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जिंदगी के पन्ने PDF Print E-mail
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Friday, 05 July 2013 10:31

नीरज पाठक
जनसत्ता 5 जुलाई, 2013: समाचार पत्र नए विहान के सूचक होते हैं। घिस-पिट चुकी जिंदगी को नयापन देने की ख्वाहिश हम सबकी होती है। शायद इसीलिए ताजा अखबार का अपना विशिष्ट आकर्षण होता है। अखबार के मुखपृष्ठ पर कोलाहल-सा छाया रहता है, क्योंकि बीते दिन की अधिकाधिक सनसनीखेज (या फिर रोमांचक!) वारदातों को मुखपृष्ठ पर ही समेटने-सहेजने की व्यावसायिक बाध्यता होती है। समाचार का बिकाऊपन ही उसका स्थान सुनिश्चित करता है। समाचार चूंकि निर्जीव होते हैं, इसलिए उनमें आपस में हम इंसानों जैसी कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं होती। उनकी नियति संपादकीय टोली निर्धारित करती है। ज्यों-ज्यों हम अखबार के अंदर के पृष्ठों की ओर जाते हैं, कम बिकाऊ समाचारों से रूबरू होते हैं। लेकिन इनकी अर्थवत्ता कम नहीं होती। यही समाचार हममें ज्ञान और दृष्टि का संचार कर पाते हैं। अगर आप रेलगाड़ी के सामान्य डिब्बे में यात्रा करते हुए सुबह अखबार खरीद लेने की ऐतिहासिक भूल करते हैं, तो पाएंगे कि आपके समस्त ज्ञान-पिपासु सहयात्री औपचारिकता के अनावश्यक आवरण को त्याग ‘पहले पन्ने’ को हड़पने की जुगत में लग जाते हैं।
पहले पन्ने पर इतना सारा ‘मसाला’ होता है कि मानवीय प्रतिक्रिया का जन्म ले लेना अवश्यंभावी है। पक्ष-विपक्ष की रेखाएं खिंच जाती हैं और एक न खत्म होने वाली बहस का जन्म हो जाता है। आप किस पाले में हैं, यह आपका निर्णय है। निष्पक्ष निर्णायक का पद हमेशा रिक्त होता है। आप खुद को वहां शोभायमान कर सकते हैं। बड़े पद के बड़े खतरे होते हैं, इसलिए थोड़ा सचेत रहना आवश्यक है। वरना परिणाम आपको ही भुगतने होंगे। लाभ और हानि की दृष्टि मस्तिष्क में होती है। अगर आप धनात्मक सोच रखते हैं तो पाएंगे कि झींगुरों-खटमलों से त्रस्त आपकी (और समस्त सहयात्रियों की) यात्रा अचानक रोचक हो गई है।


बिना लवण के भोजन में मानो जैसे किसी ने मिर्च-मसाला लगा दिया हो! थोड़े समय के लिए और आभासी ही सही, आपको सुखानुभूति होगी कि आप एक सामाजिक प्राणी हैं और आपके अंदर का संवाद जीवित है। जब से हम पढ़-लिख कर फ्लैटों-सोसाइटियों में रह कर आधुनिक होने का भ्रम पालने लगे, तब से हमारे संवाद क्षीण हो गए। हमने अखबार के मुखपृष्ठ पर अपनी जगह बनाने की जद्दोजहद में चौथे-पांचवें-सातवें पन्ने की विभूतियों की सुध लेनी छोड़ दी।
भागदौड़ के बीच हमें इतना वक्त ही नहीं मिलता कि अपनी जिंदगी में घुस आई रिक्तता और तिक्तता को पहचान सकें। गर्मियों में निर्जन पथ पर मीलों चलने के बाद एक बूढ़ा बरगद मिल जाए तो राहत मिलती है। वहीं एक घड़े में रखा शीतल जल आपकी संवेदना को सिंचित कर जाता है। और कुछ न सही, अगर हम थके पथिकों के लिए छाया और प्यासों के लिए शीतल जल की भूमिका में आ जाएं तो यह दुनिया रहने की एक बेहतर जगह बन सकती है। हमें पता है कि प्यार और स्नेह बरसाने में हमारा कोई सानी नहीं, तो फिर देर किस बात की!
हम अपने व्यक्तित्व-रूपी अखबार के संपादक खुद हैं। मुखपृष्ठ पर, अपने चेहरे पर किन भावों को स्थान देना है, यह हमें खुद तय करना होगा। अगर हमने वहां कोलाहल और उत्तेजना को स्थायी रूप से चस्पां कर दिया तो परिवार के अंदर और बाहर हमारा आकर्षण समाप्त होना तय है। वहीं विनम्रता और स्निग्धता के भाव हमारी स्वीकार्यता बढ़ाएंगे। हमारे संपादकीय पृष्ठ, यानी हृदय और मस्तिष्क में करुणा, दया, प्रेम और परदुख-कातरता स्थायी निवासी हों, सामंजस्य और समावेश के प्रति हमारा दृढ़ आग्रह हो।

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