मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
सुविधा की चुप्पी PDF Print E-mail
User Rating: / 0
PoorBest 
Monday, 03 June 2013 10:00

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
जनसत्ता 3 जून, 2013: आर्थिक अराजकता, राजनीति और सेक्स के अद्भुत कॉकटेल में सराबोर और राजनीतिक संरक्षण से लैस सौ से अधिक चिटफंड कंपनियों ने पूरे बंगाल में आम जनता की जमा-पूंजी लूट ली।

हाल ही में शारदा समूह के फर्जीवाड़े के भंडाफोड़ से गड़े मुर्दे जिंदा होने लगे हैं। कॉलेज परिसर युद्ध और चुनावी राजनीति में निष्णात बंगाल में इस कांड के खिलाफ महातांडव मचा है। बंगाल से बाहर पूरे देश में इस पर हंगामा है। नींद मेंसोया सेबी भी जाग चुका है। पर कई हफ्ते बाद भी अति राजनीति-सचेतन, समाज-प्रतिबद्ध बंगाल की ‘सिविल सोसाइटी’ का अता-पता नहीं। अति मुखर जुबानी योद्धाओं के होश फाख्ता हो गए हैं। बोलती बंद है। काटो तो खून नहीं, हालत ऐसी है। आखिर क्यों?
परिवर्तन-आंधी के दौरान इस नागरिक समाज का चेहरा बने सोलह लाख की पगार वाले शारदा मीडिया समूह के सीईओ कुणाल घोष सत्ता-दल के सांसद हैं और आम जनता उनकी गिरफ्तारी की मांग कर रही है। परिवर्तनपंथी विश्वविख्यात चित्रकार शुभप्रसन्न का नाम वाम जमाने में भी भूमि के कारोबार विवाद में रहा। उनके खेमा बदलने के पीछे भी यही कारण बताया जाता रहा है। नंदीग्राम प्रकरण में पहले वे खामोश थे, पर जमीन विवाद में फंसते ही ममता ब्रिगेड में शामिल हो गए। अब शारदा समूह के एजेंट और दूसरे लोग सुदीप्तो सेन के साथ उनकी तस्वीर लेकर सड़कों पर उतर कर दावा कर रहे हैं कि सत्ता-दल के राजनेताओं के अलावा बंगाल में विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों के शारदा से सीधे संबंध होने के कारण ही वे इस दुश्चक्र में फंस कर दिवालिया हो गए। दूसरी ओर, शुभप्रसन्न ने इस तस्वीर को डिजिटल तकनीकी की जालसाजी बताई।
बाकी लोग, पक्ष-विपक्ष के तमाम बुद्धिजीवी, सिविल सोसाइटी के रथी-महारथी, जो खुद को सुशील समाज बताते हैं और आम जनता को भेड़-बकरियों की जमात मानते हैं, वे जाने कहां किस कोने में सो रहे हैं! मामला सिर्फ कुणाल घोष या पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की ऐसी-तैसी


करने वाले समाचार-पत्र समूहों के सांसद कर्णधारों या शुभप्रसन्न का नहीं है। काजल की कोठरी में हर चेहरा रंगीन है। सुदीप्तो सेन ने खुद फरार होने से पहले भारी तैयारियां माल समेटने और कानून को धता बताने के लिए कीं। फिर सेबी, सीबीआइ और सत्तादल के सुप्रीमो को तीन चिट्ठियां लिखीं, जो एटम बम से कम नहीं थीं। राजनेताओं में हड़कंप मचा हुआ है तो सिविल सोसाइटी की हालत पतली है।
मनोरंजन और खेल के तमाम कार्यक्रम, आयोजन, पुरस्कार, सेवा-संबंधी कार्यक्रम सीधे चिटफंड के पैसे से जुड़ते हैं। कोलकतिया बड़ा क्लब हो या आइपीएल, दुर्गापूजा हो या कोई क्लब, प्रमोटर सिंडिकेट हो या फिल्म, टीवी-धारावाहिक या फिर मीडिया, हर कहीं चिटफंड का निरंकुश दबदबा है। प्रतीक-शख्सियतों के सम्मान के पीछे कोई न कोई चिटफंड है। सत्ता-दल से संबंध होने की वजह से तरह-तरह की सुविधाओं का उपभोग करने वाले बुद्धिजीवियों की हवाई क्रांति की हवा इसीलिए निकली है। शुतुरमुर्ग में तब्दील लोग इसी वजह से तूफान गुजर जाने की उम्मीद में हैं।
यों भी, सड़कों पर उमडेÞ लोगों के जोश ठंडा पड़ते ही राजनीतिक संरक्षण की वजह से मामला रफा-दफा हो जाने के पूरे आसार हैं। अतीत में ‘संचयिता’ बंद हुई तो एक मालिक की हत्या हो गई और दूसरा दिवालिया हो गया। आम लोगों को कुछ भी नहीं मिला। ताजा मामले में सत्ता संरक्षण की वजह से गिरफ्तारी तब हुई, जब बचाव का चाक-चौबंद इंतजाम हो गया। जाहिर है, मामला ज्यादा खुला तो न सिर्फ मंत्री से लेकर संतरी तक फंसेंगे, बल्कि इस सुनामी से बेनकाब हो जाएंगी ईमानदारी, सादगी और प्रतिबद्धता की तमाम छवियां! इसलिए कार्रवाई उतनी ही होनी है, जितनी राजनीतिक समीकरण साधने के लिए अनिवार्य है। अति बुद्धिसंपन्न सुशील समाज को यह राजनीतिक-सामाजिक सच बाकी लोगों से बेहतर मालूम है। इसलिए बिना पंगा लिए तमाम ‘पवित्र’ लोग बुरा वक्त गुजर जाने के इंतजार में हैं।

 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?