करनी होती थी। लेकिन परीक्षा तथा तथा हस्तलिखित परीक्षण में जो तेज दिमाग के होते थे, उन्हें ही इस सेवा के लिये लिया जाता है। सभी तार परिचालकों को ‘डाट तथा डैस’ के बारे में अच्छी जानकारी होती थी जिसे वर्ष में अनुवाद किया जाता था....।’’
(भाषा)

 

 

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