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खंडित दृष्टि का समाज PDF Print E-mail
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Thursday, 11 July 2013 10:09

अनिल चमड़िया 
जनसत्ता 11 जुलाई, 2013: भारतीय समाज और व्यक्ति की पूरी संरचना में काफी जटिलताएं हैं। व्यक्ति पश्चिम के बरक्स पिछड़े हुए समाज में रहता है इसका अहसास भी उसे है और पिछड़ेपन के कारणों से मोह भी, क्योंकि उन कारणों को ही वह अपनी पहचान मानता है। कल्पना करें कि कैसी जटिल मानसिकता बुनी गई है। हिंदी साहित्य के इतिहासकार रामचंद्र शुक्ल के बारे में कहा जाता है कि वे कमीज पहनते थे। गले में टाई बांधते थे और धोती पहनते थे। बहुत सारे ऐसे लोग हो सकते हैं। एक सोच-समझ और भाषा ऐसी ही बनी है कि प्रगतिशील और आधुनिक दिखने वाला सामंती भाषा में बात-व्यवहार करता है और फिर भी खुद को सामान्य महसूस कर सकता है और समाज में भी उसे सामान्य माना जा सकता है।
समाज और व्यक्ति का निर्माण जटिलताओं से भरा है। एक रूपक तैयार कर सकते हैं। मैकाले ने जब भारतीय रंग-रूप में अंग्रेज पैदा करने की योजना पर काम शुरू किया तो उसने कैसे जातिवाद और सांप्रदायिकता के रंग-रूपों को भी बदल दिया। ठेठ सामंती भाषा में जातिवाद को स्वीकार करने वालों ने अंग्रेजी में जातिवाद को ढालने के तरीके तो अपनाए होंगे। ऐसा तो नहीं हो सकता कि अचानक मैकाले की योजना के अनुसार भारतीय रंग-रूप के अलावा बाकी सभी स्तरों पर अंग्रेज की तरह हो गए?
हमने पिछले सौएक सालों में यह महसूस किया है कि आधुनिक बनने और प्रगतिशील दिखने का समाज पर एक दबाव बना है। शायद अंग्रेजों के आने के बाद और उनके शासन के खिलाफ संघर्षों ने दो स्तरों पर भारतीय समाज और उसके सदस्यों को गढ़ा है। आधुनिक और प्रगतिशील भी दिखना है और उसके दिखने के रूप हो सकते हैं। यानी आधुनिक दिखने के दबाव और आधुनिकता से बचाव के बीच समाज का नेतृत्व करने वाले लोगों के निर्माण का सूत्र रहा है।
आधुनिकता का अर्थ बराबर विचारों से होता है। कोई भी अपने पहनावे और मशीन चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने के बाद आधुनिक दिख सकता है, लेकिन किसी का आधुनिक होना विचारों के स्तर पर उसकी आधुनिकता से जुड़ा है। आधुनिकता का संबंध विचार से ही होता है। हम यह महसूस कर सकते हैं कि इस समाज में प्रगतिशील, आधुनिक दिखने के कई तौर-तरीके अपनाए गए हैं। यहां तक कि विचारों को भी ओढ़ा गया है।
जब पूरी दुनिया में साम्यवादी आंदोलन का उभार हो रहा था, तब उसके प्रभाव में दिखने को प्रगतिशीलता का सूचक माना जाता था। भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा साम्यवादी दिखने लगा। आज प्रगतिशीलता दलितवाद और आंबेडकरवाद में दिखती है तो बड़ी संख्या में आंबेडकरवादी और दलितवादी दिखाई दे सकते हैं। यानी भारतीय समाज में प्रगतिशीलता और आधुनिकता के आंदोलन प्रगतिशील और आधुनिक दिखने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।
इसका मतलब यह होता है कि अवसरवादी जमात ऐसे विमर्शों को अंजाम देती आ रही है, जो मूलत: प्रगतिशील और आधुनिक नहीं हैं। अगर अकादमिक स्तर पर वाम सोच का चेहरा रखने वाले लोगों के बीच एक अध्ययन किया जाए तो वहां जातिवाद के उन पहलुओं को सतह पर लाया जा सकता है जो जाति व्यवस्था के ढांचे के विमर्श से दूर होते हैं। आर्थिक ढांचे के परिवर्तन से सामाजिक विकास के सूत्र में जातिवाद विरोधी विमर्श के कई पहलू दब जाते हैं। कई बार वह राष्ट्रवाद की आड़ में सांप्रदायिकता को सुरक्षित रखने का एक तरीका दिखने लगता है।
इस पूरी बात की एक नई परत अब इस रूप में खुलती है कि क्या मानसिक बुनाई और उसकी सक्रियता और अवसरों के दबाव में किए जाने वाले कार्य की जो एक स्थिति गहरे रूप में कायम है, वह यहां देखी जाती है? क्या एक तरह का खंडित और अचंभित करने वाला व्यक्तित्व हमारे समाज को संचालित कर रहा है? हमने कई उदाहरण देखे हैं जिनमें एक की चर्चा यहां की जा सकती है। काका कालेलकर को सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के आरक्षण के लिए अपना अध्ययन और सिफारिशें देनी थीं। लेकिन उन्होंने पूरे देश में घूमने के बाद सिफारिशें देने से मना कर दिया। मशहूर साम्यवादी भोगेंद्र झा मंडल आयोग की अनुशंसाओं का विरोध करने लगे। यहां आरक्षण से जुड़े उदाहरण विषय को देख कर दिए जा रहे हैं। दूसरे क्षेत्रों में भी ऐसे ढेर सारे अंतर्विरोधी उदाहरण मौजूद हैं। दो तरह की स्थितियां देखी जाती हैं। एक तो अवसर देने की मांग, और दूसरी, अवसर देने की मांग करने वालों की भूमिका।
पूरे समाज में यह एक नियम की तरह विद्यमान है कि आधुनिकता के पक्ष में दिखें, लेकिन पिछड़ेपन का साथ दें। आखिर क्यों जिस तरह से कॉलेज के स्तर का विद्यार्थी सोचता है लगभग वैसा ही सोच बड़ी उम्र में हिलोरें लेने लगता है। मनोविज्ञान और शरीरविज्ञान के आधार पर यह समझने की कोशिश नहीं की जा रही है।
कॉलेज के स्तर पर जातीय भावना कुछ खोने का डर लिए रहती है, और बड़ी उम्र में क्या कुछ भी नहीं खोने का डर चेतना को स्वाभाविक तरीके से काम करने


के लिए छोड़ देता है। इस रूप में भी बिल्कुल व्यावहारिक स्तर पर जातीय भावनाओं के प्रकट होने का अध्ययन किया जा सकता है।
दरअसल, जातिवाद सिद्धांत से ज्यादा व्यवहार के रूप में दिखता है। व्यवहार उस सिद्धांत को बनाए रखने की हरचंद कोशिश करता है। जातिवादी नहीं दिखने की कोशिश में सफलता हासिल की जा सकती है, लेकिन जातीय भावना इस कदर गुंथी हुई है कि थोड़ा-सा भी असंतुलन उसेप्रकट होने से नहीं रोक सकता। कवि शमशेर कहते हैं कि बात ही भीतर की सच्चाई को बोल देती है। जातिवादी नहीं दिखना प्रबंध की योग्यता हो सकती है, लेकिन जातीय भावना अपने रोज-ब-रोज के जीवन से ही दूर करनी होती है। जिस तरह से रोजाना के जीवन में जातीय भावना होती है उसे उसी अनुपात में तोड़ने की कोशिश करनी होती है। खाने-पीने, उठने-बैठने की सब जगहों पर किसी जाति की उपस्थिति पर हमारे बीच कैसे भाव हिलोरें लेने लगते हैं, इसकी पड़ताल करें तो अपने भीतर के जातिवाद की सतह दिखाई देने लगेगी। आशीष नंदी अपने अकादमिक कार्यों में जातिवादी नहीं हो सकते हैं, लेकिन वे, अरुण के प्रोफेसर और फिल्म निर्माता जैसे उच्च लोग जातीय भावनाओं को मारने में कामयाब नहीं हो सके हैं, बल्कि जातीय भावना के ढांचे में ही रचे-बसे रहे हैं।
इस पूरे विमर्श का एक दूसरा पहलू भी है कि आखिर क्यों भूमंडलीकरण के इस दौर में जातिवाद मजबूत हो रहा है। उसका किस तरह से भारतीय जाति व्यवस्था से गहरा रिश्ता बनता है। क्यों इस दौर में वे तमाम संस्थाएं और लोग जातिवाद की पकड़ में आ जाते हैं, क्या इसलिए कि उनके पास उसे न दिखने देने के जो तौर-तरीके थे वे दिखने लगे हैं?
इसके साथ यह भी सच है कि जिस तरह से वर्चस्व के रूप में जातिवाद कायम है उसके उलट जातिवाद विरोधी सांस्कृतिक आयोजन वर्चस्व के विचार को समाप्त करने के उद्देश्य के साथ नहीं होते हैं। वे बस जातिवाद के कुछ खास-खास तौर-तरीकों के विरोधी होते हैं। जैसे, जाति को भ्रष्ट कहने के विरोधी होते हैं। जैसे, पहले मंदिर में दलित निषेध के विरोधी रहे हैं। जातिवाद-विरोधी भी जातिवाद की पहचान समय और अवसर के रूप में ही करते दिखते हैं। जातिवाद-विरोधी भी सामाजिक न्याय की आड़ में जातिवाद के हिस्से बन जाते हैं।
जातिवाद के लिए कई तरह की आड़ हैं। जिस तरह अंग्रेजों की तरफ से बहाल मैकाले ने भारतीय भूभाग के हिंदुओं और मुसलमानों को हिंदू, मुसलमान के साथ-साथ जातिवादी और अंग्रेज के रूप में तैयार किया, उन्हीं में अवसर की पहचान और आड़ की राजनीति भी विकसित की। इस तरह जातिवाद की एक नई पैकेजिंग की गई। हम इस रूप में देखें कि भूमंडलीकरण मैकाले के आगे और हममें क्या जोड़ रहा है?
वर्चस्व के रूप में जातिवाद किस-किस रूप में विस्तार पा रहा है? इस पहलू पर हमें सोचने के लिए राजनीतिक स्तर पर दो उदाहरण मिलते हैं। पहली खबर यह आई कि समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। वे उनकी सभाओं में जा रहे हैं और उन्हें खुश करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। क्या यह महज वोट जुटाने की कवायद है?
संसदीय लोकतंत्र में मतों का महत्त्व है। ब्राह्मण आबादी बहुत कम है। ब्राह्मण वोट बैंक की भाषा में संबोधित नहीं हो सकते हैं। तब उनका क्या वह समर्थन प्राप्त करने की कोशिश नहीं हो रही है, जो जातिवाद के कई-कई रूपों में भारतीय समाज में विद्यमान है। क्या वह प्रभाव और दबदबे का समर्थन हासिल करने की कोशिश नहीं है, जो ब्राह्मण जाति के होने के कारण ही बना हुआ है। उस दबदबे और प्रभाव की पहचान करें और संसदीय लोकतंत्र में उसके महत्त्व का आकलन करें तो वोटों के गणतंत्र का कद छोटा दिखने लगता है। उसी तरह से सुदूर अमेरिका का समर्थन हासिल करने के लिए नरेंद्र मोदी क्यों इतने बेताब हैं?
यह समर्थन क्या है? अमेरिका यहां की जाति, धर्म, हिंदू, मुसलमान, दलित, पिछड़ा, महिला सबको कैसे संसदीय चुनाव के लिए प्रभावित कर सकता है? अमेरिका जातिवाद के पूरे ढांचे को प्रभावित करने में इस कदर सक्षम समझा जाता है कि नरेंद्र मोदी को भारतीय लोकतंत्र में विजय हासिल करने के लिए उसका समर्थन जरूरी लगता है। जातिवाद की संरचना की पहचान भारतीय समाज के कोने-कोने में करनी होगी और अपने भीतर तो सबसे पहले। किसी के बारे में यह कहना कि वे जातिवादी नहीं कहे जा सकते, काफी नहीं है। कल जातिवादी न दिखने वाला अगर आज जातिवादी के रूप में दिखता है तो यह जातिवाद के ढांचे का संकट नहीं है, देखने वाली दृष्टि का संकट है। इसीलिए जाति विरोधी कार्यक्रम सफल नहीं हो पाए हैं।
किसी मुद््दे पर कोई अचानक जातिवादी नहीं हो सकता। न ही कोई जातिवादी अचानक सांप्रदायिक दिखता है। जातिवादी है तो वह सांप्रदायिक भी होगा, यह विचार अभी स्वीकृति ही नहीं पा सका है।      (समाप्त)

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