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चिंता की दर PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:57

जनसत्ता 14 जुलाई, 2013: एक बार फिर उद्योगों की वृद्धि-दर घटने की खबर आई है। उद्योगों की दशा बताने वाला आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक मई में 1.6 फीसद सिकुड़ गया।

औद्योगिक उत्पादन दर पिछले ग्यारह महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। ये आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब हमारे नीति नियंता यह भरोसा दिला रहे थे कि हाल में उठाए गए कदमों के कारण अर्थव्यवस्था में जल्दी ही सुधार नजर आएगा। इस तरह के आश्वासन रस्मी हो चले हैं। महंगाई के कुछ दिनों के नियंत्रण में आ जाने की बात थोड़े-थोड़े अंतराल पर दोहराई जाती रही है। मगर कोई फर्क नहीं पड़ता। जून में खुदरा महंगाई दो अंकों के करीब पहुंच गई। खाद्य महंगाई की स्थिति और भी चिंताजनक है, करीब बारह फीसद। इससे एक पखवाड़े बाद आने वाली मौद्रिक समीक्षा के समय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में नरमी लाने का फैसला करना आसान नहीं होगा। आर्थिक वृद्धि दर का आकलन बीते वित्तवर्ष से तुलना के आधार पर होता है जिसे ‘बेस इफेक्ट’ कहा जाता है। अगर पिछले वित्तवर्ष के किसी महीने में ऊंची विकास दर रही हो तो मौजूदा वित्तवर्ष के उसी महीने में थोड़ी कमी को चिंताजनक नहीं माना जाता, क्योंकि यह तुलनात्मक आकलन का नतीजा होता है।
लेकिन बीते साल मई में आइआइपी महज ढाई फीसद था। इसलिए इस बार मई में आई गिरावट का दोष बेस इफेक्ट पर नहीं मढ़ा जा सकता। इस साल अप्रैल में औद्योगिक वृद्धि दर 2.33 फीसद रहने का अनुमान लगाया गया था, पर संशोधित अनुमान के मुताबिक यह दो फीसद से भी कम था। इस तरह चालू वित्तवर्ष के शुरुआती महीनों में आइआइपी बुरी तरह लुढ़क गया है। जून में भी औद्योगिक क्षेत्र का प्रदर्शन फीका रहने के आंकड़े आए तो पहली तिमाही निराशा के खाते में दर्ज


होगी। आइआइपी में करीब तीन चौथाई हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग यानी विनिर्माण क्षेत्र का होता है। विनिर्माण क्षेत्र रोजगार का भी बड़ा स्रोत है। इसलिए विनिर्माण में आई गिरावट रोजगार के लिहाज से भी चिंता का विषय है। पूंजीगत सामान की खपत नए निवेश का परिचायक मानी जाती है, पर इसमें भी कमी दर्ज हुई है। अब कृषि और सेवा क्षेत्र का भी प्रदर्शन कमोबेश ऐसा ही रहने के आंकड़े आए तो पहली तिमाही से रही-सही उम्मीद भी काफूर हो जाएगी। कहा जा रहा था कि डॉलर के मुकाबले रुपए के अवमूल्यन से दूसरे नुकसान जो भी हों, निर्यात क्षेत्र को फायदा होगा। मगर वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल जून की तुलना में निर्यात भी लगभग साढ़े चार फीसद गिर गया है।
ताजा आंकड़ों ने एक ही मामले में सरकार को राहत दी है, वह यह कि व्यापार घाटा कम हुआ है। इससे चालू खाते के घाटे में भी सुधार की उम्मीद जगी है। व्यापार घाटा कम होने का कारण सोने-चांदी के आयात पर लगा अंकुश है। यह कदम और पहले ही उठाया जाना चाहिए था, जैसा कि बजट में वादा किया गया था; तब व्यापार घाटे से राहत और पहले ही मिलनी शुरू हो जाती। लेकिन यह उपलब्धि भी कितनी टिकाऊ होगी, पेट्रोलियम के बढ़े हुए आयात-खर्च को देखते हुए कहना मुश्किल है। कारों की बिक्री में लगातार आठवें महीने गिरावट से परेशान वाहन उद्योग ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है। कैसी विडंबना है कि जो लोग यह कहते नहीं थकते कि अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका कम से कम हो और बाजार को अपना काम करने देना चाहिए, वे खुद को संभालने के लिए पैकेज की मांग करते हैं!

 

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