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खिड़की में फाख्ता PDF Print E-mail
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Thursday, 04 July 2013 10:03

कविता रावत 
जनसत्ता 4 जुलाई, 2013: कभी जब घर-आंगन, खेत-खलिहान, धूल भरी राहों और जंगल की पगडंडियों में भोली-भाली शांत दिखने वाली फाख्ता (पंडुक) भोजन की जुगत में कहीं नजर आती तो उस पर नजर टिक जाती। उसकी भोली प्यारी सूरत देख कर उसे पकड़ कर अपने पास रखने को मन मचल उठता तो उसके पीछे-पीछे दबे पांव चल देते। वह भी हमें पास आता देख मुड़-मुड़ कर टुक-टुक-टुक कर दाना चुगते हुए तेजी से आगे बढ़ जाती। इससे पहले कि हम उसके करीब पहुंचते, झपट्टा मार कर उसे पकड़ने की नाकाम कोशिश करते, वह उड़ान भर कर मानो यह कहते हुए फुर्र हो जाती कि ‘फिर कभी संग चलूंगी तुम्हारे! जरा अभी दाना-पानी में व्यस्त हूं।’
आज तीस बरस बाद जब घर की खिड़की से लटके टीवी एंटेना पर फाख्ते का घरौंदा देख रही हूं तो मन खुशी से भर गया है। अभी साल भर हुआ है अपने इस नए घर में रहते हुए, लेकिन इस दौरान तीन बार उस घोंसले में फाख्ता ने अपना घर-परिवार बसाया है। दो बार फाख्ते के चार बच्चों को पलते-बढ़ते देखना मुझे और मेरे परिवार को बहुत सुखकर लगा। तीसरी बार फिर जब उसी घरौंदे में उसे दो सफेद अंडों को सेती देख रही हूं तो अचरज भरी खुशी से झूम उठी हूं कि निश्चित ही उसे भी मेरे घर के पास रहना सुरक्षित लगता होगा! मेरे घर के सदस्यों में उसे कुछ तो अपनापन झलकता होगा।
जब कभी छुट्टी के दिन भरी दुपहरी में एक साथ दो-तीन फाख्ताओं की टुर्र-टुर्र टुर्र-टुर्र-सी प्यारी ममता भरी आवाज मेरे कानों में गूंजती है तो मुझे आभास होता है जैसे मैं गरमी के दिन जंगल में कहीं छोटे-छोटे झबरीले-रोबीले चीड़ की छांव में आराम से


बैठी उसकी टहनियों में छिप कर बैठी फाख्ताओं (स्थानीय बोली में घुघुता-घुघती) की धुन में रमी हुई हूं। उनकी लरजती-खनकती, ममतामयी बोली में मुझे अपना वह प्रिय लोकगीत याद आने लगता है, जिसमें मायके से दूर ससुराल में रह रही कोई नई नवेली दुल्हन व्याकुलता में मायके को याद कर अपना दुखड़ा फाख्ते को सुनाने बैठ जाती है- ‘ना बांस घुघती चैत की, खुद लगी च मां मैत की...! घुघुती घुरौण लैगे मेरा मैत की, बौड़ि-बौड़ि ऐगे ऋतु चैत की...!’
आजकल जब दफ्तर निकलती हूं तो बच्चों को नानी के घर छोड़ आती हूं। दफ्तर से दिन में एक-दो बार जरूर फोन लगा कर हालचाल पूछ कर बच्चों की चिंता से मुक्त हो लेती हूं, लेकिन इस बीच आंखों में घर के एंटेना पर बड़ी शांतिपूर्वक घोंंसले में बैठी मासूम फाख्ता अंडों को सेती नजर आने लगती है। इसी चिंता में मैं कभी-कभी भगवान से प्रार्थना करने बैठ जाती हूं कि वह उन्हें सपरिवार सलामत रखे और जब अंडों से बच्चे बाहर निकल आएं तो उन्हें भी जल्दी से बड़ा कर दें, ताकि वे हमेशा मेरे बगीचे, घर-आंगन में रह कर मेरे करीबी बने रहें। इसी सोच-विचार के चलते शाम को बच्चों को लेकर जैसे ही घर पहुंचती हूं तो घर का ताला बाद में खोलती हूं, पहले फाख्ता का घर-परिवार देख चिंता-मुक्त हो लेती हूं। जब-जब मैं उसे गहरी आत्मीयता से देखती हूं, मुझे महसूस होता है जैसे वह भी उसी तन्मयता से मुझे अपनी प्यारी ममता भरी मासूम नजर से निहार रही है, जिसे देख मेरा मन आत्मविभोर हो उठता और इससे मेरे घर में खुशी की लहर दौड़ने लगती है।

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