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मोदी के लिए मौका और मुश्किलें PDF Print E-mail
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Tuesday, 25 June 2013 09:22

विजय विद्रोही
जनसत्ता 25 जून, 2013: बहुत साल पहले अमोल पालेकर की एक फिल्म आई थी: ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाएं’। इस फिल्म में संवाद कविता के रूप में थे। नाना पाटेकर बारिशकर नाम के एक किरदार में थे जो सूखाग्रस्त इलाकों में बारिश करवाने का दावा करता है। नाना पाटेकर का एक डायलॉग था- जब उम्मीद की कलियां मुरझाती हैं, जब सपनों का झरना सूखता है, तब मैं आता हूं और बरस जाता हूं। यह डायलॉग कुछ-कुछ नरेंद्र मोदी पर लागू होता है।
मोदी से भी लोग उम्मीद कर रहे हैं। मोदी सपना जगा रहे हैं। तमाम सर्वेक्षण बता रहे हैं कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी देश के लोगों की पहली पसंद हैं। खासतौर से शहरी मध्यवर्ग को लगता है कि एक मौका मोदी को देना ही चाहिए। लोग यह भी सोचते हैं कि उनके आने से देश की समस्याएं निपट जाएंगी। लोगों को लगता है कि मोदी का गुजरात का विकास मॉडल देश भर में चलेगा। जन-भावना को भाजपा भी भांप रही है और संघ को भी लग रहा है कि विकास और हिंदुत्व को साथ-साथ चला कर सत्ता हासिल की जा सकती है। संघ के साथ-साथ विश्व हिंदू परिषद और साधू-संत भी मोदी पर दांव लगाने को तैयार हैं। इन सभी को लगता है कि मोदी के आगे आने से ध्रुवीकरण होगा और इसका सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को मिलेगा।
अब मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से किस हद तक ध्रुवीकरण होगा और क्या वास्तव में भाजपा इसके सहारे दो सौ पार जा पाएगी यह कहना अभी बहुत मुश्किल है। लेकिन मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपे जाने का असर साफ दिख रहा है। राजनीति में एकदम से उबाल आ गया है। कहते हैं कि राजनीति में एक हफ्ता बहुत होता है। यह बात सही साबित हुई है। देखते-देखते मोदी को गोवा में भाजपा की बैठक में चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया जाता है। आडवाणी नाराज हो जाते हैं। इस्तीफा देते हैं। कड़ा पत्र लिख कर भाजपा की दशा-दिशा पर गंभीर सवाल उठाते हैं। कुछ गुमनाम शर्तों के साथ इस्तीफा वापस लेते हैं। नीतीश आंखें दिखाते हैं। सत्रह साल का गठबंधन टूट जाता है। जद (एकी) राजग से अलग हो जाता है। मोदी चुनाव अभियान समिति के संयोजक के तौर पर पहली बैठक करते हैं। आडवाणी से मिलते हैं लेकिन गिले-शिकवे दूर नहीं हो पाते हैं। आडवाणी चुनावी सभाओं से खुद को अलग करने का आग्रह करते हैं।
उधर इन्हीं दस दिनों में कांग्रेस अपने संगठन और सरकार दोनों में फेरबदल करती है। संगठन में युवा चेहरे आगे किए जाते हैं। सरकार में बुजुर्गों को मंत्रालय थमाए जाते हैं। जो कांग्रेस बिहार में न तीन में थी न तेरह में, अचानक उसी कांग्रेस के दोनों हाथों में लडडू हैं। वह लालू-पासवान से हाथ मिलाए या नीतीश के साथ, उसे दोनों ही सूरतों में फायदा होना है और दो राज्यों में होना है। बिहार के साथ-साथ झारखंड में भी लाभ होगा जहां इस साल के अंत तक पांच अन्य राज्यों के साथ चुनाव हो सकते हैं। यह सब हुआ है मोदी की वजह से। न मोदी गोवा में घोषणा की जिद करते, न आडवाणी रूठते, न इस्तीफा होता, न नीतीश अलग होते, न कांग्रेस को मजबूती मिलती। तो जिस मोदी के कारण इतना सब हुआ वही मोदी अब आगे क्या करेंगे!
हो सकता है कि मोदी अंदर ही अंदर पिछले दिनों की घटनाओं से परेशान हुए हों, लेकिन ऊपर से वे वैसा ही गंभीर चेहरा लिए दिल्ली में घूम रहे थे। उलटे उनके तेवर आक्रामक हैं। वे नीतीश को नकार रहे हैं, कह रहे हैं कि भाजपा हर सभा में नीतीश को धोखेबाज कहने से परहेज न करे। मोदी महिला और युवा मतदाता पर खास जोर दे रहे हैं।
कह रहे हैं कि मनमोहन सिंह सरकार पर हमले करने का कोई मौका नहीं चूकना चाहिए। उन्होंने नया नारा भी दे दिया है। सबका साथ सबका विकास। यह नारा कांग्रेस के नारे ‘आपका पैसा आपके हाथ’ या ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’ को टक्कर दे सकता है। सुना है कि मोदी का कहना है कि नीतीश जैसों की कोई जरूरत नहीं है और पार्टी अपना अलग रास्ता तलाश कर भी जीत के रास्ते पर बढ़ सकती है। आडवाणी जहां राजग का विस्तार करने पर जोर देते रहे हैं वहीं मोदी अपने दम पर किला फतह करने पर आमादा हैं।
अब सवाल उठता है कि मोदी क्या आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतर सकेंगे या फिर क्या मोदी अपने दम पर भाजपा को दो सौ के लगभग सीटें दिलवा पाएंगे ताकि उनकी सरकार बनने की संभावना खड़ी हो सके। क्या मोदी इतने लोकप्रिय हैं, क्या उनका गुजरात मॉडल इतना शानदार है, क्या 2002 के दंगों के दाग धुल चुके हैं, क्या मोदी इस कदर ध्रुवीकरण कर सकेंगे कि भाजपा के पक्ष में निर्णायक वोट गिरें।
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर भाजपा के आला नेता भी मंथन कर रहे हैं और संघ भी सोच रहा है कि क्या हिंदुत्व और विकास को साथ-साथ रख चुनाव मैदान में उतरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी है।
इतिहास बताता है कि मोदी की भाजपा को सचमुच चमत्कार करके दिखाना


पड़ेगा। भाजपा को कम से कम अट्ठाईस से तीस फीसद वोट और दो सौ से ज्यादा सीटें लानी होंगी। इतिहास इसका साथ नहीं देता। जनसंघ को 1967 के चुनावों में पहली बार 9.4 फीसद वोट मिले थे। उस समय जनसंघ में शहरी व्यापारी, महाराष्ट्र के ब्राह्मण और पाकिस्तान से आए हिंदू शामिल थे। अयोध्या का आंदोलन आडवाणी ने चलाया तो 1989 में भाजपा का वोट साढ़े ग्यारह फीसद हो गया। दो साल बाद चुनाव हुए तो भाजपा को बीस फीसद वोट मिले। 1996 में इसमें मामूली इजाफा हुआ, उसका वोट प्रतिशत बढ़ कर 20.3 हो गया। 1998 में 25.6 प्रतिशत वोट मिले जो कांग्रेस को मिले वोट के लगभग बराबर थे। सीटें मिली एक सौ चौरासी।
लेकिन इसके बाद से भाजपा की सीटें भी कम हुई हैं और वोट फीसद भी गिरा है। पिछले आम चुनाव में भाजपा को 114 सीटें और 19.8 फीसद वोट मिला था यानी भाजपा 1991 के दौर में पहुंच गई थी। कांग्रेस को उसके मुकाबले करीब नौ प्रतिशत वोट ज्यादा मिले लेकिन सीटें 206 आर्इं। साफ है कि वोट प्रतिशत बढ़ने से कांग्रेस की सीटें जितनी रफ्तार से बढ़ती हैं वैसा भाजपा के साथ नहीं होता। मोदी को इन आंकड़ों पर भी ध्यान देना होगा। 1998 के मुकाबले देश में क्षेत्रीय दल और मजबूत हुए हैं।
बंगाल में ममता बनर्जी, ओड़िशा में नवीन पटनायक, उत्तर प्रदेश में सपा या बसपा, तमिलनाडु में जयललिता या करुणानिधि के साथ-साथ हमें अब आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी दिख रहे हैं। इनमें से जयललिता को छोड़ बाकी मोदी के साथ जाते दिख नहीं रहे हैं। मोदी ने जब से गुजरात के बाहर घूमना और भाषण देना शुरू किया है तब से उनके दावों पर भी सवाल उठने लगे हैं। गुजरात मॉडल की कमजोरियां भी सामने आ रही हैं।
कहा जा रहा है कि मोदी उद्योगपतियों की ही मदद करते हैं, उन्हें इतनी सारी रियायतें और सुविधाएं देते हैं कि कोई भी उद्योग गुजरात में लगाने को तैयार हो जाए। यही उद्योगपति मोदी का गुणगान करते हैं और बाकी का काम मोदी की प्रचार-प्रसार टीम संभाल लेती है। सामाजिक क्षेत्र में मोदी का विकास मॉडल थमा हुआ है। कैग भी साफ कर चुका है कि मोदी किस तरह नियमों को ताक पर रखउद्योगपतियों की मदद करते हैं और इससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचता है।
पहले ये बातें कोई करता नहीं था, लेकिन अब इस पर चर्चा होने लगी है। अभी देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल है लेकिन यह भाजपा के पक्ष में नहीं है। क्षेत्रीय दलों की अपनी भूमिका है। मोदी को न केवल नया नारा देना है, नया एजेंडा सामने रखना है बल्कि देश की जनता को संतुष्ट करना है कि भाजपा ही एकमात्र विकल्प है। क्या मोदी गुजरात मॉडल की दुहाई देकर (यहां भी कमजोरियां लगातार सामने आ रही हैं) जनता का विश्वास जीतने में कामयाब हो पाएंगे। ध्यान रखें कि उन्हें सिर्फ कामयाब नहीं होना है बल्कि निर्णायक कामयाबी चाहिए। मोदी का जादू कितना चलेगा इसका सबूत नवंबर में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सामने आना चाहिए।
यहां दिल्ली जीतना बेहद जरूरी होगा। मोदी शहरी मध्यवर्ग की बात करते हैं, सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, उनकी पकड़ महानगरों में ज्यादा है। इस हिसाब से देखा जाए तो मोदी को दिल्ली जीतना चाहिए और शीला दीक्षित सरकार की विदाई होनी चाहिए।
मोदी ऐसा कर पाएं तो फिर 2014 में उनके लिए रास्ता आसान हो जाएगा। मोदी भी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा जीती तो वह जीत रमन सिंह के खाते में जाएगी लेकिन हारे तो ठीकरा उनके सिर फूटेगा। यही बात मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे को लेकर भी लागू होती है।
आपका समय शुरू होता है अब... अमिताभ बच्चन ‘कौन बनेगा करोड़पति में’ जिस अंदाज में कहते थे उसी तर्ज पर कहा जाए तो मोदी का समय शुरूहो गया है। मोदी के पास लेकिन ‘लाइफ लाइन’ बहुत ज्यादा नहीं हैं। आडवाणी को नाराज कर और जद (एकी) को राजग से अलग करने की वजह बन वे एक ‘लाइफ लाइन’ गंवा चुके हैं। पार्टी में एक धड़ा अंदर ही अंदर उनका विरोध भी करता है लेकिन आडवाणी का हश्र देखकर फिलहाल खामोश है। इन्हें अपने साथ लेना मोदी के लिए बड़ी चुनौती है। मोदी खुद कह चुके हैं कि बहुत वक्त नहीं बचा है। फिर, हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस के पास वापसी का रास्ता खुला है, चाहे वह संकरी-सी गली ही क्यों न हो।
अंत में फिर फिल्म ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाएं’ का जिक्र। फिल्म के अंत में बारिश होती है। लोग खुश होते हैं। लेकिन बारिश होने से ठीक पहले बारिशकर (नाना पाटेकर) गायब हो चुका होता है। अब बारिश होने का समय तय था और बारिशकर सिर्फ माहौल बना रहा था या बारिश आने तक लोगों में बारिश की उम्मीद जगा रहा था... यह साफ नहीं है। 2014 के चुनाव के नतीजे आने के बाद भी यह कभी साफ नहीं हो सकेगा कि मोदी की वजह से भाजपा कहां तक पहुंची और मोदी न होते तो भाजपा कहां तक पहुंचती।

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