मुखपृष्ठ अर्काइव
Bookmark and Share
भाजपा की बेहतरी के लिए बेबाक भाजपाई के सुझाव PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Monday, 15 July 2013 09:13

अनिल बंसल, नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के बुजुर्ग दलित नेता संघप्रिय गौतम की राय है कि पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव गुजरात की ही किसी सीट से लड़ना चाहिए। इससे सूबे में पार्टी के पक्ष में हवा बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही वहां के पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ेगा। गुजरात में लोकसभा की कुल 26 सीटें हैं। पिछले चुनाव में भाजपा को महज 14 पर ही कामयाबी मिल पाई थी। गौतम को लगता है कि अगर प्रधानमंत्री पद के पार्टी के उम्मीदवार की हैसियत से मोदी गुजरात से लोकसभा चुनाव लड़ें तो हो सकता है कि पार्टी सारी सीटों पर जीत जाए।
गौतम ने ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा चलने पर पार्टी के भीतर उनका सबसे पहले विरोध किया था। उनकी राय थी कि पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी को ही इस पद का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए। लेकिन पार्टी का फैसला सिर-माथे मानते हुए गौतम अब अपने सुझावों से मोदी की बेहतरी के पक्ष में दिखते हैं। अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण गौतम को कई बार उनकी पार्टी के ही नेता बड़बोला तक कह चुके हैं। मुंहफट होने का वे कई बार खमियाजा भी भुगत चुके हैं। लेकिन आदत से लाचार हैं।
जनसत्ता के साथ बातचीत में गौतम ने उत्तर प्रदेश के सबसे कद्दावर भाजपा नेता कल्याण सिंह के एटा से चुनाव लड़ने पर भी एतराज जताया। गौतम चाहते हैं कि जाति आधारित राजनीति अब बंद होनी चाहिए। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते सूबे के राजनीतिक दलों को जाति आधारित रैलियां करने पर फटकार लगाई थी। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देकर राजनीति में दागियों की राह में व्यवधान पैदा किया है। इन दोनों फैसलों को संघप्रिय गौतम मील का पत्थर मानते हैं। इसलिए उन्होंने इनका स्वागत भी किया है।
दरअसल भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें जीतने के लिए देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश पर ज्यादा फोकस कर रही है। गौतम भी इसी सूबे के हैं। उन्हें अफसोस है कि दूसरी पार्टियों की तरह भाजपा के कद्दावर नेता भी चुनाव जीतने के लिए ऐसे इलाकों की तलाश में रहते हैं जहां उनकी जाति के मतदाता ज्यादा हों। कल्याण सिंह अलीगढ़ के हैं। लेकिन एटा में लोध ज्यादा होने के कारण पिछला लोकसभा चुनाव वे वहीं से लड़े थे। इसी तरह राजनाथ सिंह को भी गाजियाबाद सीट यहां राजपूत मतदाताओं की अच्छी तादाद होने की वजह से जंची होगी। अन्यथा उन्हें अपने इलाके बनारस से चुनाव लड़ना चाहिए था। इसी


तरह मुरली मनोहर जोशी को इलाहाबाद छोड़ कर बनारस नहीं जाना चाहिए था।
गौतम का सोच दूसरे नेताओं से अलग है। मसलन, उन्हें लगता है कि बड़े नेता अपने इलाकों से चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी का आधार भी मजबूत होता है और जाति आधारित राजनीति भी कमजोर पड़ती है। उत्तर प्रदेश में दलितों को ज्यादा अहमियत नहीं दिए जाने की भाजपा की नीति से भी गौतम खफा हैं। उनकी शिकायत है कि सूबे के दलितों में 70 फीसद उनकी और मायावती की जाटव जाति के हैं। लेकिन भाजपा इस जाति के लोगों को उम्मीदवार नहीं बनाती। वे गैर जाटव दलितों पर दांव लगाती हैं, जिससे पार्टी को कोई फायदा नहीं होता।
जाटव मतदाता अगर पूरी तरह मायावती के साथ लामबंद हो चुके हैं तो उन्हें उम्मीदवार बनाने से भाजपा को क्या फायदा? इस सवाल पर गौतम का जवाब तीखा है। वे इसका ठीकरा अपनी पार्टी के नेताओं पर ही फोड़ते हैं। जिन्होंने 1995 में पहली बार मायावती को मुख्यमंत्री बनवाया था। उसके बाद ही मायावती जाटवों की बड़ी नेता बन पार्इं। इससे भाजपा का जाटव वोट बैंक खिसका। लेकिन पार्टी ने फिर भी सबक नहीं लिया। उसने 1996 और 2002 में फिर मायावती के साथ मिलकर सरकार बनाई और उन्हें ही मुख्यमंत्री बनवाया। इससे भाजपा के जाटव नेताओं की जमीन खिसक गई। लेकिन अब जाटवों का भी बड़ा तबका मायावती से खफा है। ऐसे में भाजपा को उनकी उपेक्षा बंद करनी चाहिए। उनका सुझाव है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरक्षित सीटों पर खटीक और बाल्मीकि जैसे गैर जाटवों के बजाए अगर भाजपा जाटव उम्मीदवार उतारेगी तो नतीजे बेहतर होंगे। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भी पार्टी का गैर जाटवों को बढ़ावा देने का प्रयोग नुकसानदेह साबित हुआ था। 
संघप्रिय गौतम देश के उन दलितों नेताओं में हैं जिन्होंने आंबेडकर के सानिध्य में सियासी पारी की शुरुआत की थी। वे भारतीय रिपब्लिकन पार्टी के संस्थापकों में हैं। भाजपा में वे 1977 में जनता पार्टी के रास्ते आए थे। उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर रखा है। इस नाते खुद वे किसी भी आरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ते। अतीत में वे जब भी चुनाव लड़े तो केवल सामान्य सीट से ही लड़े। वाजपेयी और संघ परिवार उनकी सांगठनिक क्षमता से प्रभावित रहे हैं। इसलिए पार्टी ने उन्हें दो बार राज्यसभा सदस्य बनाया और केंद्र में मंत्री भी। अस्सी पार कर चुके गौतम की अब कोई चुनाव लड़ने की महत्त्वाकांक्षा नहीं है।

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?