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लहरों के संग PDF Print E-mail
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Friday, 07 June 2013 10:02

गौतम राजरिशी 
जनसत्ता 7 जून, 2013:  अपनी ही लिखी कविताओं के मोह में उलझे महाकवियों के वर्तमान दौर में कायम उनके लीन-पैच के नाम!  ‘लॉन्ग नाइंटीज या नर्वस नाइंटीज...!’ ...कि तब, जब कविता असहाय कराहती नजर आ रही थी, आत्ममुग्ध कवियों की एक टीम बाकायदा बैंड-बाजे के साथ सामने आती है और एक दशक-विशेष पर चर्चा के बहाने अपने नामों और अपनी ही कविताओं का फिर से ढोल बजाती है। मुझे लेकर ‘तू कौन बे’ की तर्ज पर असंख्य भृकुटियां टेढ़ी होकर उठेंगी इन्हीं बड़े नामों की, तो मैं आप सबका पाठक, मेरे प्रबुद्ध कविवरों, जो आपकी कविताओं की किताबें अपने खून-पसीने की कमाई से खरीदता और पढ़ता है। और हां, यह कोई ‘क्लिशे’ नहीं, सचमुच के बहाए गए खून और शून्य डिग्री तापमान में भी निकाले गए पसीने की कमाई की बात कर रहा हूं, तो एक तरह का हक समझ बैठता हूं आपकी आत्ममुग्धता पर कुछ कहने का।
बड़े सलीके से एक प्रश्नावली बुनी जाती है और फिर उतने ही सलीके से चयनित नामों की एक फेहरिश्त को वह प्रश्नावली भेजी जाती है। कभी सुना था कि ‘नई कहानी’ नामक तथाकथित आंदोलन के पार्श्व में कहानीकारों की एक तिकड़ी ने सुनियोजित साजिश रच कर एक सिरे से हिंदी कहानी के तमाम शेषों-अशेषों-विशेषों को नकारने की खतरनाक सुपाड़ी उठाई थी। कुछ वैसा ही प्रयास हुआ है इस ‘लॉन्ग नाइंटीज’ विमर्श के जरिए। सलीके की बुनावट इस कदर कि कोई नाराज न हो और कोई विवाद भी न उठे। लेकिन पाठकों द्वारा नकारी हुई अपनी कविताओं पर चर्चा भी हो जाए। काश कि इतना ही सलीका आपने अपने शिल्प और कविता की कविताई पर भी दिखाया होता!
टीम-चयन के दौरान पहले तो एक कवि-विशेष को पूर्व-पीढ़ी का अंतिम कवि कहते हुए खारिज कर दिया जाता है और फिर तुरंत ही उस कवि-विशेष के एतराज जताने पर उन्हें अपनी पीढ़ी का प्रथम कवि मान लिया जाता है। हाय


रे हाय! इतनी उलझन तो भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं के बीच भी नहीं हुई होगी टीम चुनते समय! पहले सफाई दी जाती है कि ‘कविता या साहित्य में दशकवाद घातक है... किसी दौर की रचना पर दशक के अनुसार विमर्श उचित नहीं।’ और फिर तुरंत ही अपनी दुंदुभि बजाने की उत्कंठा में ऐलान किया जाता है कि ‘किंतु लॉन्ग नाइंटीज समय का प्रस्थान बिंदु है...’, जिसे पढ़ कर कविताई-आतंक से खौफ  खाए हम पाठक मुस्कराने लगते हैं इस शातिरपने पर।
कैसी कविता, कहां की कविता कि जिसके सत्यापन के लिए एक पत्रिका के तीन से चार अंकों में जाने कितने पन्ने काले कर दिए आपने! मेरे श्रद्धेय कविवरों... हम कविताशिक पाठक जो आपके गद्य के अनुच्छेदों की ऊपर-नीचे कर दी गई पंक्तियों को आपके द्वारा कविता कह दिए जाने पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं और पढ़ते जाते हैं कि एक जुमले में ही सही, कहीं तो कविता का कवितापन दिख जाए! मगर हाय रे हतभाग! निराला के ‘मुक्त-छंद’ के आह्वान को कब आपने चुपके-चुपके ‘छंद-मुक्त’ बना दिया और बैठ गए विमर्श भी करने उस पर! कितना अच्छा होता कि इतने सारे व्यतीत पन्नों पर अपनी कविताएं ही दे देते। कम से कम यह मोहभंग की स्थिति तो नहीं आती! उधर, पश्चिम में, जानते तो हैं न मेरे कविवरों कि वह ‘फ्री-वर्स’ ही है अब तलक। किसी ने ‘वर्स-फ्री’ बनाने की हिमाकत नहीं की है। लेकिन हम तो आपके पाठक हैं! आपकी इस हिमाकत पर भी पढ़ते जाएंगे आपको, गुनते जाएंगे आपको...!
तट पर खड़े होकर भी तटस्थ न दिखते ‘लॉन्ग नाइंटीज’ की यह पीढ़ी, हमारे प्यारे-दुलारे कवियों की यह पीढ़ी, गर्दन तक किस कदर बहती धार में डूबी लहरों के साथ बही जा रही है, इसका आभास इनकी कविताओं से तो अब तक नहीं हो पाया था!

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