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बचपन का पर्यावरण PDF Print E-mail
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Monday, 10 June 2013 10:00

अविनाश वाचस्पति
जनसत्ता 10 जून, 2013: बालमन के पर्यावरण की निश्छलता देश-काल की सीमाओं से बाहर अपने अक्षितिजीय मनभावन स्वरूप में संपूर्ण सृष्टि में नेह बरसा रही है। बचपन में हम पैंया-पैंया चलते रहे और उससे भी पहले घुटनों के बल खिसकते रहे। बिना कहे, बिना सुने अपने विचारों के जरिए अनुभवों की सैर का आनंद लेते रहे। खिसकने से पैदल चलने का यह सफर, पैदल के बाद साइकिल की सवारी, किशोर होने पर मोटरसाइकिल और स्कूटर पर उतर-चढ़त, फिर कार, बस, सारे चौपहिए वाहन और इसके बाद आगे बढ़ कर रेल, जिसके पहिए गिने तो जा सकते हैं, पर कोई गिनता नहीं है, सिवाय उनके जिन्हें उनका गिन कर हिसाब रखना होता है।
गिनता है बचपन में बच्चा! सिर्फ रेल के पहिए नहीं, कितनी चींटियां जमीन पर चल रही हैं, कितने मच्छर उड़ रहे हैं, कितने कुत्ते भौंक रहे हैं, कितनी मक्खियां हैं...! उन्हें मारने की कोशिश करता बालमन, बचपन में क्रूरता का समावेश करता चलता है। वह गिनता तो है उन रोटियों को भी, जिनसे वह अपने पेट की भूख मिटाता है। भाई बहनों को भी, जिनके साथ रहता है और दोस्तों-पड़ोसियों को, जिन पर प्यार लुटाता है। माता-पिता और हितैषियों को, जिनसे असीम प्यार-दुलार पाता है। देखता है उस इंसान को, जो मुंह से धुआं उगलता दिखाई देता है। अपशब्दों की बारिश भी, जिनसे रोजाना रूबरू होता है। वहीं से सही-गलत सब सीखता-बढ़ता रहता है। अनुभवों के मायने में समृद्धि को प्राप्त हो रहा होता है। इस गिनती में कोई स्वार्थ नहीं होता। मगर स्वार्थ से बचा रहे, ऐसा नहीं होता।
यह अच्छा है तो मेरा है, मेरे भाई का है, मेरी बहन का है, मेरे मित्र का है, मेरे पिता का है, माता का है! और जो बुरा है वह तेरा है, किसी अनजाने का है। जबकि


अनजाना कौन है, सबमें मानव-मन समाया है। बचपन में मच्छरों, चींटियों, मक्खियों को मारने से उपजी क्रूरता बचपन को मार देती है। जबकि वही जब किसी कुत्ते के पिल्ले, बिल्ली या गिलहरी को दुलार करता है तो बचपन का आनंद कई सौ गुना बढ़ जाता है। इनके अच्छे प्रभाव से हम इंसानियत के पर्यावरण को सुधरता हुआ देखते हैं।
अब बचपन वह बचपन नहीं रहा, जो देश और संसार को अपने बचपने से लुभाए। बालमन आधुनिकता के मकड़जाल में इस बुरी तरह से उलझ गया है कि सुलझाए नहीं सुलझ रहा है। तेजी इतनी अधिक और इतनी गति से समाती जा रही है, बल्कि बरगलाती जा रही है कि ‘फूड’ बन रहा है ‘फास्ट-फूड’, भाषा बन रही है ‘फास्ट-भाषा’ (एसएमएस और चैनलों की भाषा पर गौर कीजिए और यही बन रही है अखबारों में खबरों की भाषा) से लेकर ‘फास्ट-मोबाइल’ आदि, जो सभ्यता और संस्कृति को बच्चों से दूर ले जा रहा है। इसमें न अटकें, इससे बचें और बाहर निकलें, तभी बचपन का पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। चाहते सब हैं, पर बचपन में इस भंवर में फंसने के बाद बड़े होने पर समझते हैं, अहसास करते हैं।
पर्यावरण पर चढ़े हुए छद्म आवरण को वरण मत कीजिए। बचपन से ही तज दिया जाए, ऐसा कारगर उपाय कीजिए। बच्चों का ही नहीं, सबका मन अहसास करे सुंदर सलोने बचपनीय मन का। शरीर की हरेक रक्तवाहिनी में, नस-नाड़ी में, विचारों की गाड़ी में बचपन ही सवार नजर आए। हर नजर खिलखिलाए। सभी मन का पर्यावरण अंदर तक सुंदर बना रहे। यही कामना है जीवन की। पुरस्कार चाहे न मिले, नकद राशि बिल्कुल भी न मिले। पर बचपन और पर्यावरण का तारतम्य अपनी स्निग्धता में बना रहे।

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