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शिक्षा के ध्रुव PDF Print E-mail
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Wednesday, 10 July 2013 10:15

 

अंशु सचदेवा
जनसत्ता 10 जुलाई, 2013: प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में सरकार जब-तब कुछ नए निर्णय करती है। ऐसा ही एक निर्णय था गरीब घर के बच्चों को निजी स्कूलों में पच्चीस प्रतिशत आरक्षण देने का।

सरकार के आदेशानुसार निजी स्कूलों में गरीब बच्चों को आरक्षण मिल भी गया। ये ऐसे स्कूल हैं, जहां उच्च और उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे आते हैं। इनका भौतिक वातावरण आधुनिक है। यहां बच्चों को पढ़ाने पर जोर दिया जाता है, समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन होते हैं और कलात्मक शिक्षण भी दिया जाता है। हर महीने अभिभावकों और शिक्षकों की बैठक होती है। बच्चे के संपूर्ण विकास की ओर ध्यान दिया जाता है। ऐसे विद्यालयों में अगर एक गरीब परिवार का बच्चा जाएगा तो निश्चय ही उसका उसी माहौल में विकास होगा। लेकिन यह विकास किस तरह का होगा? कहीं यह सामाजिक अंतर का विकास तो नहीं है?
दूसरी ओर, सरकारी विद्यालयों में ऐसा कुछ नहीं होता, खासकर छोटे शहरों और गावों में। न तो आधुनिक वातावरण और न ही नई-नई रचनात्मक गतिविधियों के जरिए शिक्षण। अगर नया कमरा बन भी जाए तो उसकी दीवारें इतनी उदासीन होती हैं कि स्कूल के प्रति कोई लगाव ही पैदा न हो। इन सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से जब इस आरक्षण के विषय में बात की जाए तो जवाब आता है- ‘ये लोग गरीब हैं। इनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ जाएंगे तो अच्छा होगा।’ वहीं कुछ शिक्षक इसे सरकार की चाल मानते हैं और बताते हैं कि सरकार चाहती है कि सभी बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ें। ऐसा करके सरकार निजी स्कूलों की पकड़ को मजबूत बना रही है। जिन गरीब बच्चों को इन स्कूलों में आरक्षण के बावजूद दाखिला नहीं मिल पाता, उनके माता-पिता का यह कहना होता है कि अगर हमारे पास भी पैसे होते तो हम अपने बच्चे का अच्छे निजी स्कूल में दाखिला करवा देते।
दरअसल, सरकार


ने इस फैसले से अपनी कमजोरी को ही स्वीकार किया है। सरकार ने यह मान लिया है कि निजी स्कूल, सरकारी विद्यालयों से बेहतर हैं और गरीब परिवारों के बच्चों को भी इनमें पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। इस साल के बजट में शिक्षा के लिए चौंसठ हजार करोड़ रुपए का आबंटन हुआ। क्यों सरकार सरकारी विद्यालयों का भी बुनियादी ढांचा आधुनिक नहीं बनाती? क्यों सरकारी अध्यापकों को नई तकनीकी शैक्षणिक गतिविधियों का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता? आज एक ओर गरीब परिवारों की हैसियत अपने बच्चे को बड़े निजी स्कूलों में दाखिल करवाने की नहीं है तो दूसरी ओर वे सरकारी विद्यालयों के रूप और प्रकृति से खुश नहीं जान पड़ते हैं। वे अन्य निजी स्कूलों में मिल रही शिक्षा से वाकिफ हैं और अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के पक्ष में हैं।
अगर प्राथमिक शिक्षा की बात की जाए तो विडंबना यह है कि जिस केरल राज्य में पूर्ण साक्षरता का डंका बजा कर सरकार अपना महिमामंडन करती रही है, ‘असर’ रिपोर्ट के अनुसार 2012 में इस राज्य में साठ प्रतिशत से अधिक बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जा रहे थे। इस वर्ष पूरे देश में निजी विद्यालयों में नामांकन 28.3 प्रतिशत है। मौजूदा समय में हमारे देश में छह से चौदह वर्ष तक की आयु के बच्चों का सड़सठ प्रतिशत हिस्सा अब भी सरकारी स्कूलों में जाता है। लेकिन सच यह है कि ग्रामीण इलाकों में हर साल निजी स्कूलों में नामांकन दस प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा तो 2018 तक देश के ग्रामीण इलाकों में पचास प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे होंगे। सवाल है कि इन हालात में सर्वशिक्षा अभियान का संपूर्ण साक्षरता पा लेने का उद्देश्य किस तरह पूरा हो रहा है।

 

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