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तबाही में अब भी बची है उम्मीद की किरण PDF Print E-mail
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Monday, 15 July 2013 09:03

देहरादून। उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा से हुई तबाही के करीब एक महीने बाद भी कई लोग ऐसे हैं जो हिम्मत नहीं हारते हुए अपने प्रियजनों को केदारनाथ में तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। बीते 17 जून से अपने प्रियजनों के सकुशल होने की उम्मीद लगाए बैठे उनके निकट संबंधी अब भी इस आशा के साथ यहां मौजूद हैं कि वे उन लोगों को जरूर ढूंढ पाएंगे जिनका इस भयावह आपदा के बाद से कोई अता-पता नहीं है।
केदारनाथ घाटी के गावों में लोग अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों की तस्वीर लिए लिए हर दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। वे इस बात की आस लगाए हैं कि कहीं से उनके प्रियजनों के सही सलामत होने की सुखद खबर मिल जाए।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने एलान किया है कि सोमवार तक जिन लोगों का पता नहीं लगेगा, उन्हें मृत मान लिया जाएगा। इस घोषणा के बाद भी इन लोगों का हौसला नहीं डिगा है। केदारघाटी के फाटा बाजार में ऐसे आपको कई लोग मिल जाएंगे जो अपने परिवार के लापता लोगों की तस्वीरें लिए घूम रहे हैं।
महाराष्ट्र के अहमदनगर के अनंत कुलकर्णी ने अपने दल


के 35 लोगों को खो दिया और इसी तरह पुणे के निवासी हेमंत कुलकर्णी के 24 दोस्तों के बारे में अभी कुछ पता नहीं चल पाया। नेपाल में कपिलवस्तु के निकट एक गांव के रहने वाले दो भाई आलोक और आशीष पांडे बीते शुक्रवार से रुद्रप्रयाग में डेरा डाले हुए हैं। उनके माता-पिता 17 जून को केदारनाथ गए थे और ठीक उसी दिन प्राकृतिक आपदा ने वहां दस्तक दी थी।
दोनों के माता-पिता एक दूसरे का हाथ पकड़कर चल रहे थे, लेकिन भगदड़ में दोनों अलग-अलग हो गए। मां घर पहुंच गईं, लेकिन पिता अब भी लापता हैं। पांडे बंधु धर्मशाला, देहरादून, ऋशिकेष हरिद्वार और श्रीनगर के हर अस्पताल में जा चुके है, लेकिन उनके पिता की कोई खबर नहीं मिली। आलोक का कहना है, पिता से मिलने की उम्मीद ही हमें केदारघाटी के इन गांवों में लेकर आई है। केदारघाटी में इसी तरह बहुत सारे लोग अपने प्रियजनों के मिलने की उम्मीद लिए घूम रहे हैं। सबकी कहानी एक जैसी लगती है।

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