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Monday, 15 July 2013 10:00

 

अरमान
जनसत्ता 15 जुलाई, 2013: पिछले दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दो घटनाएं मुझे बहुत ही महत्त्वपूर्ण लगीं। पहली का संबंध जामिया के स्थापना दिवस से है।

यूपीए सरकार के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया आए हुए थे। चर्चा का विषय था- ‘इक्कीसवीं सदी में भारत और युवाओं का भविष्य’। सभागार खचाखच भरा हुआ था। चर्चा की भाषा अंग्रेजी थी, जिसे सभागार में मौजूद ज्यादातर श्रोता नहीं समझ रहे थे, लेकिन समझने का ढोंग कर रहे थे। मुख्य अतिथि का वक्तव्य खत्म होते ही सवाल आमंत्रित किया गया। एक छात्र ने चर्चा के माध्यम के तौर पर अंग्रेजी भाषा पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
उसका कहना था- ‘आजादी के तुरंत बाद बापू ने एक पत्रकार को कहा था कि ‘कह दो दुनिया को कि गांधी को अंग्रेजी नहीं आती’। गुलामी और आयातित भाषा के माध्यम से कोई देश कब तक बेहतर और गौरवमय भविष्य की कल्पना कर सकता है? मंत्रीजी, आप हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी बात कह सकते थे। लेकिन आपने अंग्रेजी में अपनी बात रखी। ऐसा क्यों होता है कि दुनिया के दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष अपनी जुबान में अपनी बात कहते हैं, जबकि अपने देश के राजनेता औपनिवेशिक भाषा की शरण में चले जाते हैं?’ मंत्रीजी मंच पर थे, तो कुछ न कुछ बोलना ही था। उन्होंने हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के विकास की बात कही। सभागार में बैठे लोगों ने उस छात्र की तालियों के साथ हौसला-आफजाई की।
दूसरी घटना हाल में संपन्न हुए विश्वविद्यालय क्रिकेट चैंपियनशिप के दौरान हुई। इसमें जामिया की टीम भी भाग ले रही थी। कप्तान प्रवीण यादव के सामने जब संवाददाता पहुंचता था तो हिंदी में सवाल करता था, वहीं दूसरी टीम के कप्तान और खिलाड़ियों से अंग्रेजी में। मैं भी दर्शकों के बीच मौजूद था। ज्यादातर दर्शक प्रवीण यादव को अंग्रजी न बोलने के कारण गालियों से नवाज रहे थे। उनमें कई दर्शकों से मेरी बकझक हो गई। ज्यादातर का मानना था कि प्रवीण का अंग्रेजी न बोलना जामिया के लिए शर्म की बात है। लेकिन उन्हीं में से एक ने कहा कि अपनी भाषा में बात करने में कैसी शर्म! पास बैठे बाकी दर्शकों ने उसे चुप करा दिया।
ये दोनों घटनाएं साधारण-सी लगती हैं, लेकिन कई गंभीर प्रश्न उठाती हैं। अगर इनके पीछे छिपे राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक कारणों की पड़ताल करें तो इनके केंद्र में हमारी औपनिवेशिक विरासत नजर आएगी। इसके


कारण हम सांस्कृतिक रूप से आला दरजे की मानसिक गुलामी के शिकार हैं। किशन पटनायक अपनी पुस्तक ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ में इसे ‘गुलाम दिमाग का छेद’ कहते थे। उनका मानना था कि लंबे समय तक गुलाम रहे देशों के नागरिकों की मानसिकता गुलामी की हो जाती है, जो राजनीतिक गुलामी से ज्यादा खतरनाक होती है। जामिया की दोनों घटनाएं इसी प्रकार की गुलामी को दर्शाती हैं, जब अपने ही देश के नागरिक अपनी भाषा-संस्कृति से घृणा करने लगते हैं या देश के राजनेता राष्ट्रीय गौरव के मौके पर भी अपनी भाषा के बजाय विदेशी भाषा में बात करते हैं। देश की संसद में ज्यादातर बहसें विदेशी भाषा में होती हैं। अदालत की भाषा आयातित है। वहीं संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अनिवार्य अंग्रेजी थोपने का प्रयास किया जाता है, ताकि गैर-अंग्रेजी भारतीय भाषाओं के विद्यार्थियों को वर्तमान औपनिवेशिक प्रशासनिक ढांचे से दूर रखा जा सके और सत्ता की गोपनीयता बनी रहे।
अंग्रेजी के महिमामंडन का परिणाम यह हुआ है कि आम आदमी अंग्रेजी भाषा और उसकी जीवनशैली को ही मुक्ति का एकमात्र मार्ग समझने लगा है। गांव-गांव में कुकुरमुत्ते की तरह खुलने वाले कथित अंग्रेजी माध्यम स्कूल इसके उदाहरण हैं। समाज में होने वाले ये शैक्षणिक सांस्कृतिक बदलाव एक विशेष मानसिकता को दर्शाते हैं। यह स्थिति समाज, भाषा और ज्ञान के विशेष अंतर्संबंध पर नए सिरे से सोचने को मजबूर करती है।
रघुवीर सहाय ने लिखा है- ‘अंग्रेजों ने अंग्रेजी पढ़ा कर प्रजा बनाई, अंग्रेजी पढ़ा कर अब हम राजा बना रहे हैं।’ दरअसल, प्रजा और राजा के बीच होने वाले भाषा के खेल ने नई दिशा ले ली है। अब हमारा अंग्रेजीदां लोकतांत्रिक राजा वास्तविकता और सिद्धांत के बीच की दूरी को हमेशा बनाए रखना चाहता है। भाषाविद् यह कहते रहे हैं कि विदेशी भाषाओं में कोई मौलिक चिंतन स्वाभाविक रूप से नहीं हो सकता, दबाव में खानापूर्ति हो सकती है। भारतीय विश्वविद्यालय और उनके काम इसके उदाहरण हैं। प्रश्न है कि दुनिया के दो सौ सर्वोच्च विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी विश्वविद्यालय क्यों नहीं आता?
इस तथ्य का भाषायी नजरिए से समाजशास्त्रीय अध्ययन करने के बजाय एक विदेशी भाषा को जबर्दस्ती थोपा जा रहा है। इससे आखिरकार भारतीय प्रतिभाएं कुंद हो रही हैं। न जाने यह बात कब समझ में आएगी?

 

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