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हालात माकूल नहीं, पर कांग्रेस को चुनावी समीकरण पर भरोसा PDF Print E-mail
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Friday, 05 July 2013 09:59

मनोज मिश्र, नई दिल्ली। विपरीत हालात में भी अपने समीकरणों के बूते कांग्रेस के नेता ने लगातार चौथी बार विधानसभा चुनाव जीतने की उम्मीद में अपनी तैयारी तेज कर दी है। दिल्ली में कांग्रेस-भाजपा में सीधा मुकाबला होता है। भाजपा को वैश्य, पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए पंजाब मूल के लोगों, सरकारी कर्मचारियों, उत्तराखंड के प्रवासी और कुछ सवर्णों का समर्थन मिलता रहा है। अल्पसंख्यक, ज्यादातर दलित, गांव देहात के लोगों और बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से आए प्रवासी कांग्रेस के समर्थक माने जाते हैं।
गैर भाजपा मतों में विभाजन के बिना भाजपा की जीत नहीं हो सकती है। भाजपा के सामने वोट बैंक बढ़ाने की चुनौती है। कांग्रेस ने अल्पसंख्यक वोटों को अपने साथ बनाए रखने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है। बिहार मूल के उदार छवि वाले डा. शकील अहमद को ठीक विधानसभा चुनाव से पहले प्रभारी बनाने के बाद जामिया के कुलपति डा. नजीब जंग को दिल्ली का उपराज्यपाल बना दिया गया। इसी तरह की तैयारी दलित वोटों को एकजुट करने के लिए करना होगा। 2008 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बसपा को दो सीटें मिली। बसपा का वोट साढ़े चौदह फीसद हो गया था।
2003 के चुनाव में बसपा की बढ़त को रोकने के लिए चुनाव से कुछ ही महीने पहले तब के विधानसभा अध्यक्ष चौ. प्रेम सिंह को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था। अब तो उस स्तर पर बदलाव संभव नहीं है लेकिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव विधायक जयकिशन जैसे दलितों में सक्रिय नेताओं को कांग्रेस में बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने से कांग्रेस की पकड़ फिर दलितों में बढ़ सकती है।
1993 के विधानसभा में 42.82 फीसद वोट लाकर भाजपा ने सरकार बनाई। उस चुनाव में जनता दल को 18 फीसद वोट और चार सीटें मिली। अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस के बजाए जनता दल को वोट किया। तब इसके नेता रामवीर सिंह विधूड़ी होते थे, जो अब कांग्रेस होते हुए एनसीपी में पहुंच गए हैं। उस चुनाव के बाद भाजपा को न तो कभी 36 फीसद से ज्यादा वोट मिला और न ही कोई तीसरा दल कांग्रेस को चुनौती दे पाया। मध्यम वर्ग में सेंध लगाकर शीला दीक्षित ने दिल्ली भाजपा से छीनी और कांग्रेस की छवि बदलने का काम किया। अल्पसंख्यक बहुल पांच विधानसभा सीटों से भाजपा दूर है।
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित बारह में से दस पर कांग्रेस का कब्जा है। करीब दर्जन भर कांग्रेस के ऐसे विधायक हैं जो लगातार अपने क्षेत्र से चुनाव जीत रहे हैं। इसमें अपवाद स्वरूप बदलाव भी होते रहे हैं लेकिन भाजपा बड़े पैमाने पर कभी भी कांग्रेस के कहे जाने वाले वोट बैंक को नहीं तोड़ पाई। कांग्रेस के वोट को तो तीसरे मोर्चा के दल ही बंटवारा करने की क्षमता रखते हैं। जनता दल (एकी) ने साबिर अली को पार्टी का दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष बनाया। अपने-अपने इलाके में बिधूड़ी, शोएब इकबाल जैसे नेता कांग्रेस के कहे जाने वाले वोटों को विभाजित कर पाएंगे लेकिन पूरी दिल्ली में जैसा भाजपा का असर है वैसा असर किसी तीसरी पार्टी का अभी नहीं दिख रहा है।
एक तो बसपा का कोई ऐसा नेता नहीं है जो पूरी दिल्ली में प्रभाव रखता हो और बसपा का असर दलितों में एक जाति विशेष में ही है। उसमें असर रखने वाले और कोई चुनाव न हारने वाले प्रेम सिंह अब कम सक्रिय हैं। जय किशन, दिल्ली सरकार के मंत्री राजकुमार चौहान, मालाराम गंगवार, अंबरीश गौतम, वीर सिंह धींगान आदि के ठीक से सक्रिय होने से ही कांग्रेस की पकड़ मजबूत दिखेगी। जयकिशन  जैसों के प्रयास से अल्पसंख्यक जैसा दलित वोट में भी बंटवारा कम होगा।
दिल्ली में हर साल करीब


पांच लाख मतदाता बढ़ रहे हैं। बढ़कर यह बढ़ोतरी बाहरी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली में ज्यादा हुआ है। दिल्ली में अल्पसंख्यक (मुसलिम) आबादी का औसत 10 था अब यह बढ़कर 15 हो गया है। 70 में से 46 सीटें ऐसी है जिनमें मुसलिम वोट पांच फीसद से ज्यादा है। इसमें दलित वोट जुड़ते ही यह 20 फीसद से ज्यादा हो जाते हैं। बीस का मतलब औसत 40 हजार वोट। इसे इकठ्ठा करने से ही कांग्रेस की जीत सुनिश्चित हो जाएगी। इनमें से 14 सीटें अभी भाजपा के पास है।
इसी तरह उनमें 26 सीटें ऐसी हैं जहां दस फीसद से ज्यादा अल्पसंख्यक  मतदाता हैं उनमें  भी आठ भाजपा के पास है। इसलिए अपवाद में तो कई अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर भाजपा के विधायक जीते हुए हैं लेकिन यह महज संयोग ही होगा। जिन छह सीटों में 35 से ज्याद अल्पसंख्यक हैं उससे ज्यादा पक्की जीत पांच से 30 फीसद वाले अल्पसंख्यक वाले सीटों पर मानी जा रही है।
दिल्ली में 18 फीसद दलित वोटर हैं उनमें ज्यादा पैठ कांग्रेस की मानी जाती है। यह संयोग ही है कि जिन 16 सीटों पर दलित और अल्पसंख्यक वोटर 15 फीसद से कम हैं, उनमें  पांच ही कांग्रेस के पास है। वह पांच सीटें-विश्वास नगर, रामकृष्ण पुरम, राजौरी गार्डन, विकासपुरी और उत्तमनगर कांग्रेस के उम्मीदवारों के बूते कांग्रेस की जीत हुई। बाकि रिठाला, रोहिणी, शालीमार बाग, शकूर बस्ती, जनकपुरी, कृष्ण नगर, मोती नगर, हरिनगर, तिलक नगर, ग्रैटर कैलाश और पालम में भाजपा जीती हुई है।
जो नई आबादी दिल्ली में आ रही है वह प्रवासियों की है जो रोजगार के तलाश में दिल्ली आते हैं और नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली में जगह न मिलने पर बाहरी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली में अपने रहने की जगह खोज लेते हैं। उनके चलते वोट का समीकरण लगातार कांग्रेस के पक्ष में होता गया। अब तो कांग्रेस के नेता भी खुलेआम कहते हैं कि अगर निगम की सीटें छोटी न होती तो कांग्रेस निगम चुनाव में भी नहीं हारती क्योंकि भाजपा के वोट का औसत बढ़ नहीं पा रहा है। इसी के चलते ही 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज 3.45 फीसद के अंतर से चुनाव जीत गई। इससे पहले 2003 में कांग्रेस ने 12.91 फीसद के अंतर से और 1998 में 13.74 फीसद के अंतर से भाजपा को पराजित किया था। जबकि 1993 में भाजपा ने 8.3 फीसद के अंतर से कांग्रेस को हराया था।
कांग्रेस के उपाध्यक्ष और दिल्ली के परिसीमन में बड़ी भूमिका निभाने वाले चतर सिंह का कहना है कि चाहे कई मुद्दे कांग्रेस के खिलाफ हों लेकिन जमीनी समीकरण हमारे पक्ष में है। केवल परंपरागत वोटर कांग्रेस के साथ रहे तो कांग्रेस के बढ़त को बसपा या रामवीर सिंह बिधूड़ी की एनसीपी ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाएगी। दलित क्या मुसलिम मतों को अपने पक्ष में करने के लिए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विजय गोयल पूरी ताकत लगाए हुए हैं। दलित वोट भाजपा को मिलते हैं लेकिन वे पार्टी से ज्यादा निजी प्रयास से। गोयल ने इस बार इस मिथक को तोड़ने के प्रयास किए हैं। अभी बसपा को जो दो सीटें मिली हुई है उसमें एक बदरपुर तो नाम के लिए बसपा की है। वहां से चुनाव जीते राम सिंह मूलरूप से कांग्रेस के ही एक धड़े के समर्थन से चुनाव जीते। दूसरी गोकुलपुर सीट पर बसपा की जीत निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए चुनौती है। कांग्रेस की कोई कमी इस बार उसे ज्यादा महंगी पड़ेगी क्योंकि मुद्दे तो सारे ही उसके खिलाफ हैं।

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