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सीतापुर के ज्यादातर इलाके जलमग्न PDF Print E-mail
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Thursday, 20 June 2013 10:07

सीतापुर, जनसत्ता। बनबसा बांध से पांच लाख क्यूसिक पानी छोड़े जाने के बाद मंगलवार की रात सीतापुर के तराई क्षेत्र के लिए काली रात बन गई। रातोंरात पूरा तराई क्षेत्र बाढ़ में डूब गया। वैसे तो हर साल घाघरा नदी अपना तांडव जुलाई के आखिर में दिखाती थी परंतु इस बार घाघरा नदी ने दो महीने पहले ही अपना विकराल रूप दिखा दिया। समूचे क्षेत्र में फसलें नष्ट हो गईं। प्रशासन को भी पांच लाख क्यूसिक पानी छोडेÞ जाने की खबर नहीं थी। रातोंरात लगभग 50 गांवों के लोग भयंकर बाढ़ से घिर गए। अब तक राहत पहुंचाने के नाम पर कोई वहां नहीं पहुचा है।
भारत में घाघरा नदी एकमात्र एक ऐसी नदी है जो हर साल हजारों एकड़ भूमि को अपना निवाला बनाती है। सीतापुर जिले का गाजर क्षेत्र सबसे अधिक घाघरा की कटान व बाढ़ त्रासदी की जद में आता है। लगभग 100 साल से लगातार घाघरा अपना तांडव दिखाती आई है। परंतु अब तक किसी सरकार ने कटान व बाढ़ के निदान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। जिसके कारण वहां का किसान सबसे पिछड़ा और कर्ज


में डूबा हुआ है जबकि पूरे जनपद में सबसे अधिक उपजाऊ भूमि तराई क्षेत्र की ही है।
अभी हाल ही में विकास खंड रेउसा के काशीपुर सहित कई ग्रामसभाओं को बचाने के लिए तटबंध बनाने के लिए साढेÞ छह करोड़ रुपया मंजूर हुआ था परंतु संबंधित महकमा इस बार रुपया निर्गत होने के बाद भी तटबंध का निर्माण नहीं करा पाया। हर साल कटान आगमन की तैयारियां होती हैं। आजादी के बाद के 65 साल के आंकडेÞ बताते हैं कि हर साल लाखों हेक्टेयर फसल नष्ट होती है। हजारों लोग बेघर हो जाते हैं जिसका असर पूरी सभ्यता पर देखने को मिलता है। घरों में खाने को नहीं है शिक्षा की बात तो कोसों दूर है। पिछले साल में लगभग 17000 लोगों ने यहां से पलायन किया है।
यह सारे के सारे वही लोग हैं जिनकी जमीने कटान में चली गई। ऐसे लोगों के पुनर्स्थापन के लिए प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं है।




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