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हिंसा का दुश्चक्र PDF Print E-mail
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Friday, 31 May 2013 09:53

अकबर महफ़ूज आलम रिज़वी
जनसत्ता 31 मई, 2013: हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, उसमें कुछ भी असंदिग्ध नहीं है। यह आम धारणा है कि प्रभु-वर्ग या उससे जुड़े लोगों के विरुद्ध जो कुछ भी होता है, वह अप्रत्याशित ही होता है। ‘प्रत्याशित’ घटनाएं तो आम लोगों से जुड़ी होती हैं! दलित-आदिवासी और कमजोर तबके के लोगों का शोषण-दमन-उत्पीड़न ‘प्रत्याशित’ होता है। यही समाज और व्यवस्था-सम्मत धारणा है। हत्या, लूट या बलात्कार हो या आंदोलन- ये तभी बड़े होते हैं, जब बड़े लोगों के साथ हों या वे इनसे जुड़े हों। अब से पहले तक नक्सलियों ने सुरक्षा बलों को ही अपना निशाना बनाया था। सैकड़ों जवान मारे गए होंगे। लेकिन राजनेताओं के चेहरे पर ऐसी हवाइयां पहले कभी उड़ती नहीं दिखीं। ऐसा नहीं कि हम दुखी नहीं हैं। हमारे लिए तो हर एक जिंदगी अहम है।
जिंदगी इतनी आसानी से नहीं मिलती कि मौत भी जश्न का कारण बन जाए। जो मौत के सौदागर हैं, उनके लिए यह भी सफलता-विफलता का मापदंड हो सकता है। दर्जनों लोगों की मौत के कारण छत्तीसगढ़ की ताजा घटना बड़ी नहीं हो जाती। इसलिए बड़ी होती है कि इस घटना के शिकार प्रभुवर्ग के लोग हुए हैं। उनके बारे में यह धारणा है कि इन्हें कोई निशाना नहीं बना सकता। यही वजह है कि सन् 84 के दंगों के तमाम प्रभावशाली आरोपी बाइज्जत बरी हो जाते हैं। भागलपुर और मुंबई दंगों की जांच रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है, हत्यारे ‘मसीहा’ के पद पर बिठा दिए जाते हैं और हिंसा या नफरत के सौदागरों को राजकीय सम्मान मिलता है।
छत्तीसगढ़ में माओवादी हमले में मारे गए लोगों के व्यक्तित्व को कुछ पल के लिए भूल जाएं तो व्यक्ति-रूप में इनकी मौत अंदर तक दहला देती है। एक ही वक्त दर्जनों घरों में मातम का तसव्वुर भी कम त्रासद नहीं। ‘...माओवादियों का यह कृत्य जघन्य है। उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई हो। राज्य सरकार शांति-व्यवस्था के मामले में बिल्कुल नाकारा है। उसे बर्खास्त किया जाए।’ अगर हम भी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री


या कोई और मंत्री होते या किसी राजनीतिक दल के नेता होते तो इन नपे-तुले जुमलों से काम चला लेते। लेकिन हमारी समस्या यह है कि हम सामान्य शहरी हैं, जो हरेक अप्रिय घटना पर अपने अंदर खौफ के अंधेरे को कुछ और घना होता पाता है।
छत्तीसगढ़ में पिछले तीन दशकों से क्या हो रहा है? क्या हम सब उससे वाकिफ हैं? किसका विकास हुआ है छत्तीसगढ़ में? छत्तीसगढ़ किनके नाम पर अलग राज्य बना? अजीत जोगी की सरकार रही हो या रमन सिंह की, सभी ने आंखें मूंद कर उद्योगपतियों की चरण पूजा की है। आदिवासियों की जमीन छीनी गई, मुआवजे की लूट हुई। रोटी-मकान और रोजगार मांगने पर गोलियों का शिकार बनाया गया। अहिंसक तरीके से पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करने वालों को देशद्रोही बता कर जेल में ठूंसा गया। हत्यारे और बलात्कारी अधिकारियों-पुलिसकर्मियों और नेताओं के ओहदे बढ़े, पुरस्कार मिला। ऐसे में निरीह आदिवासी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए क्या करें?
अगर देश जनतांत्रिक है तो सत्ता का वास्तविक दायित्व जनहित होना चाहिए। अगर जनतंत्र में जनता का हित, चंद पूंजीपतियों की तिजोरी भरने की शर्त पर सत्ता द्वारा अपहृत कर लिया जाए, तो समस्या पैदा होती है। माओवादी गलत कर रहे हैं। उन्हें सजा मिले। लेकिन सत्ता-पोषित आतंकवाद, लूटतंत्र और भ्रष्ट-व्यवस्था के खिलाफ कौन अभियान चलाएगा? सत्ता को निर्देशित करने वाले हमेशा सात परदों की आड़ लिए रहते हैं। देश और संसाधनों से ज्यादा इनके सुरक्षा-प्रबंधों पर ध्यान दिया जाता है। किसी खास कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए नीतियां बदल दी जाती हैं। नक्सली समस्या आज-कल की नहीं है। इसका हल क्यों नहीं निकला? सरकार सिर्फ हथियार से इन्हें खत्म करना चाहती है। आदिवासियों की समस्या का समाधान कोई नहीं चाहता, क्योंकि पूंजीपतियों के लिए समस्या पैदा हो जाएगी। इस घटना के बाद एक बार फिर नए सिरे से आदिवासियों का कत्लेआम होगा, जबकि हमलावर हत्यारे अपने सुरक्षित ठिकानों में आराम फरमा रहे होंगे।

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