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राजनीतिक दलों को आरटीआइ से छूट देने पर फैसला नहीं PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:16

जनसत्ता ब्यूरो, नई दिल्ली। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सूचना उपलब्ध कराने से राजनीतिक दलों को छूट देने को लेकर सरकार ने अभी कोई फैसला नहीं किया है। उधर, केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) की ओर से दी गई छह हफ्ते की समय सीमा सोमवार को खत्म हो रही है। सूचना के अधिकार (आरटीआइ) अधिनियम के कार्यान्वयन से जुड़े कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पारदर्शिता कानून के दायरे से राजनीतिक दलों को बाहर रखने के लिए सरकार अध्यादेश लाने की बहुत इच्छुक नहीं है।
विभाग का प्रभार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास है। सूत्रों के मुताबिक कार्मिक मंत्रालय अध्यादेश लाने से पहले सिविल सोसायटी सहित अन्य पक्षों से सलाह मशविरा कर सकता है। हालांकि आरटीआइ अधिनियम में संशोधन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए कानून मंत्रालय एक अध्यादेश को मंजूरी दे चुका है। यदि अध्यादेश में संशोधनों    बाकी पेज 8 पर  उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८
को सभी पक्ष स्वीकार कर लेते हैं तो इसे संसद के मानसून सत्र में लाया जा सकता है। मानसून सत्र अगस्त के मध्य से शुरू  होने की संभावना है।
केंद्रीय सूचना आयोग ने तीन जून के अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि छह


राष्ट्रीय दल कांग्रेस, भाजपा, राकांपा, माकपा, भाकपा और बसपा को अप्रत्यक्ष तौर पर काफी हद तक केंद्र सरकार से मदद मिलती रही है। इसीलिए वे आरटीआइ अधिनियम के तहत सार्वजनिक अभिकरण की प्रकृति के हैं, क्योंकि उनका कामकाज सार्वजनिक शैली का है। आयोग की ओर से इन राजनीतिक दलों को मनोनीत सूचना अधिकारियों और अपील अधिकारियों की नियुक्ति के लिए दी गई छह हफ्ते की समय सीमा 15 जुलाई को खत्म हो रही है। राजनीतिक दलों को बचाने के लिए कार्मिक विभाग सार्वजनिक अभिकरण की परिभाषा बदलने के लिए आरटीआइ अधिनियम के अनुच्छेद 2 में संशोधन का प्रस्ताव ला सकता है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार एक अन्य विकल्प पर भी विचार कर सकती है।मसलन, राजनीतिक दलों को छूट प्राप्त संगठनों (अधिनियम के अनुच्छेद 8 में उल्लेख के अनुसार) की सूची में शामिल कर लिया जाए। इसमें केंद्रीय सुरक्षा एजंसियां-रॉ, गुप्तचर ब्यूरो, सीबीआइ जैसी एजंसियां शामिल हैं। हालांकि कार्मिक विभाग दूसरे विकल्प को अपनाने के लिए कम तैयार हैं, क्योंकि इससे जनता के विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

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