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गांव में वे दिन PDF Print E-mail
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Wednesday, 05 June 2013 09:54

अरविंद दास
जनसत्ता 5 जून, 2013: तब हम बच्चे थे। मां के पेट पर चिपके रहते। गर्मियों में बाहर जाने से रोकते हुए मां हमें अपने पास पकड़ कर रखती। पर थोड़ी देर में वह खुद सो जाती। सोते हुए मां के कानों में बड़े-बड़े सोने के छल्ले अच्छे लगते थे। बड़े भाई की जब शादी हुई तो भाभी के लिए वे उसी तरह के छल्ले ढूंढ़ रहे थे। पर समय के साथ सोने में चमक और खनक दोनों गायब होती गर्इं। बहरहाल, मां जब सो जाती तो हम उसके कानों के छल्ले को खोलते-खेलते थक जाते। फिर गर्मी से बेपरवाह, इधर-उधर देख, भाग जाते आम के टिकुलों की टोह में।
दिल्ली की इन गर्मियों में जब सुबह-सबेरे नींद खुल जाती है और कानों में सुरीले ‘फालसे काले काले’ की आवाज सुनाई पड़ती है, मन जाने क्यों गांव पहुंच जाता है! मैं फोन पर मां से पूछता हूं- ‘क्या मिरचई अभी भी डुगडुगी बजाता, साइकिल पर बर्फ लेकर गांव आता है? बाड़ी में आम के टिकुले अब तो बड़े हो गए होंगे! डबरे का पानी तो सूख गया होगा!’
यायावर नागार्जुन ने लिखा है- ‘याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम/ याद आतीं लीचियां, वे आम/ याद आते धान याद आते कमल, कुमुदनी और ताल मखान/ याद आते शस्य श्यामल जनपदों के रूप-गुण अनुसार ही रखे गए वे नाम।’ तरौनी की जगह ‘बेलारही’ रख दीजिए। यह कविता मेरी हो जाएगी। यों तरौनी से मेरे गांव की दूरी बस बीस किलोमीटर ही तो है! और ननिहाल? महज चार किलोमीटर। शायद हर प्रवासी की पीड़ा कहीं न कहीं मिलती-जुलती है। पहले नॉस्टेल्जिया और फिर गहरा अवसाद!
मार्च में हफ्ते भर के लिए गांव गया था। पिता अपने स्वभाव के विपरीत शांत थे। उनकी युवोचित हंसी नहीं सुनाई पड़ रही


थी। मां से पूछा- ‘पापा इतने चुप क्यों रहते हैं?’ पापा से पूछा- ‘डिप्रेशन में तो नहीं हैं?’ पापा ने कहा- ‘नहीं।’ पर कुछ देर बाद कहा- ‘अब यह उम्र पोते-पोतियों के संग खेलने की है, अकेले रहने की नहीं!  रिटायरमेंट के बाद ऐसा लगता है कि सारी ऊर्जा खत्म हो गई।’ बूढ़ी दादी से पूछता हूं- ‘दिल्ली चलोगी?’ वह कहती है- ‘मरने के समय क्या मगहर जाऊंगी?’
नब्बे के दशक में जब हम बिहार से दिल्ली पढ़ने आए थे, उस वक्त बच्चों को दिल्ली पढ़ने भेजना मध्यवर्गीय परिवार के लिए एक तरह का ‘स्टेटस सिंबल’ था। जिनके पास भी थोड़ा-बहुत साधन था, उन्होंने बच्चों को बाहर पढ़ने भेज दिया। और वे नौकरी के चक्कर में वहीं के होकर रह गए। बीस साल बाद अब दरभंगा-मधुबनी जिले के गांव बूढ़ों का बसेरा बन गए हैं। बिहार में गांवों में स्वास्थ्य और बिजली की सुविधा पिछले तीन दशकों में बमुश्किल सुधरी है। इन मूलभूत सुविधाओं के बिना बुढ़ापा एक रोग और भय बन के आता है।
वीएस नायपाल के एक जुमले का इस्तेमाल कर कहें तो लालू-राबड़ी के शासन के दौर में मीडिया में बिहार की छवि एक ऐसे राज्य की बन गई थी जहां ‘सभ्यता का अंत’ हो गया है। पर नीतीश कुमार के शासनकाल में मीडिया में एक ऐसी छवि बन रही है कि बिहार जल्दी ही अपने ‘अतीतकालीन गौरव’ को पा लेगा। दोनों ही छवियां अतिरंजित और सच से परे हैं। मीडिया में इस समय सबसे ज्यादा जोर ‘जीडीपी’ के आंकड़ों, नीतीश की सेक्युलर छवि और प्रस्तावित ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ को लेकर है। पर जमीनी हकीकत बिहार के गांवों, खेत-खलिहानों में ही दिखती है, चिकने-चुपड़े राष्ट्रीय राजमार्गों पर नहीं।

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