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मुक्ति की राह PDF Print E-mail
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Saturday, 01 June 2013 12:25

कविता विकास
जनसत्ता 1 जून, 2013: कल्पना कीजिए कि पिंजरे में बंद पक्षी पंख फड़फड़ा कर अपनी वेदना जाहिर करते-करते या तो लहूलुहान हो जाता है या फिर थक कर सो जाता है। कमोबेश यही स्थिति महिलाओं की भी है। पंख हैं, परवाज नहीं। आदिकाल की देवी, भक्तिकाल में माया बन गई और आज के बाजारवाद ने उसे वस्तु में बदल दिया। परिवर्तन के आयाम सबसे ज्यादा महिलाओं में ही दिखे। कभी उसके अक्षर ज्ञान को मुक्ति का साधन माना गया तो कभी पूरी तरह साक्षर होकर आत्मनिर्भर होने को। आज औरतें बहुत हद तक आत्मनिर्भर हैं, पर हर आत्मनिर्भर औरत सुखी नहीं। ममता, कोमलता जैसे स्वाभाविक गुणों की तिलांजलि देकर पुरुषों से कंधा मिला कर चलने वाली स्त्रियां भी संतुष्ट नहीं हैं। सुख को उसने खरीद लिया, पर महसूस नहीं किया। आधुनिकता की आड़ में औरतों की नई भूमिकाएं उन्हें एक नए जाल में फांस लेती हैं। एक निश्चित दायरे में रह कर आत्मविश्वास से लबरेज अपनी जिम्मेदारी निभाना और बात है।
यह स्वतंत्रता प्रगति की सूचक नहीं है। पितृसत्ता आज भी है, भले ही स्त्री-पुरुष के संबंधों में खुलापन और नजदीकियां बढ़ी हैं। यह बदलाव आर्थिक दृष्टिकोण से मजबूत हुआ है, न कि सामाजिक दृष्टिकोण से। समाज तो इसे मजबूरीवश स्वीकारता गया। जहां परिवार का ‘स्टेटस’ बढ़ा है, वहीं आपसी विश्वास की लौ बुझने लगी है। आधुनिकता का लिबास ओढ़े पुरुष आज भी अपनी पत्नी के सहकर्मी पुरुष के एक फोन पर चिल्लाने लगता है और अगर पत्नी आवश्यकतावश अपने पुरुष मित्र की मोटरसाइकिल पर बैठ गई तो एक बवंडर खड़ा कर देता है। वर्षों का साथ विश्वास के रेतीले आधार पर खड़ा भरभरा जाता है। इसलिए विवाह अपना आकर्षण खोकर कहीं न कहीं एक समझौता बन कर रह गया है।
प्रेम और विश्वास के साथ आगे बढ़ती स्त्रियों को पुरुषों का अपेक्षित सहयोग


मिलता रहे तो इस बदलाव और स्त्री-पुरुष के संबंधों में हो रहे बदलाव को अपनाना सहज हो जाएगा। इंसानों में मुक्ति-बोध ज्यादा पनपता है। समाज के सही संचालन के लिए नियम अपेक्षित हैं, लेकिन किसी एक को बंधन में इतना जकड़ दिया जाए कि वह छटपटा उठे तो फिर मुक्ति की भावना विद्रोह का स्वर अख्तियार कर लेती है।
जब से स्त्रियां अपने अधिकारों के प्रति सजग हुर्इं हैं, तब से समाज में एक नई बहस छिड़ी जो कभी स्त्री-समानता, कभी स्त्री-जागरण तो कभी स्त्री-विमर्श के रूप में निरंतरता बनाए हुए है। स्त्री विमर्श ने स्त्री के मुक्ति संघर्ष को धार प्रदान की है। अगर यह विमर्श किसी एक वर्ग की श्रेष्ठता का हिमायती न हो, दोनों की समानता की  हिमायत करता हो, तभी एक सह-अस्तित्वपरक समाज की स्थापना होगी। स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र प्रतिक्रिया और स्वतंत्र हस्तक्षेप मुक्ति की पहली शर्त है। उच्च और निम्न वर्ग के लिए यह इतना पेचीदा नहीं है, जितना मध्यवर्ग की स्त्रियों के लिए, क्योंकि यही वर्ग शिक्षा के क्षेत्र में आगे है, महत्त्वाकांक्षी और जागरूक है और इसे ही औरों से अधिक प्रतिरोधों का सामना करना पड़ता है। साहित्य समाज का दर्पण है। आलोचक चाहे जो कहें, पर एक ऐसी स्त्री जिसके लिए उसकी अस्मिता ही उसकी पूंजी, पहचान और जीने का आधार है, वह पूरी तरह स्वतंत्र है। वह सक्षम, आत्माभिमानी और अपराधबोध से मुक्त है। वह सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और नैतिकता के परंपरागत मानदंडों को तोड़ती हुई एक नए समाज की संरचना में व्यस्त है। समय आ गया है कि ज्ञान की पराकाष्ठा को समझते हुए लैंगिक आधार पर भेदभाव को मिटा कर एक शिक्षित समाज की बुनियाद पर ध्यान दिया जाए जो स्त्रियों के मुक्ति-बोध का सूचक होगा।

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