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मोदी का मन PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:58

जनसत्ता 15 जुलाई, 2013: गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा की चुनाव समिति के संयोजक नरेंद्र मोदी वाणी पर संयम के लिए नहीं जाने जाते। लिहाजा, यह हैरत की बात नहीं कि अपनी कही बातों के कारण वे एक बार फिर विवाद में घिर गए हैं।

अमेरिकी समाचार एजेंसी रायटर को दिए साक्षात्कार में वाकई उन्होंने कई आपत्तिजनक बातें कही हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि वे हिंदू हैं इसलिए हिंदू राष्ट्रवादी हैं। क्या इस तरह का राष्ट्रवाद देश की एकता और अखंडता को सुरक्षित रख सकता है? अगर कोई यह कहे कि वह सिख परिवार से ताल्लुक रखता है इसलिए खालिस्तानवादी है, तो क्या यह स्वीकार्य होगा? अगर अलग-अलग धर्म या समुदाय के आधार पर राष्ट्रवाद की वकालत की जाने लगी तो एक राष्ट्र के तौर पर भारत का भविष्य क्या होगा? इस साक्षात्कार में गुजरात दंगों की बाबत भी मोदी से पूछा गया। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई पछतावा नहीं है, क्योंकि उस दौरान उन्होंने कुछ गलत नहीं किया; उनकी सरकार ने दंगों को रोकने के लिए पूरी ईमानदारी से अपने संसाधनों और विवेक का इस्तेमाल किया था। क्या इस दावे पर विश्वास किया जा सकता है?
दंगे रोकने में मोदी की नाकामी या अनिच्छा के कारण ही सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें नीरो कहा था। खुद उनकी पार्टी के शीर्ष नेता और तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी। गुजरात दंगों के कारण ही वाजपेयी ने तब कहा था कि वे क्या मुंह लेकर विदेश जाएंगे! यानी वाजपेयी तक की निगाह में मोदी ने मुख्यमंत्री के अपने संवैधानिक कर्तव्य का निर्वाह नहीं किया था। दंगों की बाबत उनकी प्रत्यक्ष भूमिका के प्रमाण एसआइटी नहीं पेश कर सकी, इससे मोदी अपनी पीठ नहीं थपथपा सकते। दंगों के बाद भी पीड़ितों के प्रति उनकी सहानुभूति नहीं दिखी, न दंगाइयों को सजा


दिलाने में उन्होंने कोई दिलचस्पी दिखाई। गुजरात पुलिस के संदेहास्पद रवैए के कारण कई बार सर्वोच्च अदालत को दखल देना पड़ा और कई मामले राज्य के बाहर की अदालतों में भेजे गए। क्या यह सब ईमानदारी से राज्य सरकार के अपना दायित्व निभाने की कहानी है? फिर भी मोदी कहते हैं कि वे ‘न्याय सबके लिए’ के सूत्र में यकीन करते हैं! मोदी अपने सुशासन का दम भरते रहे हैं। भाजपा भी गुजरात मॉडल के गुण गाते नहीं थकती। जबकि पार्टी के एक ही वरिष्ठ नेता और गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने हाल में कहा कि 2002 के दंगे शासन के खराब मॉडल की मिसाल थे।
मगर दिखावे के लिए भी, मोदी ने दंगों के लिए न माफी मांगने की जरूरत समझी है न अफसोस जाहिर किया है। दंगों के लिए दुख प्रकट करते हुए उन्होंने गाड़ी के नीचे पिल्ले के आ जाने के जिस रूपक का इस्तेमाल किया वह उनकी मानसिकता पर सवाल खड़ा करता है। इस पर खासा विवाद उठा तो मोदी ने ट्विटर पर सफाई दी कि हमारी संस्कृति में सभी जीवों का जीवन एक समान कीमती और पवित्र है। यह सफाई एक बेजा रूपक का इस्तेमाल करने के बाद उस पर लीपापोती के अलावा कुछ नहीं है। पहले किसी को उल्लू कह दिया जाए। फिर कहा जाए कि उल्लू तो लक्ष्मीजी की सवारी है तो उस व्यक्ति को कैसा लगेगा? फिर भी भाजपा मोदी के बचाव में खड़ी हो गई है। नरेंद्र मोदी के ये उद्गार तब आए हैं जब भाजपा उन्हें चुनावी शुभंकर मान चुकी है। आम चुनाव में वे भाजपा को कितनी कामयाबी दिला पाएंगे यह तो आने वाला वक्त बताएगा, पर उनकी इन टिप्पणियों से यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि आखिर वे देश को किधर ले जाने की मंशा रखते हैं!

 

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