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राजनीति की गंगा कैसे निर्मल बने PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:59

केपी सिंह 
जनसत्ता 15 जुलाई, 2013: सर्वोच्च अदालत ने अपने नवीनतम फैसलों में कैदियों के चुनाव लड़ने के अधिकार की व्याख्या करते हुए महत्त्वपूर्ण व्यवस्थाएं दी हैं। दो वर्ष से अधिक कारावास की सजा पाते ही जनप्रतिनिधि उस सदन की सदस्यता के अयोग्य हो जाएंगे जिसके वे सदस्य थे। जेल या पुलिस की हिरासत में होने के दौरान कोई भी व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकेगा। दोनों निर्देशों ने जनप्रतिनिधित्व कानून के कई प्रावधानों को फिर से लिखने की आवश्यकता पैदा की है।
प्रबुद्ध वर्ग इन फैसलों में राजनीति को साफ-सुथरा बनाने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने की मुहिम की उमंग ढूंढ़ रहा है। कुछ नवोदित राजनीतिक दलों के अति उत्साही भावी राजनेता इन आदेशों को अपनी विचारधारा की विजय बता रहे हैं। पहले से स्थापित राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया संयमित है। उनके प्रवक्ता फैसलों के विस्तृत अध्ययन के बाद ही इन फैसलों के गुण-दोष की परीक्षा करने की बात कह रहे हैं। अलबत्ता चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत के फैसलों का स्वागत किया है। कैमरे के सामने सारे राजनेता इन आदेशों को अच्छा बता रहे हैं। पर वास्तव में उनकी व्यक्तिगत राय में इन फैसलों में अनेक राजनीतिक पेच छिपे हैं जिनके दूरगामी परिणाम होंगे। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इन निर्देशों के विरुद्ध अपील दायर की जा सकती है।
आम आदमी इन फैसलों को लेकर तटस्थ है। उसे इससे फर्क नहीं पड़ने वाला है कि शासक कौन है? उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में संभवत: इन फैसलों की कोई अहमियत नहीं है। एक परिपक्व होते लोकतंत्र में फैसलों पर चर्चा और आलोचना स्वस्थ व्यवस्था के लिए अत्यंत जरूरी है।
फैसले व्यक्ति लिखते हैं। अधिकतर मामलों में फैसला लिखते समय एक सीमित परिप्रेक्ष्य और उद््देश्य ही सामने होता है। फैसले एक संदर्भ के मोहताज होते हैं। पर कानून बन जाने वाले फैसलों पर विस्तृत दृष्टिकोण के आधार पर आम सहमति बनाना बेहद जरूरी होता है। इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च अदालत के इन नवीनतम निर्देशों पर बहस की गुंजाइश है।
इन फैसलों के गुण-दोष पर विचार करने से पहले जेम्स स्टीफेन्स की एक टिप्पणी पर गौर करना सामयिक होगा, जिन्होंने भारतीय साक्ष्य अधिनियम तैयार किया था। इस अधिनियम में पुलिस के सामने अपराध की स्वीकारोक्ति को महत्त्व नहीं दिया गया है। इसका कारण स्पष्ट करते हुए जेम्स स्टीफेन्स ने कहा था कि भारतीय प्रदत्त शक्तियों का सदुपयोग करने के बजाय उनका दुरुपयोग करने में ज्यादा विश्वास रखते हैं। हम इस कटु सत्य को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते, क्योंकि यह हमारी मानसिकता और प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है। पर हकीकत हम सभी जानते हैं। सरकारी तंत्र और संस्थाओं के दुरुपयोग की बात सभी राजनीतिक और गैर-राजनीतिक व्यक्ति जब-तब स्वीकार करते रहे हैं। संभवत: इसीलिए इन फैसलों को लेकर राजनेता आशंकित हैं।
दुरुपयोग की आशंका को दूर रख कर भी इन फैसलों की विवेचना की गुंजाइश बाकी रहती है। इनमें से एक गुंजाइश व्यक्ति के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की शुचिता को लेकर है। हमने संयुक्त राष्ट्र के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से संबंधित संधियों पर हस्ताक्षर किए हुए हैं। इन अधिकारों की बदौलत ही विश्व में तानाशाही, राजशाही और भेदभाव पर आधारित व्यवस्थाओं का अंत संभव हुआ है और लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं मजबूत हुई हैं। इस पृष्ठभूमि में जेल या पुलिस हिरासत में रहते हुए बंदी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के निर्देशों की व्याख्या जरूरी है। यह समझ से परे है कि मानवाधिकार आयोग और संगठनों ने अभी तक इस विषय पर चुप्पी क्यों साध रखी है? क्योंकि चुनाव लड़ना अकेले राजनेताओं का नहीं, आम नागरिकों का भी अधिकार है। और निन्यानबे प्रतिशत कैदी, जो इस फैसले से प्रभावित होंगे, आम नागरिक ही होंगे।
आंकड़े गवाह हैं कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार करके जेल भेजे जाने वाले लगभग पचहत्तर प्रतिशत लोग अदालतों में बेगुनाह साबित होते हैं। अगर जेलों में सजा काट रहे लोगों के बीच जाकर सर्वेक्षण किया जाए तो पता चल जाएगा कि उनमें से कितने लोग झूठी और द्वेषपूर्ण गवाही के कारण सजा पाए हुए हैं। धर्मवीर पुलिस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पुलिस द्वारा की जा रही साठ प्रतिशत गिरफ्तारियों की कोई जरूरत नहीं है। पुलिस सुधार के लिए बनी मलीमथ समिति ने भी ऐसा ही निष्कर्ष दिया था। इन परिस्थितियों में सोचने का गंभीर मुद््दा है कि क्या जेल या पुलिस हिरासत में रहने के दौरान किसी व्यक्ति के चुनाव लड़ने जैसे अति महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार पर प्रतिबंध लगाना उचित होगा?
उच्चतम न्यायालय के फैसलों से जुड़ा हुआ एक महत्त्वपूर्ण कानूनी पक्ष भी है। प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति या वर्ग के अधिकारों को प्रभावित करने वाला फैसला करने से पहले उस व्यक्ति या वर्ग को सुनवाई का एक मौका जरूर दिया जाना चाहिए। यह तथ्यों की विवेचना से पता लग जाएगा कि क्या आम बंदियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले इस मामले की सुनवाई के दौरान बंदियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया था? अगर ऐसा नहीं है तो इस फैसले पर अभी और सुनवाई की संभावना बाकी


है।
कैदियों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने वाले फैसले से उनके मानवाधिकारों की रक्षा का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। आपातकाल के तुरंत बाद अदालतों ने कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा की गारंटी देने वाले अनेक फैसले दिए थे। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर, न्यायमूर्ति भगवती और उस समय के अन्य न्यायाधीशों के कैदियों के अधिकारों को परिभाषित करने वाले फैसले कानून का हिस्सा बन चुके हैं, और आज भी प्रासंगिक हैं। इन फैसलों का एक ही सार है कि जेल की ड्योढ़ी पार कर लेने के बाद भी कोई कमतर इंसान नहीं बन जाता। कैदी के सारे नागरिक और राजनीतिक अधिकार बरकरार रहते हैं। कैद का मतलब केवल कैदी के स्वतंत्र विचरण करने के अधिकार को सीमित करना होता है। इस पृष्ठभूमि में क्या एक कैदी को चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए? यह प्रश्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से बार-बार पूछा जाएगा।
प्रथमदृष्टया इस फैसले में एक अन्य पेच भी दिखाई दे रहा है जिस पर गौर करने की जरूरत है। सामान्यतया एक व्यक्ति अधिकतम चौदह दिनों के पुलिस रिमांड के दौरान पुलिस हिरासत में रह सकता है। इसके बाद या तो उसे जमानत मिल जाती है या जेल भेज दिया जाता है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि अगर दुर्भावना-ग्रस्त एक थानेदार किसी गंभीर अपराध की धारा लगा कर किसी व्यक्ति को चुनाव में नामांकन दाखिल करने से रोकने की नीयत से गिरफ्तार कर लेता है तो वह व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाएगा। इस प्रकार के कानून के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस चर्चा में आपराधिक मामलों से जुड़ी प्रक्रिया संबंधी एक और मुद्दा महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पुलिस हिरासत में रहने की अवधि समाप्त हो जाने के बाद गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश किया जाता है। अदालत फैसला करती है कि गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत पर छोड़ दिया जाए या उसे जेल भेजा जाए। अदालत अपना फैसला इस तथ्य के मद्देनजर करती है कि संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध आरोप कितना संगीन है।
यानी पुलिस ने गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के विरुद्ध कितने संगीन जुर्म की धारा लगाई है। जुर्म से संबंधित धाराओं के सही-गलत होने की परीक्षा इस समय साधारणतया नहीं की जाती, क्योंकि तब तक जांच चल रहा होती है। संगीन जुर्म के आरोप में गिरफ्तार व्यक्तियों को आमतौर पर जमानत नहीं मिलती और उन्हें जेल भेज दिया जाता है।
दो वर्ष से अधिक की सजा होते ही एक जन-प्रतिनिधि की सदन की सदस्यता समाप्त करने के आदेश पर भी विचार करने की जरूरत है। एक व्यक्ति तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का यही तकाजा है। और न्यायिक प्रक्रिया तभी पूरी हुई मानी जाती है जब व्यक्ति के अपील करने के सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं। आंकड़े साबित कर सकते हैं कि सजा-प्राप्त लगभग आधे व्यक्ति अपील में बरी हो जाते हैं। इतनी अधिक संख्या में लोग कैसे गलत सजा पा जाते हैं यह एक अलग चर्चा का विषय हो सकता है। पर इन परिस्थितियों में पहली अदालत द्वारा दी गई सजा को आधार मान कर क्या किसी जन-प्रतिनिधि की सदस्यता निरस्त करना उचित होगा?
इसी से जुड़ा हुआ एक राजनीतिक पहलू भी है जिस पर विचार करने की जरूरत है। इतिहास गवाह है कि केंद्र और राज्य सरकारें कई बार सदन में महज एक वोट के अंतर से परास्त हुई हैं। अदालत के एक फैसलों ने कई बार देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदला है। ऐसे में प्रथम (निचली) अदालत के फैसले के आधार पर क्या एक जनप्रतिनिधि की सदन की सदस्यता को समाप्त करने का प्रावधान खतरे से खाली होगा?
इन तथ्यों के प्रकाश में यह सोचने का विषय बन जाता है कि क्या भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की अस्मत एक दुर्भावनाग्रस्त थानेदार के पास गिरवी रखी जा सकती है? सर्वोच्च अदालत के निर्देशों के पीछे राजनीति में अपराधियों के प्रवेश पर रोक लगाने का पवित्र उद््देश्य ही होगा। पर सवाल है कि यह उद््देश्य किस प्रकार हासिल किया जाए। चुनाव लोकतंत्र का महापर्व है और इस महापर्व में प्रत्येक मतदाता एक देवता है। अगर इस महापर्व की शुचिता बरकरार रखनी है तो हमें प्रत्येक मत-देवता के द्वार पर दस्तक देकर उसे जागृत करना होगा। यह सुनिश्चित करने के उपाए करने होंगे कि वह अपराधियों को अपना आशीर्वाद न दे।
चुनाव लोगों की आस्था का राजनीतिक महाकुंभ भी है। अगर मतदाता इस महाकुंभ की प्रदूषित राजनीतिक गंगा में डुबकी लगाना चाहते हैं तो इसे उनकी मर्जी पर ही छोड़ देना बेहतर होगा। प्रदूषित राजनीतिक गंगा के प्रवाह को बंद करके राजनीति के शुद्धिकरण की अवधारणा पर शायद ही आम सहमति बन पाए। राजनीति की गंगा को साफ-सुथरा बनाने की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। पर यह निर्मलीकरण कानून बना कर नहीं, लोगों में जागरूकता लाकर करना ही बेहतर विकल्प होगा।

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