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जनभावनाओं का पता लगाने के लिए मुंबई पुलिस ले रही सोशल मीडिया की मदद PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:08

नई दिल्ली। संवेदनशील मसलों और विरोध प्रदर्शनों से निपटने की पूरी तैयारी रखने के लिए मुंबई पुलिस ने जनता के विचारों और भावनाओं का पता लगाने के लिए सोशल मीडिया मंचों पर नजर रखना शुरू कर दिया है। यह देशभर में अपनी तरह का पहला प्रयास है। नास्कॉम के अधिकारी ने कहा कि इस कार्य के लिए मुंबई पुलिस ने तकनीकी अवसंरचना और प्रशिक्षण में आइटी और आइटी आधारित सेवाओं से जुड़े उद्योगों के संगठन नास्कॉम की मदद से देश का पहला सोशल मीडिया लैब स्थापित किया है। जबकि सोशलएप्सएचक्यू.कॉम ने पुलिस को सोशल मॉनिटरिंग एप्लीकेशन उपलब्ध करवाया है।
मुंबई पुलिस के सूत्रों ने इस बदलाव की पुष्टि की है। सोशलएप्सएचक्यू.कॉम जनभावनाओं पर नजर रखता है और उनका विश्लेषण करता है। यह व्यवहारों के प्रारूपों और इन्हें प्रभावित करने वालों की पहचान करता है। यह किसी मसले पर हो रही ज्यादा बातचीत पर नजर रखता है और समय रहते सोशल मीडिया के मंचों पर अलर्ट जारी करता है। यह कंपनी कानून प्रवर्तन की अन्य शाखाओं जैसे अर्द्धसैनिक बलों और खुफिया एजंसियों के साथ भी ऐसे ही सोशल मीडिया ट्रैकिंग लैब स्थापित करने पर चर्चा कर रही है।
सोशलएप्सएचक्यू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रजत गर्ग ने बताया कि मुंबई पुलिस ने सोशल मीडिया माध्यमों पर जनभावनाओं को भांपने और उनका विश्लेषण करने के लिए सोशलएप्सएचक्यू.कॉम के सोशल मीडिया की निगरानी के आधुनिक उपकरणों की मदद से भारत का पहला सोशल मीडिया लैब स्थापित करने की पहल की है। उन्होंने कहा कि यह पहल दिल्ली बलात्कार मामले या जन लोकपाल मामले में विरोध प्रदर्शनों जैसे संवेदनशील मसलों से निपटने में हमारी कानूनी एजंसियों की मदद करेगी।
पिछले साल जनभावनाओं के नियंत्रण से बाहर हो जाने तक पुलिस उनकी व्यापकता और गंभीरता को आंकने में विफल रही थी। लगभग इन सभी मामलों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल समर्थन जुटाने के लिए किया गया था। गर्ग ने कहा कि मुंबई में पुलिस देख


रही है कि बड़ी संख्या में नागरिक सोशल मीडिया की वेबसाइटों पर मौजूद हैं। स्थानीय निकाय पर, तेजाब हमले जैसे मसलों पर ट्विटर और फेसबुक जैसे मंचों पर विभिन्न समूहों द्वारा गंभीर चर्चा की जाती है। उन्होंने कहा कि सोशलएप्सएचक्यू.कॉम के स्वचालित सोशल मीडिया खुफिया उपकरणों की मदद से अब पुलिस अशांति पैदा करने वाले सक्रिय असामाजिक समूहों का पता लगा सकती है और समय रहते सुरक्षात्मक कदम उठा सकती है।
गर्ग ने कहा कि इसके साथ ही यह नागरिकों की मनोदशा और भावनाओं को समझने में भी पुलिस की मदद करता है। इस तरह यह संबंधित अधिकारियों को जल्दी ही सही कदम उठाने के लिए जानकारी दे सकेगा। लैब की कार्यविधि के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि यह लैब सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध आंकड़ों पर ही कार्य करता है। इसके आधार पर यह प्रारूपों की पहचान करता है। इसका विश्लेषण करके विभिन्न गतिविधियों का पता लगाया जाता है।
गर्ग ने कहा कि इस साल जनवरी में हमने दिल्ली पुलिस को फेसबुक पर सक्रिय एक समूह की जानकारी दी जो दिल्ली बलात्कार मामले की वर्षगांठ पर एक विरोध प्रदर्शन करने वाला था। हमने कुछ लोगों को पथराव करने की बात करते देखा। इससे पुलिस को स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी रखने में मदद मिली। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस भी ऐसी ही लैब स्थापित करने के लिए आगे बढ़ रही है। हमने उनके साथ चार-पांच महीने पहले बैठक की थी लेकिन बस इतना ही हुआ। इस महीने की शुरुआत में दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के विशेष आयुक्त एसएन श्रीवास्तव ने कहा था कि सोशल मीडिया की निगरानी और इस्तेमाल से अपराध रोकने में मदद मिल सकती है और पुलिस को इसका फायदा उठाना चाहिए।

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