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न आए ऐसी बारात PDF Print E-mail
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Wednesday, 29 May 2013 10:12

वर्षा
जनसत्ता 29 मई, 2013: सचमुच हमारी दुनिया तेजी से बदल रही है। हमारी दुनिया, मतलब हम लड़कियों की दुनिया। महिलाओं के खिलाफ  अपराध बढ़े हैं, यह एक बड़ी और कड़वी हकीकत है। लेकिन इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि परिवार में और परिवार से बाहर भी लड़कियां कई स्तरों पर अपने भीतर एक भरोसा अर्जित कर रही हैं, लड़कियों के हालात में सुधार हुआ है। पहले परिवार में खानपान में भी बेटियों और बेटों के बीच भेदभाव किया जाता था। पढ़ाई और स्कूल में फर्क किया जाता था। अब यह बदला है। बल्कि शहरों में बहुत सारे घरों में लड़कियों को भी पब्लिक स्कूलों में पढ़ाया जाता है। इसके बावजूद यह सच है कि महिलाओं के साथ भेदभाव कम हुआ है, लेकिन खत्म नहीं हुआ है। यहां मैं उन लड़कियों के बारे में बात करना चाहती हूं जो शादी के दिन सजधज कर बारात लेकर दूल्हे के आने का इंतजार करती हैं, लेकिन दहेज की वजह से वह बारात नहीं आती। मैं उन लड़कियों का शुक्रिया अदा करना चाहती हूं जो दहेज मांगने वाली बारातों को शादी के मंडप से वापस लौटाती हैं।
बुलंदशहर में एक मुसलिम परिवार की लड़की के निकाह का दिन आ गया था। मां-बाप, भाई-बहन सब शादी की तैयारियों में जुटे हुए थे। मगर शादी के दिन की सुबह ही फोन आया, लड़की के पिता से एक लाख रुपए और मोटर साइकिल की मांग की गई। पिता इस स्थिति में नहीं थे कि लड़के वालों की इस मांग को पूरी कर पाते। मुसलिम समाज में दहेज प्रथा नहीं थी, मगर लड़कियों का यह अभिशाप वहां भी तेजी से फैलता जा रहा है। लड़की वाले बारात का इंतजार करते रहे, लेकिन बारात नहीं आई। जिस परिवार में लड़की का विवाह किया जा रहा था, वह अलीगढ़ का रहने वाला था। लड़का और उसका पिता दोनों डॉक्टर थे। यह भी हैरान


करने वाली बात है। बारात न आने पर लड़की के पिता ने पुलिस में मामला दर्ज कराया। लड़के वाले घर पर ताला डाल निकल गए।
यह तो एक घटना है। मगर इसके बाद जो होता है, वह बारात न आने से भी ज्यादा खराब है। यह कहा जाता है कि अब लड़की का क्या होगा। जिसके नाम पर मेहंदी रचाई, वही नहीं आया, उसकी और उसके परिवार की खुशियां उजड़ गर्इं, लड़की की जिंदगी बरबाद हो गई। फिर लड़की को कोसना और लड़की का खुद को कोसना। यह सबसे खराब पहलू है। पहले तो लड़की का परिवार, उसका मुहल्ला, फिर रिश्तेदार और समाज- सब मिल कर एक भयावह स्थिति बना देते हैं। मेरा मानना है कि नहीं, लड़की की जिंदगी बरबाद नहीं हुई, बल्कि बरबाद होने से बच गई। यह बहुत ही साधारण बात है, मगर इसे जटिल बना दिया गया। लड़की अगर ऐसे परिवार में चली जाती जहां भावनाओं का मोल नहीं, रुपयों की ही कीमत है तो उसे क्या हासिल होता? दहेज के लिए प्रताड़ित होने और चरम पर जला दिए जाने से तो अच्छा है कि दहेज के नाम पर होने वाली शादी के टूट जाने पर राहत की एक लंबी सांस ली जाए। खुश हुआ जाए कि बेटी बच गई।
पिता तसल्ली महसूस करें और मुहल्ला संतुष्ट हो कि बच्ची बच गई। मां अपनी बेटी को पुचकारे कि किसी दुष्ट और स्वार्थी के लिए रचाई गई उसकी मेहंदी जितनी जल्दी छूट जाए, अच्छा। फिर मेहंदी किसी और के लिए नहीं, लड़की अपने लिए ही लगाती है। ऐसी बारात जो दहेज की रकम बटोर कर आए, उससे अच्छा कि न आए ऐसी बारात। और वे लड़कियां जो शादी के मंडप से दहेज मांगने वाले दूल्हों और बारातों को लौटाती हैं, उनका समारोह कर स्वागत किया जाना चाहिए।

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