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मेरी बाट जोहता कौन PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 10:01

विकेश कुमार बडोला 
जनसत्ता 15 जुलाई, 2013: पूरे दिन वातावरण में धूप और छाया का प्रभाव था। कमरे में बैठे-बैठे मैं कल्पनाशील बन कर देख रहा था कि दरवाजे पर हवा के सहारे धीरे-धीरे हिलते परदे को कभी धूप की चमक लगती तो कभी बादलों से घिरते आसमान के बाद उत्पन्न मौसमीय छाया की उदासी उसे घेर लेती। सब कुछ कितना परिवर्तनशील बना हुआ था। मस्तिष्क-पटल पर स्मृतियों के दिव्यांश अत्यंत विचलित होकर प्रेमोन्माद बढ़ाने लगे। साथ बैठे परिवार के लिए अपनी शारीरिक उपस्थिति छोड़ कर हृदय से न जाने कहां, किस तक पहुंच गया। नहीं ज्ञात कि वह कौन है, जिसके लिए जब-तब मेरे सामान्य जीवन समय का विशेषीकरण हो जाता है। ऐसे में मैं खुद को एक नए व्यक्तित्व में बदला हुआ पाता हूं। जिस भ्रमारोहण पर होता हूं और वहां जो राह दिखाई देती है, उस पर इतना चौकन्ना होकर चलता हूं कि कोई चींटी, जीव मेरे पैर से कुचला न जाए! कोई प्रकृति उपक्रम आंखों से छूट न जाए! मौसमीय राग-विराग अनसुना न रह जाए!
एक छोटे-से जीवन में हमारे पास बड़े देश के लोकतांत्रिक तामझाम और इसके विरोधाभासों, विद्रूपताओं, विसंगतियों, विडंबनाओं को समझने के लिए कितना कम समय होता है! ज्यों-ज्यों समय के पैरों में आधुनिकता, मशीनों के पंख लग रहे हैं, त्यों-त्यों नए विचार, सामाजिक चाल-चलन, सत्ता संचालन प्रक्रियाएं अस्तित्व में आ रही हैंं। इससे जीवन की स्वच्छंद मुस्कान, सहज खुशी विलुप्त हो रही है। व्यक्तिगत उपेक्षा, तिरस्कार में वृद्धि हो रही है। जीवन के दो सबसे बड़े आश्चर्य, यानी जीवन और मृत्यु सबसे सस्ते हो चले हैं। नवजातों के कूड़ादानों में मिलने, उन्हें मारने की खबरें सुनते हैं तो भी हममें हलचल नहीं होती और देश में आई आपदा में एक साथ हजारों लोगों के मरने के बाद भी हममें विशेष संवेदना नहीं उपजती। जीवित लोगों के लिए सब कुछ सामान्य बना रहता है।
सामान्य जिंदगी में क्या रखा है।


सामान्य जिंदगी के अपने हृदय के कुत्सित विचारों से ऊब ही होती है। ऐसे विचार बवंडर का कारण मेरे जीवन समय के भूखंड, यानी भारत के शासनाधीश हैं। इन आंखों वाले अंधों की अमानवीय नीतियां, गतिविधियां हैं। इनके शासन में मैं अपनी दैनिक कार्य प्रणालियों से हार गया हूं। सुबह उठ कर संसार में अपनी उपस्थिति कितनी बोझिल लग रही है! निद्रा में जाने से पूर्व कितनी करवटें बदलनी पड़ती हैं! मेरे साथ कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता, जिससे जीवन का सच अनुभव कर सकूं। जीवन को जीवन से भी अधिक जीकर महसूस कर सकूं। हरेक सांसारिक क्रियाकलाप कितना निरर्थक और ढोंग लगता है! हर एक परिचित मनुष्य कितनी द्विअर्थी बातें करता है! यह देख मैं पथरायी आंखों से अपने मन में अपना विचित्र निरूपण करने लगता हूं और संसार-समय के लिए लंबी-लंबी अवधि तक नितांत भ्रम बन जाता हूं। केवल एक विचार मुझे अपनी भौतिक उपस्थिति, जागृति तक याद रहता है। इस विचार में किसी की स्मृति होती है। किसकी होती है, यह मुझे भी नहीं पता! इस समय मेरे लिए यही स्मृति-विहार जीवन की सुधा होती है। जिसके लिए संवेदित हूं, वह मेरे लिए चिंतनशील है या निश्चिंत, यहीं पर मैं ध्यानस्थ होता हूं और अनस्तित्व होते खुद को संभालता हूं।
रात घिर आने तक उसकी, न जाने किसकी यादों की रहस्यमय यात्रा करता रहता हूं। रात्रि का आभास हुआ तो देखा आधा चांद आसमान में उभर आया है। मैं आकाश के नीचे अपनी पलकें झपकाता हुआ चांद को देख कर आकंठ भ्रमात्मक हो जाता हूं। भ्रम की यात्रा में फिर उसका, न जाने किसका चिंतन चलता है और इस चिंतन पथ पर वहां तक पहुंच जाता हूं, जहां मेरी स्मृति में खड़े होकर रोते हुए कोई मेरी बाट जोह रहा होता है। कौन, पता नहीं!

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