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न खुलो न खिलो PDF Print E-mail
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Monday, 08 July 2013 10:16

वर्षा
जनसत्ता 8 जुलाई, 2013: उनतीस साल के एडवर्ड स्नोडेन को अमेरिका की सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) में काम करते हुए लगा कि सुरक्षा के नाम पर अमेरिका उन करोड़ों नागरिकों की निजता का हनन कर रहा है, जो गूगल, फेसबुक, स्काइप, यू-ट्यूब, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल, याहू जैसी वेबसाइटों पर सक्रिय हैं। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की पहुंच इन्हें चलाने वालों के सर्वर तक है। इन कंपनियों के संचालक भले कहते फिरें कि हमने अमेरिकी सरकार से इन सूचनाओं को साझा नहीं किया है, लेकिन एडवर्ड स्नोडेन की मानें, तो उनके जमीर ने यह गवारा नहीं किया कि हर गैर-अमेरिकी का निजी खाता महज इसलिए अमेरिकी सरकार के पास हो, क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता है। सच्चाई यही है कि आप अपनी मासूमियत में इन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर साझा करते है, वह अमेरिका की गिद्ध निगाहों की जद में है। आपके प्रणय निवेदन, तस्वीरें, खत- सब पर खोजी निगाहें हैं। एडवर्ड ने जब इसे उजागर किया, तो उन्हें अमेरिका छोड़ना पड़ा। उन्हें मालूम हो गया है कि उनका यह कदम देशद्रोह की श्रेणी में रखा जा सकता है। उन्होंने इन दिनों हांगकांग में शरण ले रखी है। अपनी पहचान जाहिर करने की इच्छा भी उन्हीं की है।
यह भी सामने आया है कि ये तमाम विवरण व्यावसायिक कंपनियों के साथ भी साझा किए गए हैं। मत भूलिए कि जी-मेल खुलते ही आपसे अक्सर फोन नंबर मांगता है। कई-कई बार। बार-बार पूछे जाने पर एक बार तो आप जाल में फंस ही जाते हैं। अगर आपका फोन नंबर मेल में है, तो किसी भी बंदे के स्मार्ट एंड्रॉयड फोन खरीदते ही आपका इ-मेल फोन नंबर सहित उसके फोन में अपडेट हो जाता है। फिर चाहे आपने कभी औपचारिक काम के लिए इ-मेल क्यों न किया हो। काम के नंबर गायब और अनचाहे नंबर मोबाइल में पसर जाते हैं।
यह बाजार का दौर है।


आपकी हर इच्छा के दाम हैं और इस पर नियंत्रण बाजार का है। घर, गाड़ी, पॉलिसी खरीदने की इच्छा प्रकट कीजिए, बाजार में लोग जाल बिछाए बैठे हैं। कहां से आते हैं इतने संदेश आपके मोबाइल पर। यहां से लोन लीजिए, यहां से दुनिया की सैर कीजिए, इस रेस्तरां में चले आइए, खरा सोना यहां मिलेगा...! इस तरह के तमाम संदेशे आपको इस छोटे से डिब्बे में अनचाहे ही मिलते रहते हैं। किसी भी मॉल में जाइए, लकी ड्रॉ के नाम पर पर्ची-पेन लेकर बंदे तैनात हैं। वे इनाम क्या देंगे, लेकिन आपकी निजी जानकारी जरूर हथिया लेंगे, जो आपने लकी ड्रॉ की उम्मीद में उन्हें सौंप दी है। यह पहला कदम है जो आप अज्ञानता के चलते बढ़ा देते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट भी इसी फंडे पर अपना व्यापार चलाती हैं।
अमेरिकी अखबार में यही सब छप रहा है इन दिनों। जॉर्ज बुश के समय से यानी 2007 से ‘प्रिज्म’ नामक यह अभियान चला हुआ है, जिसमें लोगों की निजी जानकारी चुरा ली जाती है। बराक ओबामा के शासन काल में थोड़ी-सी पूछताछ के बाद भी यह यथावत है। लोग पूछ रहे हैं कि किस स्तर तक आपने हमारी जानकारियां जुटाई हैं। ये तकनीक वाकई इंसान को मशीन बनाने पर ही तुली हुई है। न खुलो, न खिलो। किसी सरकारी नीति की आलोचना आपको महंगी पड़ सकती है। आप शिकंजे में हैं। खुद को जाहिर करने का बहुत नुकसान हो सकता है। मानव सामाजिक प्राणी के नाते आजादी का पैरोकार है। लेकिन इस बार तकनीक का रूप धर कर आए अंग्रेजों ने हमें फिर से गुलाम बना लिया है। हम लट्टू होकर जाहिर हुए जा रहे हैं। बगैर यह जाने कि यह किसी और मुल्क के गुप्त बही-खातों में जमा हो रहा है।

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