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ईरान का रूहानी दौर PDF Print E-mail
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Monday, 24 June 2013 10:44

अख़लाक़  अहमद उस्मानी
जनसत्ता 24 जून, 2013: चॉकलेट-बिस्कुट के बेहद शौकीन बारह साल के हसन रूहानी ने दो सपने देखे थे। देश की बागडोर संभालने और बेहतरीन फुटबॉल खिलाड़ी बनने के। फुटबॉल तो कहीं छूट गया, लेकिन चौंसठ साल की उम्र में हसन रूहानी ईरान के राष्ट्रपति बनने में जरूर सफल हो गए। शालीन, उदार, इस्लामी फ़िक़  (न्यायशास्त्र) के ज्ञाता और छह जुबानों के माहिर डॉ हसन फिरयदून रूहानी को ईरान की जिम्मेदारी तब मिली है जब देश संकट से गुजर रहा है। अरब के अपने ही घर में पराए बेटे जैसा सलूक झेल रहे ईरान के सामने बिखरते दोस्त, कमजोर आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंध ही मुश्किलें नहीं; रूहानी को फारस की खाड़ी, अरब सागर से लेकर भूमध्य, अंध और कैस्पियन सागर तक वर्तमान पहुंच को बनाए रखना है। रूस, चीन, भारत, वेनेजुएला और क्यूबा जैसे हमदर्द देशों से संबंध और प्रगाढ़ करने हैं और इसी बीच कहीं भुगतान असंतुलन को दूर कर तेल बेच कर रोटी का इंतजाम करना है।
रूहानी परमाणु मसले पर पश्चिम से संबंध मधुर बनाने और बेरोजगारी मिटाने के मुद््दे पर चुनाव जीत कर आए हैं। यह कहा जा सकता है कि अहमदीनेजाद की नीतियों के सविनय विरोध का फायदा रूहानी को मिला है। लेकिन इस विरोध ने उन्हें रोजगार के नए अवसर खोजने, अमेरिकी और यूरोपीय प्रतिबंधों के बीच से कहीं रास्ता निकालने और सीरिया पर संभावित हमले पर व्यापक सोच की बड़ी चुनौतियों से जोड़ दिया है। रूहानी अहमदीनेजाद से ज्यादा चुनौतीपूर्ण स्थिति में आ गए हैं। उन्हें कठमुल्लाओं को ही खुश नहीं रखना है बल्कि देश के सामने व्यावहारिक जरूरतों को पूरा करने का उद्यम भी करना होगा। कहा जा सकता है कि हसन रूहानी पर ईरान की रूहानी से ज्यादा जिस्मानी जरूरतों को पूरा करने की उम्मीदों का बोझ है।
ईरान में शाह के खिलाफ इस्लामी क्रांति में हसन रूहानी के पूरे परिवार ने भाग लिया था। रूहानी सिमनान के रहने वाले हैं। वर्ष 1960 में उन्होंने इस्लामी शिक्षा लेना प्रारंभ किया। शिया इस्लामी शिक्षा के बड़े धर्मगुरुओं मुहम्मद मोहगिग, मुर्तजा हायरी, मुहम्मद रजा और मुहम्मद फजल लनकरानी आदि से उन्होंने इस्लामी तालीम और फ़िक़ (इस्लामी न्यायशास्त्र) की पढ़ाई की। तेहरान विश्वविद्यालय से कानून की स्नातक डिग्री, ग्लासगो विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड से एम.फिल. और यहीं से 1999 में मनोविज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री ली। उनकी पीएचडी के विषय से हम समझ सकते हैं कि वे इस्लामी न्यायशास्त्र को कल्याण से जोड़ कर देखते हैं। ‘ईरान के तर्जुबे के संदर्भ में शरिया कानून का लचीलापन’ विषय पर शोध करने वाले हसन रूहानी के हाथ वाकई वह लम्हा आ गया जब उन्हें शरिया पर चल रहे इस धर्मतंत्र आधारित इस्लामी गणतंत्र की चुनौतियों से पार पाना है। फारसी के अलावा अरबी, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच और रूसी जुबान के माहिर हसन रूहानी कभी दुभाषिये का इस्तेमाल नहीं करते। मुश्किल यह है कि रूहानी का मुल्क सबकी बोली समझ लेता है, लेकिन अपनी बोली समझा नहीं पाता।
कट््टर शिया चिंतक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि हसन रूहानी को अमेरिका और यूरोप का अधिकांश मीडिया उदार और सुधारवादी क्यों कह रहा है? कहीं ‘सुधारवादी’ शब्द के पीछे अमेरिकी चाल तो नहीं? लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि ईरान के सर्वोच्च सत्ताधीश अली खामनेई और अहमदीनेजाद के एजेंडे के विरोध के बावजूद ईरान की आठ करोड़ जनता ने उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर चुना। किन लोगों से मुकाबला कर रूहानी जीते हैं अगर यह जानेंगे तो ईरान की जनता के मिजाज को भांपा जा सकता है। तेहरान के कट््टर शिया मेयर मुहम्मद बाकर क ालीबाफ देश की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव और परमाणु वार्ताकार सईद जलीली, ईरानी सेना के पूर्व प्रमुख मोहसिन रिजाई, खामनेई के खासमखास पूर्व विदेशमंत्री अली अकबर विलायती और निर्दलीय मुहम्मद गराजी।
रूहानी को पसंद किए जाने के पीछे उनकी आर्थिक सुधारवाद की मंशा और अतिराष्ट्रवाद से विमोह है। पिछले यानी 2009 के चुनाव के दौरान अहमदीनेजाद की नीतियों का विरोध करने वाले मीर हुसैन मुसावी और मेहदी करूबी को पिछले चार साल से घर पर नजरबंद कर रखा गया है।   अहमदीनेजाद के खिलाफ  चलाए गए मीर हुसैन मुसावी के ‘ग्रीन मूवमेंट’ में हसन रूहानी भी हिस्सा लेते रहे हैं, लेकिन अपनी शालीनता की वजह से उन्हें आक्रामक नहीं माना जाता। उम्मीद की जानी चाहिए कि हसन रूहानी के आने के बाद दोनों नेताओं की नजरबंदी समाप्त की जाएगी। परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएइए) से देश के प्रतिनिधि के तौर पर कई बार चर्चा कर चुके हसन रूहानी मानते हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण और ऊर्जा जरूरतों के लिए है, जो किसी भी संप्रभु देश का हक  होता है। वे हमेशा इस बात की वकालत करते रहे हैं कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पारदर्शिता बरती जा रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्द्धन को टाल दे। 
चुनाव जीतने के बाद हसन रूहानी ने प्रेस वार्ता में कहा कि सीरिया संकट का हल वहां की जनता को करना है। रूहानी के बयान की तारीफ  करते हुए ब्रिटेन के पूर्व विदेशमंत्री जैक स्ट्रॉ ने आशा जाहिर की है कि रूहानी के आने से क्षेत्र में शांति बहाली में मदद मिलेगी। रूहानी का मत है कि सीरिया में शांति बहाली के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 5+1 और क्षेत्रीय देशों (अरब) के साथ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाए; सीरिया में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करवाए जाएं। तभी वहां शांति लौट सकती है। रूहानी सीरिया के मुद््दे पर आक्रामक होने के बजाय बड़ी


लकीर खींच रहे हैं, जिसके पार जाने से अमेरिका को अपनी विश्वसनीयता खोने का डर रहेगा। सीरिया के मुद््दे पर जी-8 के सम्मेलन में पुतिन के कड़े रुख की वजह से कैमरन और बराक ओबामा पीछे हटे हैं। सीरिया के मामले में पुतिन की मुखरता से बेशक रूहानी को राहत मिली होगी। ईरान से राजनीतिक और आर्थिक विरोध के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को आशा है कि हसन रूहानी के आने से ईरान की समस्याएं कम होंगी।
रुहुल्लाह खुमैनी की 1989 में मौत के बाद सर्वोच्च नेता के पद पर बैठे अली खामनेई की उम्र भी तिहत्तर साल है। चौबीस साल से सर्वोच्च नेता के तौर पर उनका भी अनुभव है कि ईरान पिछले दो साल में जितना आर्थिक रूप से कमजोर हुआ है उतना तो 1989 से 2010 तक नहीं हुआ था। थकान से भरपूर अली खामनेई को भी रूहानी एक उम्मीद देते हैं। एक ऐसा देश जो अपने मानव संसाधन, उत्पादन, खनिज और ज्ञान से चोटी पर हो सकता है, पर वह रोटी को ही तरस जाए तो कोई बुनियादी  कमी जरूर है। सारा दोष अगर अमेरिका का है तो ईरान की राजनीतिक कुशलता को क्या हो गया? सर्वोच्च नेता के फैसलों का विरोध करना एक धर्मतंत्र में मुश्किल हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में नहीं।
रूहानी को तय करना होगा कि ईरान पहले इस्लामी गणतंत्र राष्ट्र है या जनतांत्रिक इस्लामी राज्य? वे अहमदीनेजाद की नीतियों पर ईरान को आगे नहीं बढ़ा सकते। ईरान की मुद्रा पिछले दो साल में साठ प्रतिशत तक गिरी है और अमेरिकी घेराबंदी से वह वस्तु विनिमय के लायकभी नहीं रह गया। रूहानी पूरी कोशिश करेंगे कि अमेरिका से वार्ता करें लेकिन यूरोपीय संघ तक पहुंच बनाने में फौरी तौर पर आसानी है। फ्रेंच और जर्मन भाषा के ज्ञान, मुसलिम उलमा का रूप और चेहरे पर विनम्रता की अपनी निजी विशेषताओं पर रूहानी विश्वास कर सकते हैं कि रास्ते खुलेंगे। अभी अरबी और अंग्रेजी जुबानें उनकी इतनी मदद नहीं कर पाएंगी। वे जल्द ही फ्रांंस की यात्रा कर सकते हैं। यूरोप में जर्मनी भी ईरान के लिए एक उम्मीद है। तेल निर्यात और दवाइयां और खाद्य आयात ईरान की तात्कालिक जरूरतें हैं।
इस्लामी राष्ट्र संगठन (ओआईसी) के उसके पड़ोसी पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी अमेरिका की मर्जी के खिलाफ  न ईरान से बिजली खरीद सकते हैं और न ही ईरान को बदले में गेहूं और दवाइयां दे सकते हैं। ईरान शिया राष्ट्र है, लेकिन हर वह इस्लामी देश जो खुद को सुन्नी राष्ट्र कहता है दरअसल वह वहाबी देश है। इन कथित सुन्नी देशों की वहाबियत उन्हें दो चीजें और सिखाती हैं। अमेरिका का विरोध मत करना और ईरान का जरूर विरोध करना। पिछले चौबीस सालों से इस्लाम में इत्तहाद का सपना देख रहे अली खामनेई को भी रूहानी जगाने की कोशिश करेंगे कि वहाबियत का शिया से मेल नहीं हो सकता। सुन्नी राष्ट्र कोई बचा ही नहीं, जिसकी तरफ देखा जाए। तो फिर किसकी तरफ  देखा जाए? रूस और चीन महाशक्ति की श्रेणी में, वेनेजुएला और क्यूबा समर्थक देशों की सूची में और भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका तटस्थ देशों की सूची में। इस्लामी तंत्र से बाहर जाकर ही ईरान को उम्मीदें हैं। भौगोलिक रूप से जो देश ईरान के जितना करीब है वह रूहानी और वैचारिक तौर पर उतना ही ईरान के खिलाफ  है।
अहमदीनेजाद के भारत पर न्योछावर होने के बावजूद भारत अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से ईरान से तेल आयात घटाता रहा है। विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद की हालिया बगदाद यात्रा के दो मायने निकाले जा सकते हैं। हम ईरान का तेल नहीं लेते हैं तो यह हिस्सा सऊदी अरब को नहीं जाना चाहिए। सऊदी अरब की भारत को मानव विकास में मदद के नाम पर वहाबियत को प्रश्रय देने की नीति को भारत सरकार समझ रही है। तेल के लिए सऊदी अरब पर निर्भरता कम करके ही भारत में उसके वहाबी एजेंडे को काटा जा सकता है, लेकिन ईरान का संकट तो तब भी बरकरार है।
हसन रूहानी सोरखेह, सिमनान के रहने वाले हैं। वही सिमनान जहां के राजा मखदूम जहांगीर अशरफ  ने चौदहवीं शती में बादशाही छोड़कर फकीरी अख्तियार कर ली और खुदा की राह में जो निकले तो भारत में उत्तर प्रदेश के वर्तमान आंबेडकर नगर के कस्बा किछौछा में डेरा डाला। सात सौ साल बाद भी मानवता और प्रेम की उनकी जलाई ज्योति से लोग लाभान्वित हो रहे हैं। उनका परिवार सात सौ सालों से चिश्तिया परंपरा और सूफीवाद को प्रगाढ़ बनाता आया है। इसी किछौछा में आज भी दुनिया भर के लाखों जायरीन आते हैं और वे हजरत जहांगीर मखदूम अशरफ  ‘सिमनानी’ के नाम से उन्हें पुकारते हैं।
इस परिवार से वर्तमान गद्दीनशीन मौलाना सैयद महमूद अशरफ  और मौलाना सैयद मुहम्मद अशरफ  ने पूरे भारत में वहाबियत के विरुद्ध बड़ा आंदोलन चला रखा है। सिमनान का यह परिवार जानता है कि जिस आग में पाकिस्तान, सीरिया, इराक, अफगानिस्तान, माली, लीबिया, ट्यूनिसिया, मिस्र, फिलस्तीन, लेबनान जले, उस आग से भारत को कैसे बचाना है? जो खेल सऊदी अरब मुसलिम जगत में खेल रहा है उससे या तो ईरान सुरक्षित है या फिर भारत। लेकिन कितने दिन? ईरान का तख्तनशीन बादशाह भारत की मिट््टी में फकीर बन गया। ये रूहानी संबंध आज भी दोनों देश समझते हैं। आज क्या हसन रूहानी को तेहरान से दिल्ली का रास्ता मुश्किल लगता है? सात सौ साल पहले सिमनान से किछौछा का रास्ता तो आसान था।

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