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वाह बीकाणा वाह PDF Print E-mail
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Saturday, 08 June 2013 12:36

राहुल गौर
जनसत्ता 8 जून, 2013: बीकानेर उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में एक छोटा-सा शहर है, ऊंघता हुआ-सा। कीकर के पेड़ों, ऊंट-गाड़ी, अलसाई दुपहरियों और धूल के थपेड़ों से भरा। और अपने भुजिया-नमकीन, रसगुल्लों और चूहों वाले मंदिर के लिए प्रसिद्ध। मैं यहीं जन्मा और पला-बढ़ा हूं और बचपन से स्कूल छोड़ने तक मैं भी किसी पर्यटक परचे पर छपी इसी जानकारी की तरह अपने शहर को देखता था। शहर को पारखी नजरों से देख पाने की न तो काबिलियत थी, न ऐसी समझ पैदा कर पाना जिंदगी की कोई प्राथमिकता। लेकिन अब, जबकि मेरे पास समय और देश की दूरी से उपजी तटस्थता है और थोड़ा बटोरे गए अनुभवों का ज्ञान, मुझे लगता है कि मैंने इस शहर को कितना कम जाना। विकीपीडिया की असंपादित प्रविष्टियों की तरह इस जानकारी को भी थोड़ा और ताजा किया जाना जरूरी है।
हिंदुस्तान के कमोबेश और सभी छोटे शहरों की तरह यहां भी ताजा ओढ़ी गई कृत्रिम आधुनिकता के आवरण के नीचे एक खालिस, धड़कता हुआ दिल लिए एक शहर बसता है, जिसकी पहचान सिर्फ इतिहास की किताब, पर्यटक परचा और भुजिया-रसगुल्लों के विज्ञापनों में नहीं है। इस शहर की असली रौनक हैं इसके गली-मुहल्ले, पुराने रस्मो-रिवाज, कही-अनकही कहानियां और सबसे ऊपर यहां के लोग, जो कहीं न कहीं वह सरलता और मानवीय संवेदना आज भी अपने भीतर लिए हैं जो बड़े शहरों में पाना नामुमकिन होने की हद तक मुश्किल है। और मैं बहुत निश्चिंत होकर यह बात कह रहा हूं, कोरी भावुकता में बह कर नहीं।
यह शुद्ध मानवीय संवेदना नहीं तो और क्या है कि मेरे चालीस साल के जीवन में ही नहीं, बल्कि मेरे पिता और दादा के जमाने के लोगों को भी याद नहीं


पड़ता कि कभी यहां हिंदू-मुसलमान तनाव की भी कोई बात सुनी गई हो, दंगों की तो बात ही छोड़िए। अब पिछले दस सालों की जमीनी हकीकत मुझे पता नहीं, क्योंकि भगवा ब्रिगेड और वहाबी इस्लाम के पैरोकार तो अब सभी जगह सक्रिय हैं, पर जितना मैं देख पाता हूं, यह सिलसिला आज भी जारी है।
मेरे पिता के एक पुराने मित्र ‘भंवर चाचा’ जाति से चूनगर मुसलमान हैं। चूनगर, यानी वह कारीगर परिवार जो पुरानी इमारतों में घुटे हुए चूने की कारीगरी करते थे जो संगमरमर-सी लगती थी। हमने ताउम्र भंवर चाचा को अपने यहां दिवाली और ईद दोनों की मुबारकबाद के साथ आते देखा है। उनके घर की शादियों में और मुबारक मौकों पर हम भी जाते रहे और बिना किसी लहसुन-प्याज तक के स्वादिष्ट, वैष्णव खाने का स्वाद लेते रहे। मुमताज अंकल, जो मेरे पिता के कॉलेज के मित्र थे, हनुमान जी के भक्त थे और हनुमान चालीसा का पाठ किया करते थे। रेलवे से सेवानिवृत्त मुज़फ्फर अहमद कादरी साहब इस्लाम के साथ-साथ जैन धर्म में भी दीक्षित हुए हैं और पर्युषण पर्व में बाकायदा आठ दिनों का निर्जल व्रत रखते हैं।
और बीकानेर का सामाजिक और राजनीतिक इतिहास उठा कर देखें तो ये कोई अजूबे नहीं हैं। यह यहां की जीवनशैली है जो राजे-महाराजों से होती हुई आज तक यहां गली-मुहल्लों, बाजारों, मंदिरों, मस्जिदों में जिंदा है और रहनी चाहिए। बीकानेर की यादें और बातें बहुत हैं, इसलिए बात अभी खत्म नहीं हुई है। खैर, ‘वाह बीकाणा वाह’ दरअसल इस पूरे दोहे का एक हिस्सा है- ‘ऊंठ, मिठाई, इस्तरी/ सोनो-गहणो, साह/ पांच चीज पिर्थवी सिरे/ वाह बीकाणा वाह!’

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