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जातिवादी मानस की परतें PDF Print E-mail
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Wednesday, 10 July 2013 10:14

अनिल चमड़िया
जनसत्ता 10 जुलाई, 2013: कइयों के बारे में यह कहा जाता है कि वे सचेत तौर पर जातिवादी नहीं हैं। सचेत और अचेत जातिवाद की पहचान कैसे की जाए? अरुण कुमार उरांव को एक शोध प्रशिक्षण की कक्षा में बोलते हुए एक प्राध्यापक ने सुना तो कहा कि नाम और शक्ल-सूरत से आदिवासी दिखते हो, लेकिन बोलते वक्त ऐसा नहीं लगता है। अरुण की बोली में भय नहीं था। बेबाकी थी और तर्क थे। अभिनय का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली मराठी फिल्मों की नायिका उषा जाधव ने ‘द टाइम्स आॅफ इंडिया’ के साथ साक्षात्कार में कहा कि उन्हें अपने चेहरे-मोहरे और रंग-रूप को लेकर अक्सर खारिज किया जाता रहा है। घर में काम करने वाली बाई जैसी भूमिका के लिए उनके सामने प्रस्ताव आते थे और उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए वे भूमिकाएं स्वीकार करनी पड़ती थीं। जबकि उनका सपना माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी बनने का रहा है।
लेकिन उषा जाधव एक और तस्वीर खींचती हैं। वे कहती हैं कि बिपाशा बसु भी सांवली है, लेकिन वह साथ में छरहरी है। रानी मुखर्जी का शरीर नाटा है, लेकिन उसके साथ उसके परिवार का पहले से फिल्मी दुनिया में मौजूद होना एक पूंजी की तरह काम करता है। उसके पास तो पुणे स्थित फिल्म संस्थान या दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्यविद्यालय जैसी किसी संस्था की डिग्री भी नहीं है। उषा जाधव से और भी सवाल पूछे जाते तो जाति के ढांचे को समझने में और मदद मिलती।
आशीष नंदी ने भारतीय समाज की उत्पीड़ित, शोषित जातियों की पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं और शासन के ढांचे में उनकी उपस्थिति को भ्रष्टाचार के मुख्य कारणों में एक माना और उन्हें जब जातिवादी करार दिया गया तो उनकी तरफ से सफाई आई कि उनका कहने का आशय वह नहीं था, जो समझा जा रहा है। उनसे ज्यादा उनके वकीलों ने उनकी पैरवी की। उस पैरवी का आधार आशीष नंदी के अकादमिक कार्यों को बनाया गया। हर अच्छा वकील अपने मुवक्किल को बेहद अच्छे आचरण वाला, संस्कारवान और जिम्मेदार बताने के लिए उसकी पृष्ठभूमि को पेश करता है। उसकी कोशिश यह होती है कि उसके मुवक्किल को जैसा समझा जा रहा है, वैसा नहीं समझा जाए। आशीष नंदी के पक्ष में वकालत करने वाले कई उदार और प्रगतिशील लोगों ने साफ कह दिया कि नंदी को वे जातिवादी कतई नहीं मान सकते। मैं भी यह मान सकता हूं कि आशीष नंदी जातिवादी नहीं हो सकते।
हमारे समाज में जातिवादी, सांप्रदायिक होने के कई तौर-तरीके उपलब्ध हैं। कई नेता ऐसे हो सकते हैं, जो नास्तिक हों और हिंदुत्व की राजनीति करते हों। जिन्ना भी नास्तिक थे और वे इस्लाम पर आधारित पाकिस्तान की वकालत करने लगे। गांधी वर्णवादी थे, लेकिन छुआछूत का विरोध करते थे। वे खुद को हिंदू भी कहते थे और धर्मनिरपेक्षता की बात भी करते थे। जातिवादी भी धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते दिख सकता है। उसी तरह धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाला भी जातिवादी हो सकता है।
बहुतेरे लोग ऐसे हैं जो सार्वजनिक मंचों पर जातिवाद का विरोध करते हैं लेकिन अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में जातिवादी हैं। जाति पर अकादमिक कार्य करने वाले अधिकतर शिक्षक तक जातिवादी हैं। भारतीय समाज में सार्वजनिक तौर पर जातिवादी नहीं दिखने के न जाने कितने तरीके ईजाद हुए हैं! इसी तरह जातिवाद की पहचान करने के भी कई तरीके हैं। संभव है कोई व्यक्ति जातिवादी न हो, लेकिन भारतीय समाज में उसकी मानसिकता की जिस तरह बुनाई की गई है उसमें जाति बुरी तरह से गुंथी हुई होती है।
आखिर हम किसी व्यक्ति की जाति की पहचान किस-किस तरह से करने की कोशिश करते हैं। बोलने-चालने, उठने-बैठने, पहनने, पेशे, सोच के आयाम आदि कई-कई तरह की अभिव्यक्तियों में जाति की तलाश कर लेते हैं। जैसे लोग कहते हैं कि बातचीत से तो बड़े और संस्कारवान परिवार के सदस्य लगते हैं। गाली की तरह यह कहावत इस्तेमाल की जाती है, गोरा चमार और काला ब्राह्मण। ढेर सारी कहावतें तो उठने-बैठने, खाने-पीने, पहनावे के तौर-तरीकों से जातियों की पहचान करने के लिए ही इस्तेमाल में लाई जाती है।
राजस्थान में सिर की पगड़ी के तौर-तरीके और रंगों से जाति की पहचान की जा सकती है। सार्वजनिक स्थानों में बेधड़क आने-जाने और दरवाजे पर ठिठकने से ही जाति की पहचान हो जाती है। यानी जाति कोई नाम के साथ लगने वाला पुछल्ला ही नहीं है; उसका तो बताने और जानकारी मिलने पर पता चलता है।
मगर उससे पहले ही जाति की पहचान की कई पद्धतियां भारतीय समाज ने विकसित की हैं। जैसे चूहे को गंध से आसपास खाने की चीजों के होने का पता चल जाता है। जातिवाद की पूरी एक संरचना है और वह अपनी जटिलताओं की वजह से ही भारतीय समाज में इतने लंबे समय से न केवल टिका हुआ है, बल्कि समाज को संचालित करने वाली व्यवस्था के रूप में सक्रिय है।
आशीष नंदी के हिमायतियों की तरह मैं भी कहता हूं कि वे जातिवादी नहीं हैं, लेकिन उनके भीतर जातीय भावना होने से इनकार नहीं कर सकता। और न ही यह स्वीकार किया जा सकता है कि उन्होंने खुद को इतना सचेत कर लिया है कि वे


उसके अभिव्यक्त होने से खुद को रोक पाते होंगे। इसलिए आशीष नंदी को जातिवादी भले न कहें, लेकिन उनकी टिप्पणी जातीय भावनाओं से प्रेरित है।
आखिर नंदी को भ्रष्टाचार में जाति और वह भी केवल पिछड़ी, अछूत और आदिवासी जातियां क्यों दिखीं? दूसरी तरह से यह भी सोचा जा सकता है कि अगर आशीष नंदी का पालन-पोषण और परिवेश भिन्न होता तो क्या वे इस तरह से भ्रष्टाचार को देखते? जाहिर-सी बात है कि उन्होंने 1990 से पहले की स्थिति में भ्रष्टाचार को इस रूप में नहीं देखा होगा।
दिक्कत यह है कि अकादमिक क्षेत्र में भी संसदीय राजनीति की तरह ही आरोप और साफ-सफाई की जाती है। अकादमिक क्षेत्र अपने विषय को परत-दर-परत खंगालने की कोशिश करने का नाम है। वरना वह दूसरी किस बात के लिए अकादमिक होने का दर्जा प्राप्त कर सकता है? आशीष नंदी एक समाजशास्त्री हो सकते हैं, लेकिन वे भारतीय समाज में जन्मे, पले-बढ़े और शैक्षणिक क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति हैं। व्यक्ति के जातिवादी होने और जातीय भावना के बीच एक फर्क करना जरूरी लगता है। इस फर्क को अरुण उरांव के प्रोफेसर की टिप्पणी और उषा जाधव की उपेक्षा के कारणों में भी देखा जा सकता है।
आखिर अरुण के प्रोफेसर को क्या जातिवादी नहीं कहेंगे? वे समझते हैं कि आदिवासी की जिस तरह की शक्ल-सूरत और उसका नाम होना चाहिए उसी तरह से उसके बोलने-बतियाने की एक सीमित भाषा निश्चित है। वे उस सीमारेखा को पार होते देख तिलमिलाते हैं। लक्ष्मण रेखा उसी का नाम है। यानी उनके पूरे सोच में जाति का एक ढांचा है। उसे टूटते देख उन्हें दर्द होता है। इस टूटन के दर्द की अभिव्यक्ति को जातिवाद नहीं तो और क्या कहेंगे?आखिर उषा जाधव के नाम और धूल-धूसरित चेहरे से फिल्म निर्माताओं को क्यों लगा कि वह घर की बाई की ही भूमिका अदा कर सकती है? सौंदर्य बोध क्या जातिवाद से अलग है?
यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि बहुत सारे लोगों के बारे में ऐसे ही बात की जाती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में एक नाटक के दौरान शुरुआती दृश्यों को देख आगे की पंक्ति में खड़े दर्शक बहुत खुश थे।
उन दृश्यों में यह बताया गया था कि कैसे आरक्षण की वजह से शिक्षा का बुरा हाल हो रहा है। लेकिन नाटक के आगे बढ़ने के साथ-साथ उनकी खुशी एक खामोशी में तब्दील होती चली गई और आखिरकार उनके पास खामोशी के अलावा कुछ नहीं था। नाटक में यह दिखाया गया कि एक सवर्ण को एक दिन के लिए दलित बना दिया गया। एक दिन में ही उसे अपने जीवन से ऊब होने लगी। उसने दलित के चेहरे को उतार फेंका। वह अपनी जाति में वापस लौट आया।
शुरुआती दृश्यों पर दर्शकों की खुशी भरी प्रतिक्रिया का विश्लेषण करते हुए एक शिक्षक ने कहा कि दरअसल खुश होने वाले दर्शक जातिवादी नहीं हैं। चूंकि उन्हें ऐसा ही बताया गया है कि आरक्षण और शिक्षा के स्तर में गिरावट का सीधा संबंध है, अब वे उसी तरह से अपने शिक्षण संस्थानों को देखने लगे हैं कि विशेष अवसर की व्यवस्था के तहत आने वाले समाज के उपेक्षित वर्गों की वजह से ही योग्यता के उत्पादन में गिरावट दर्ज की जा रही है।
दर्शक जातिवादी नहीं हैं, यहां भी यह मान लिया जाए। तब क्या यह कहा जाए कि उनकी शुरुआती प्रतिक्रिया जातीय भावना से प्रेरित थी? दूसरे, यह भी अगर कहने की कोशिश की जा रही है कि यह उनकी अपनी प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उनके भीतर इस तरह की ही प्रतिक्रिया की जगह बनाई गई है तो वह किसने बनाई है?
इस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करने की भाषा उन्हें कहां से मिली और वे उसे ढोने के बजाय सच समझने की कोशिश करने के लिए क्यों नहीं प्रेरित होते? आखिर उनकी शिक्षा व्यवस्था में ही जातीय भावना को समझने की प्रेरणा कहीं से क्यों नहीं मिल पाती है; बल्कि उसे मजबूत करने के लिए उसे ढोते रहने का प्रोत्साहन कैसे मिलता रहता है? अगर यह कहा जाए कि व्यवस्था में कोई जातिवादी भले न हो, लेकिन जातीय भावना, उस तरह की सोच-समझ वहां सक्रिय है, तो यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल, भारतीय समाज में जातिवाद को लेकर विमर्श के कुछ रटे-रटाए सूत्र हैं। उन सूत्रों की समस्या यह है कि वे जातिवाद का विरोध करते हुए उसे मजबूत करते हैं। जैसे अमेरिका लोकतंत्र की बात करते-करते कैसे पूरी दुनिया में अपना साम्राज्य खड़ा करता है। मूल बात यह है कि जातिवाद का विरोध करने का पाठ कैसे तैयार किया गया है और उसे पढ़ाने वाला कौन है और उस पाठ को किस तरह से पढ़ा जा रहा है। अकादमिक स्तर पर तो जातिवाद के विमर्श की भाषा ही तैयार नहीं की जा सकी है। भारतीय समाज में जाति और जातिवाद को खत्म करने के कोई नियम नहीं हैं। केवल विमर्श है और ऐसा विमर्श है कि वहां केवल विमर्श में दिलचस्पी है। वह मनोरंजन और अवसरवाद की जगह ले लेता है।           (जारी)

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