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तालाब की जगह PDF Print E-mail
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Tuesday, 09 July 2013 09:51

संदीप नाईक 
जनसत्ता 9 जुलाई, 2013: पिछले दिनों अनुपम मिश्र को सुना। उनका पानी बचाने का अभियान और राजस्थान के तालाबों पर काम समझा। उनकी ‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी किताब को पढ़ा है और दर्जनों बार संदर्भ के रूप में उसका इस्तेमाल भी किया है। पर सवाल है कि राजस्थान के जैसलमेर के मॉडल को क्या सारे देश पर लागू किया जा सकता है? जैसलमेर की परिस्थितियां चार सौ साल पहले भी देश के बाकी हिस्सों से अलग थीं और आज भी बिल्कुल अलग हैं। तालाब बनाना पानी की समस्या का स्थायी और सामान्य हल नहीं है, यह बात हमें गांठ बांध लेनी चाहिए। आज पानी की जरूरतें बदली हैं और अब पानी बचाने के नए तरीकों पर भी खुल कर बात करनी होगी। मेरी समझ में अब हमें अपने तर्इं पानी बचाने के नए मॉडल आधुनिक जरूरतों के हिसाब से तय करने होंगे। आज समय बदल चुका है। खेती के लिए जमीन नहीं बची है, रहने के लिए आशियाने नहीं बन रहे, रेल और सड़कों का जाल बुना जा रहा है, हर जगह चार या छह लेन की सड़कों का प्रचलन बढ़ा है जो समय की मांग भी है। कहां है तालाबों के लिए जगह?
मैंने कई भूवैज्ञानिकों से बात की है। कई साथियों ने बताया कि राजस्थान के तालाब और जमीन की बात अलग है। यहां मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्यों में वह मॉडल दोहराया नहीं जा सकता। खुद अनुपमजी या ‘पानी वाले बाबा’, यानी राजेंद्र सिंह
भी इस बात को जानते होंगे। मैं इन दोनों के काम के प्रति पूरी श्रद्धा रखता हूं और उनके काम का सम्मान करता हूं। पर अब नए संदर्भ


में नई बात करनी होगी। हमारे सामने बडेÞ बांध, बड़ी नहरें हैं जो लाख विरोध के बावजूद बन चुकी हैं। देश के अधिकतर राज्य अब सभी जिलों में चौबीसों घंटे बिजली देने को कृतसंकल्पित भी हैं।
मुझे लगता है कि राजस्थान के अतीत के गौरवगान के बजाय अब नया कुछ सृजित करना होगा। नर्मदा, गोदावरी या यमुना पर आधारित हमारे घर, उद्योग-धंधे और खेती के लिए पानी बचाने के नए प्रयोग करने होंगे और इन्हें जनमानस में फैलाना होगा। दूसरे, हमें यह भी देखना होगा कि जमीन और चट्टानें कैसी हैं। क्या ये पानी से जमीन को धंसने से रोकने और नई आव आने देने के लिए उपयुक्त हैं? अगर हां, तब हम सामान्यीकरण करें। अन्यथा हर जगह के लिए वहां की परिस्थिति को समझ कर हमें वैकल्पिक मार्ग खोजने होंगे।
देवास जिले में सात-आठ बरस पहले तत्कालीन जिलाधीश उमाकांत उमराव ने रेवा परियोजना में सभी किसानों को प्रोत्साहित किया था कि वे एक छोटा तालाब बनाएं और बरसात का पानी जमा करें। पूरे जिले में किसानों ने अपने पसीने की कमाई से लगभग चालीस हजार तालाब जोश में आकर बनाए थे। लेकिन कालांतर में अधिकतर तालाब ढह गए, क्योंकि पूरे जिले में अलग-अलग जगहों पर जमीन, चट्टान और पानी सोखने की क्षमता अलग-अलग थी। आज बमुश्किल चार-पांच हजार तालाब बचे होंगे पूरे जिले में। अगर एक जिले की जमीनी हकीकतें इतनी अलहदा हैं तो हम कोई खास मॉडल, वह भी राजस्थान का, किस आधार पर पूरे देश पर लागू करने की बात करते हैं? हमें यह समझना होगा कि तालाब हर समस्या का समाधान नहीं है!

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