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पुरस्कार के परदे PDF Print E-mail
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Saturday, 06 July 2013 12:57

वीरेंद्र जैन
जनसत्ता 6 जुलाई, 2013: कभी विख्यात संस्कृतिकर्मियों को सरकारी सहायता से सम्मानित करना एक अच्छी भावना से शुरू हुआ था। ये पुरस्कार-सम्मान सुपात्रों को तब मिलते थे, जब वे अपने कलाकर्म से कलाप्रेमियों के बीच सम्मानित जगह बना चुके होते थे। उन दिनों सम्मानों का एक क्रम भी होता था। बाद में पुरस्कार देने वाली सरकार और उसके अधिकारियों के प्रति वफादारी उसका आधार बनता गया, तब कोई भी व्यक्ति सरकारी सम्मान और पुरस्कार के रूप में प्राप्त होने वाले धन के सपने देखने लगा। कला के क्षेत्र में सभी यशप्रार्थी होते रहे हैं, पर अपने से वरिष्ठ की उपेक्षा करके पुरस्कार हथियाने की दुष्प्रवृत्ति इसी दौर में पैदा हुई। माहौल यह हो गया कि कलाओं के क्षेत्र में प्रतियोगिता द्वारा पुरस्कार पाने की जगह संपर्कों, संबंधों और वफादारी प्रदर्शन से पुरस्कार हथियाने के लिए षड्यंत्र किए जाने लगे और मीडिया के सहारे एक दूसरे पर ही नहीं, बल्कि सरकार पर भी कीचड़ उछाला जाने लगा। अपनी छवि की रक्षा में सरकार ने विभिन्न गैरसरकारी संस्थाओं को सम्मान-पुरस्कार देने के लिए अनुदान देना प्रारंभ कर दिया। इसके बाद तो इन्हें बांटने वाली संस्थाओं की बाढ़ आ गई, जिनके पदाधिकारी इन अनुदानों से अपना भला करने लगे।
कला के क्षेत्र में इस व्यापार के आने के बाद पुरस्कार देने के लिए ऐसे संपन्न व्यक्तियों और मलाईदार पदों पर बैठे अधिकारियों की तलाश होने लगी, जो सम्मान के बदले संस्था या उसके पदाधिकारियों को लाभान्वित कर सकें। धन हस्तगत करने के लिए पुरस्कार के दौरान स्मारिका निकाली जाने लगी, जिसमें विज्ञापन के नाम पर सरकारी या पुरस्कृत अधिकारियों से संबंधित व्यापारियों, ठेकेदारों, और उद्योगपतियों से यथासंभव राशि जुटाई जाने लगी। आजकल राजधानियों में यह अनेक लोगों का धंधा बन चुका है। पुरस्कार और सम्मान बेचने के लिए एजेंट घूमते हैं, जो पुरस्कार आकांक्षियों की संभावनाएं तलाशते रहते हैं। सरकारी विज्ञापनों के लिए बड़ी संख्या में पत्रिकाएं निकलने लगीं, जिनमें


से कई तो कुल पचास की संख्या से आगे नहीं जातीं। इन पत्रिकाओं ने व्यक्ति विशेष पर विशेषांक निकालने का धंधा शुरू कर दिया। विमोचनों के आयोजन भी किसी विवाह समारोह की तरह भव्य और व्ययसाध्य होने लगे।
साहित्य के प्रकाशक भी अब वैसे अधिकारियों की तलाश में राजधानी के चक्कर लगाते हैं जो पुस्तकों की सरकारी खरीद करा सकें। नतीजतन, खोटे सिक्कों ने खरे सिक्कों को बाजार से बाहर कर दिया है। सरकारी धन का अपव्यय तो और भी अधिक मात्रा में दूसरे क्षेत्रों में हो रहा है, पर इस क्षेत्र की इन गतिविधियों ने कलाजगत को नष्ट कर दिया है। कब कौन किस बात के लिए पुरस्कृत या सम्मानित हो रहा है कोई नहीं जानता। ऐसी प्रकाशित कृतियां केवल भेंट में देने के काम आती हैं, जिन्हें मुफ्त में पाने वाले भी नहीं पढ़ते और इसी जुगुप्सा भाव के कारण कुछ अच्छी कृतियां भी छूट जाती हैं। साहित्यिक गोष्ठियों की जगह पुरस्कार-सम्मान के आयोजन कई गुना होने लगे हैं, जिनमें सम्मिलित होने के लिए परिचितों, मित्रों को भी भव्य दावतों सहित कई तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं।
विष्णु नागर ने अपने एक कवि-मित्र के बारे में लिखा था कि जब उन्होंने अपने पिता को सम्मान मिलने की बात बताई तो पिता ने कहा कि अगर इसके बाद तुम किसी पड़ोस की दुकान से पांच रुपए का साबुन ही उधार लेने की पात्रता अर्जित कर लो, तब मैं मानूंगा कि इस सम्मान का कोई अर्थ है। पता नहीं ऐसे लोग किसे धोखा दे या आत्मछल के शिकार हो रहे हैं। बैठकों में धातु जैसे दिखने वाले प्लास्टिक के स्मृति-चिह्न भरे होते हैं, जिन पर कोई अतिथि निगाह भी नहीं डालता। अभी इन सम्मानों का यह हाल है तो बाद में ये केवल हंसने के काम ही आने वाले हैं!

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