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नेतृत्व की कसौटी PDF Print E-mail
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Thursday, 11 July 2013 10:11

मुहम्मद नवेद अशरफ़ी
जनसत्ता 11 जुलाई, 2013: एक मित्र ने बताया कि हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव आगामी लोकसभा के लिए चुनावी समर में कदम रख रहे हैं। उत्तर प्रदेश की एक राजनीतिक पार्टी ने उन्हें कानपुर से अपना प्रत्याशी सुनिश्चित किया है। करोड़ों भारतीयों की तरह मैं भी उनकी मसखरी और हुनर का कायल हूं और उनकी कला की हमेशा से कद्र करता रहा हूं। लेकिन सवाल है कि एक व्यक्ति के लिए देश के पेचीदा मसलों को संभालना और लोगों को हंसाना, सामंजस्य और संगत के कितना अनुरूप है? उत्तराखंड में आई विभीषिका से निपटने और राखी सावंत के साथ ठहाके लगाने में बहुत बड़ा फर्क है! आए दिन समाज में असमतदरी, हत्या और फौजदारी के मामले प्रशासन के समक्ष आते हैं। ऐसे में अगर प्रशासन और प्रजातंत्र की बागडोर संभालने वाले किसी नौटंकीशाला से चुने जाएंगे तो प्रशासन की दक्षता और नेतृत्व का क्या हश्र होगा, यह बताना मुश्किल है!
देश को चलाना आसान काम नहीं है, खासकर भारत में जहां प्रशिक्षित, दक्ष और मेहनतकश प्रशासनिक अधिकारियों के ऊपर मनमौजी नेता अपनी मनमानी करते हैं। ऐसे नेता कभी प्रजातंत्र के मंदिरों में अश्लील चलचित्र देखते हैं तो कभी करगिल के शहीदों की विधवाओं के रिहाइशी फ्लैट हथिया कर नेतृत्व के नए ‘आदर्श’ स्थापित करते हैं! कभी कोयला निगल कर देश को ‘ऊर्जाविहीन’ कर देते हैं, कभी विस्तृत ‘भारतीय रेल’ को अपने बाप-दादा की जागीर समझ कर उसका सौदा कर बैठते हैं। कभी गरीब बच्चों को भूख से बिलखते देखने के बावजूद देश का अनाज बाहर बेच देते हैं या गोदाम में रख कर ‘लंबोदर की सवारी’ को भेंट कर देते हैं। सन् 2025 तक ‘मोस्ट पॉपुलस नेशन’ का ताज पहनने के लिए तैयार खड़े भारत में एक तरफ नेतृत्व के लाले पड़े हुए हैं, वहीं देश का नेतृत्व नौटंकीशालाओं, बॉलीवुड और गली-नुक्कड़ के तमाशों का मोहताज बन बैठा है।
नेतृत्व अपने निम्नतम स्तर तक जा पहुंचा है। नेताओं को ‘सेवा’


नहीं, बिल्कुल ‘मेवा’ दिखता है। पिछले नौ साल में यूपीए के कारनामों के जरिए भाजपा सरीखे दल राजनीतिक लाभ उठाने की जुगत में लगे रहते हैं। जबकि हकीकत यह है कि ‘पारदर्शिता’ और ‘आरटीआइ’ के इस दौर में जिस तरह यूपीए की हकीकत सामने आई है, उसी तरह बाबरी विध्वंस, सिख जनसंहार और गोधरा कांड जैसी ‘अमर गाथाओं’ का सच और इनमें लिप्त ‘शूरवीरों’ के मुखौटे भी सामने आ जाते!
लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे अधिक मजाक दुनिया में हमारे ही लोकतंत्र में बना है। राजनीतिक दल देश की जनता को ‘समेकित शिक्षा’ से दूर रखते हैं। ये केवल ‘साक्षरता’ सुनिश्चित करते हैं, ‘शिक्षा’ नहींं! विचाराघात से ग्रस्त देश की मासूम और अशिक्षित जनता अभिनेताओं के डायलॉग, कवियों के खयाली पुलाव और मसखरों की चुहलबाजियों में फंस कर रह जाती है और भरी सभाओं में उनके अतिशयोक्ति से भरे भाषण सुन कर उन्हें अपना ‘नेता’ मुंतखब करने का फैसला कर लेती है। लोकतंत्र में ‘नेता’ का वही रुतबा और अहमियत है जो परिवार में दादा और यान में पायलट की होती है। शिक्षा की कमी के कारण देश के युवा अपना भला-बुरा सोचने में असमर्थ हैं। यही वजह है कि चीन के बाद भारत में सर्वाधिक मानव संसाधन होने के बावजूद हम वाशिंगटन और लंदन से सदियों पीछे हैं।
ऐसा नहीं है कि हमारा संविधान कलाकारों की कद्र नहीं करता। बल्कि हमारे यहां तो निहित है कि कोई भी कलाकार, वैज्ञानिक और यहां तक कि समाजसेवी भी संसद के गलियारों तक जा सकता है। उसके लिए संसद में ‘नामित’ सीटों का प्रावधान हमारे संविधान में है। इन नामित सांसदों की खास बात यह होती है कि जनता के हक में होने वाले महत्त्वपूर्ण फैसलों पर वोट देने का हक संविधान ने उन्हें नहीं दिया है। जाहिर है, हमारा संविधान देशचर्या और उसके दायित्वों को भली-भांति समझता है।

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