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माया-मुलायम में ही सिमट रही है उप्र की राजनीति PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:19

अंबरीश कुमार, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक लड़ाई फिर मायावती और मुलायम के बीच सिमटती नजर आ रही है। कल कुशवाहा समाज नारे लगा रहा था ‘बदला ले ले साथी का, मुड़ी काट ले हाथी का’। नारा बाबू सिंह कुशवाहा के साथ मायावती के व्यवहार के खिलाफ था। इस व्यवहार से उनका समाज आक्रोशित है। उसके साथ  अब समाजवादी पार्टी (सपा) है, जो समाज कल तक मायावती के साथ था, आज अपनी सामाजिक राजनीतिक अस्मिता के नाम पर मुलायम के साथ खड़ा है। बाबू सिंह कुशवाहा पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप हैं। लेकिन समाज की राजनीति अलग नजरिए से होती है। जिसकी बानगी इस समाज के नारे से मिलती है। वैसे भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में नारे भी कई बार राजनीति की दिशा बताते हैं। एक दौर में नारा लगा था  ‘मिले मुलायम कांसीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’, तब दलितों और पिछड़ों का गठजोड़ भरी पड़ा था। लेकिन अब दलितों और पिछड़ों की राजनीति और सामाजिक समीकरण बदल रहे हैं। इसकी बानगी राजधानी लखनऊ में शनिवार से रविवार तक देखी गई।
कभी मायावती के सिपहसालार रहे बाबू सिंह कुशवाहा के परिजनों ने अपने समाज के नाम पर मुलायम से हाथ मिलाया। रविवार को मायावती ने कुशवाहा के भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। अब उत्तर प्रदेश में जातियों के बड़े गठबंधन की राजनीति हो रही है, जो वोट की राजनीति को प्रभावित करती है। इसलिए जब सपा पर शुचिता के नारे की अनदेखी का आरोप लगता है तो तर्क दिया जाता है कि वोट शुचिता से नहीं जातियों से आता है। इन्हीं जातियों के समाज को जोड़कर दोनों दल अपना-अपना वोट बैंक तैयार कर रहे हैं। हालांकि आइपीएफ के संयोजक अखिलेंद्र प्रताप सिंह इसे लोहिया के नाम पर राजनीति करने वालों का राजनीतिक प्रहसन मानते हैं। लेकिन सपा और बसपा की इसी राजनीति के आगे दोनों राष्ट्रीय दल कमजोर नजर आ रहे हैं।
जातियों का चुनावी गठबंधन बनाने में जुटी हैं सपा और बसपा
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मोदी और हिंदुत्व के नाम


पर मध्य वर्ग के एक हिस्से को कितना पकड़ पाती है, यह अभी कहा नहीं जा सकता है। लेकिन अभी की स्थिति में जातियों का जो समीकरण बन और बिगड़ रहा है, उसमे भाजपा बहुत फायदे में नजर नहीं आ रही है। जबतक हिंदू ध्रुवीकरण नहीं होगा तबतक भाजपा को कोई फायदा भी नहीं होगा। हिंदू में दलितों का एक हिस्सा बसपा के साथ है तो दूसरा हिस्सा सपा के साथ। यही हाल पिछड़ों और अति पिछड़ों का है। अब अगड़ों पर भी नजर डाल लें तो राजनीतिक स्थिति कुछ साफ हो जाएगी।
भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में अस्सी ब्राह्मण उम्मीदवार खड़े किए थे। इसमें केवल 13 जीते थे। वहीं 80 राजपूत उम्मीदवारों में से नौ और सात वैश्य उम्मीदवारों में से पांच जीते थे। अब पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा पर नजर डालें। सपा के 45 ब्राह्मण उम्मीदवारों में से 21 जीते तो 51 राजपूत में 30 जीते। वहीं 11 वैश्य उम्मीदवारों में से पांच जीते और एक भूमिहार भी जीता। अगड़ों के वोटों में पिछड़ों की राजनीति करने वाले दल की स्थिति से प्रदेश के राजनीतिक समीकरण को कुछ हद तक समझा जा सकता है। वह भी तब जब भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष भूमिहार बिरादरी से था। वह अपनी बिरादरी का एक भी उम्मीदवार नहीं जिता पाया।
अब जब प्रमोशन में आरक्षण के सवाल पर भाजपा और कांग्रेस को लेकर अगड़ों में नाराजगी हो तो आगे की चुनावी राजनीति की दिशा को समझा जा सकता है। ऐसे मोदी के लिए उत्तर प्रदेश बड़ी चुनौती भी है क्योंकि इस प्रदेश के  80 फीसद गांवों में न तो बिजली आती है और न टीवी चलता है। लैपटॉप और फेसबुक की तो बात ही सोचना बेकार है। लेकिन वह समाज जरूर साथ रहता है जो वोट को तय करता है। इसलिए मायावती और मुलायम इस प्रदेश में फिलहाल भारी नजर आते हैं।


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