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भूख के बरक्स PDF Print E-mail
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Friday, 12 July 2013 10:49

राजेंद्र बंधु 
जनसत्ता 12 जुलाई, 2013: इन दिनों खाद्य सुरक्षा कानून चर्चा में है। केंद्र की यूपीए सरकार देश के गरीबों को सस्ती कीमत पर अनाज देने का कानून पारित करवाने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है। कहा जा रहा है कि इससे देश की साढ़े तिरेसठ प्रतिशत आबादी को सस्ती कीमत पर अनाज खरीदने का हक मिल जाएगा। ऊपरी तौर पर इसके प्रावधानों की प्रशंसा की जा सकती है। लेकिन अगर एक गरीब इंसान की जरूरत और उसके जीने के अधिकार में आने वाली अन्य बाधाओं और देश के सामाजिक ढांचे पर विचार करें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार का यह महत्त्वाकांक्षी अधिनियम आधा-अधूरा है। यहां यह सवाल अलग है कि इसमें जितना अनाज मिलेगा, वह पर्याप्त है या नहीं, बल्कि जो मिल भी पाएगा, वह गरीबों के पेट तक पहुंचेगा या नहीं और उन तक पहुंचाने के लिए इसमें क्या गारंटी दी गई है।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, आंध्र प्रदेश सहित कई राज्य सरकारों द्वारा गरीबों को सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध करवाने की योजनाएं लागू हैं। लोगों को यह राशन उचित मूल्य की सरकारी दुकानों से उपलब्ध होता है। नया अधिनियम पारित होने के बाद राशन वितरण इन्हीं दुकानों द्वारा किया जाएगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत संचालित दुकानों की जमीनी हकीकत से शायद सरकार वाकिफ नहीं है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ये राशन दुकानें महीने में सिर्फ दो दिन खुलती हैं। जबकि सर्वोच्च न्यायालय के एक दिशा-निर्देश के अनुसार इन दुकानों को महीने में कम से कम छब्बीस दिन खुला होना चाहिए। आश्चर्य है कि इन राज्यों के जिला कलेक्टरों ने भी महीने में दो दिन राशन दुकान खुलने का आदेश पारित किया है। वह भी किन दो दिनों में खुलेगी, पहले से तय नहीं है। कई लोगों को पता भी नहीं चलता कि दुकान कब खुल कर बंद हो गई। अलबत्ता हर महीने अनाज वितरण की रिपोर्ट सरकार तक जरूर पहुंच जाती है। इसे


सरकार अपनी उपलब्धियों में शामिल कर लेती है, जबकि कई गरीब वंचित लोग अनाज से वंचित ही रह जाते हैं। इन राशन दुकानों को संचालित करने वाले ज्यादातर डीलर समाज के वर्चस्वशाली तबके से आते हैं। राशन दुकान को नियंत्रित करने और निगरानी में ग्रामसभा और समुदाय की सहभागिता को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए प्रावधानों के अनुसार हर तीन किलोमीटर की परिधि में एक राशन दुकान होनी चाहिए। लेकिन कई गांव ऐसे हैं, जहां यह पांच से सात किलोमीटर दूर स्थित है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाने की दिशा में मौन है।
यह अधिनियम लोगों को अनाज जरूर उपलब्ध करवाएगा, लेकिन उनकी भूख नहीं मिटाएगा। भूख सिर्फ अनाज से नहीं मिटती, बल्कि जीवन जीने के अधिकार को सुनिश्चित किए जाने से मिटती है। यह जरूरी है कि लोगों को स्वास्थ्य और चिकित्सा का भी अधिकार हो। साथ ही उन्हें आवास और आजीविका का भी अधिकार मिले। आखिर इन अधिकारों के बगैर खाद्य सुरक्षा की गारंटी कैसे दी जा सकती है? राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन सिर्फ एक योजना के रूप में है। उसके जरिए लोगों को स्वास्थ्य और चिकित्सा का संवैधानिक अधिकार हासिल नहीं है। इंदिरा आवास योजना की भी यही स्थिति है। गरीब परिवारों को सस्ती कीमत पर अनाज उपलब्ध कराने के साथ ही उन प्रयासों को भी पुख्ता बनाना होगा, जिनके जरिए गरीब परिवार बाजार कीमत पर अनाज खरीदने में सक्षम हो सकें। इसी तरह आजीविका के साधनों का विकास और जमीन, जंगल और जल संसाधनों पर समुदाय का अधिकार जरूरी है। खाद्य सुरक्षा कानून को वास्तव में कारगर बनाने के लिए जरूरी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आजीविका, खाद्य और आवास सहित सभी अधिकारों को मिला कर एक समग्र कानून बनाया जाए, और उसके क्रियान्वयन के ठोस उपाय करते हुए प्रशासनिक तंत्र को उत्तरदायी बनाया जाए।

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